नई दिल्ली:आधुनिक जीवनशैली से जुड़े बढ़ते स्वास्थ्य संकटों पर हुई एक महत्वपूर्ण चर्चा में डॉ. सिद्धार्थ सोनकर ने कई ऐसे पहलुओं पर प्रकाश डाला, जो आज के समय में आम लोगों, खासकर युवाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। इस चर्चा में शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक दबाव जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया।
स्वस्थ दिखने वाले लोग भी क्यों हो रहे हार्ट अटैक के शिकार?
डॉ. सोनकर के अनुसार, आज “दिखने में फिट” होना वास्तविक स्वास्थ्य की गारंटी नहीं है। लगातार तनाव, खराब नींद, जंक और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन, और छिपी हुई बीमारियां जैसे हाई कोलेस्ट्रॉल व डायबिटीज—ये सभी मिलकर हृदयाघात के जोखिम को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने साफ कहा कि आज के दौर में लाइफस्टाइल सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।
कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे क्या कारण हैं?
उन्होंने बताया कि कैंसर के मामलों में वृद्धि के पीछे कई कारण हैं—बेहतर जांच तकनीक, बढ़ता प्रदूषण, खानपान में बदलाव और लोगों की बढ़ती उम्र। यानी अब सिर्फ बीमारी नहीं बढ़ रही, बल्कि उसकी पहचान भी पहले से ज्यादा हो रही है।
‘गूगल इलाज’ बन रहा है खतरा
डॉ. सोनकर ने इंटरनेट के जरिए खुद दवा लेने के चलन को खतरनाक बताया। उनका कहना है कि अधूरी या गलत जानकारी के आधार पर दवा लेने से गंभीर साइड इफेक्ट्स और जटिलताएं हो सकती हैं। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि किसी भी बीमारी में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
डॉक्टर ज्यादा टेस्ट क्यों लिखते हैं?
इस सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि मेडिकल टेस्ट का उद्देश्य बीमारी की सही पहचान और जोखिम को कम करना होता है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि कुछ मामलों में ओवर-टेस्टिंग हो सकती है, इसलिए मरीजों को अपने इलाज को समझने और सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
छात्रों की आत्महत्या: एक बढ़ती सामाजिक चुनौती
चर्चा के दौरान छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर भी गंभीर चिंता जताई गई। डॉ. सोनकर के अनुसार, यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और संस्थागत स्तर पर जुड़ी हुई है।
समाज का दबाव:
अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और “हर हाल में सफल होने” की सोच छात्रों पर भारी मानसिक दबाव डालती है। असफलता को कमजोरी मानने की प्रवृत्ति उन्हें तोड़ देती है।
माता-पिता की अपेक्षाएं:
कई बार माता-पिता अनजाने में अपने सपनों का बोझ बच्चों पर डाल देते हैं, जिससे वे अपनी रुचि के अनुसार आगे नहीं बढ़ पाते और मानसिक रूप से अकेला महसूस करते हैं।
शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका:
भारी सिलेबस, लगातार परीक्षाएं और काउंसलिंग की कमी भी छात्रों के तनाव को बढ़ाती है। मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी एक बड़ी समस्या बनकर उभर रही है।
इस चर्चा से यह स्पष्ट होता है कि आज के समय में स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसिक और सामाजिक संतुलन भी उतना ही जरूरी है।
“सिर्फ फिट दिखना पर्याप्त नहीं—सही जानकारी, संतुलित जीवनशैली और विशेषज्ञ सलाह ही असली सुरक्षा है।”














