पर्दाफाश न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट
नोएडा प्राधिकरण से जुड़े शहदरा गांव की जमीन के लीजबैक प्रकरण में वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हरीश चंद्र के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई को समझने के लिए केवल बर्खास्तगी के शासनादेश को देखना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे वर्ष 2013 से चली आ रही विभागीय जांच, 2021 में उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण का आदेश, उसके बाद समय-विस्तार को लेकर विवाद और अंततः 3 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का महत्वपूर्ण फैसला शामिल है। हाईकोर्ट के आदेश में न केवल विभागीय आरोपों और जांच की पूरी पृष्ठभूमि दर्ज है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया गया कि अदालत द्वारा तय समयसीमा समाप्त होने के बाद भी, उचित कारण होने पर समय-विस्तार मांगा जा सकता है।
सबसे पहले एक तथ्यात्मक सुधार जरूरी है—हरीश चंद्र को सरकार ने निलंबित नहीं, बल्कि 28 सितंबर 2026 को सरकारी सेवा से बर्खास्त किया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने बर्खास्तगी का आदेश जारी किया। शासनादेश में विभागीय जांच में सिद्ध आरोपों, लोक सेवा आयोग की सहमति और 3 सितंबर 2026 के हाईकोर्ट के आदेश का भी उल्लेख किया गया।
मामला आखिर था क्या?
हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक हरीश चंद्र जब नोएडा प्राधिकरण के सचिव के पद पर तैनात थे, तब वर्ष 2011-12 के दौरान ग्राम शहदरा से संबंधित आबादी निस्तारण और जमीन के लीजबैक की प्रक्रिया उनके कार्यक्षेत्र में थी।
विभागीय कार्रवाई की शुरुआत 27 सितंबर 2013 के कार्यालय ज्ञापन से हुई। आरोपों का संबंध नोएडा प्राधिकरण के कब्जे वाली लगभग 3,81,527 वर्गमीटर भूमि से था, जो सेक्टर 140ए, 141, 142 और 143 में स्थित बताई गई। हाईकोर्ट के फैसले में विभागीय आरोपों को विस्तार से दर्ज किया गया है।
पहला आरोप—सर्वे और सैटेलाइट इमेजिंग
चार आरोपों वाले आरोपपत्र में पहला आरोप यह था कि शहदरा गांव की आबादी के निर्धारण के लिए सैटेलाइट इमेजिंग के माध्यम से सर्वे किया जाना था, लेकिन आरोप के अनुसार ऐसा नहीं किया गया।
विभाग का आरोप था कि सर्वे रिपोर्ट में गांव के बाहर के लोगों, निजी कंपनियों और अन्य भू-स्वामियों को भी आबादी क्षेत्र में शामिल कर दिया गया। साथ ही महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने का आरोप लगाया गया।
रिपोर्ट के कॉलम नंबर 9 में मूल खातेदार/काश्तकारों के नाम दर्ज नहीं किए जाने और कॉलम नंबर 13 में विनियमन समिति के सामने रखे जाने वाले क्षेत्रफल का उल्लेख नहीं किए जाने का आरोप भी लगाया गया।
यहीं से मामला गंभीर हो जाता है, क्योंकि विभागीय आरोप के अनुसार इस प्रकार की रिपोर्ट के आधार पर ऐसी जमीनों के लीजबैक का रास्ता खुला, जिनके पात्रता संबंधी सवाल उठाए गए थे।
दूसरा आरोप—कमेटी के सामने भ्रामक रिपोर्ट
दूसरे आरोप में कहा गया कि सर्वे रिपोर्ट को जिला मजिस्ट्रेट/वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आदि की अध्यक्षता वाली समिति के सामने प्रस्तुत किया गया और कथित रूप से तथ्यों को छिपाते हुए 12 सितंबर 2011 और 21 सितंबर 2011 की बैठकों में मंजूरी हासिल हुई।
इसके बाद 7 अक्टूबर 2011 को नायब तहसीलदार को 16 व्यक्तियों/कंपनियों के पक्ष में लीज डीड निष्पादित करने के निर्देश दिए गए।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि संबंधित आबादी विनियमों के अनुसार नियमितीकरण का अधिकार मूल ग्रामीण निवासियों से जुड़ा था और अधिकतम 450 वर्गमीटर भूमि की सीमा का उल्लेख किया गया था। विभाग का आरोप था कि इसके बावजूद गांव के बाहर के लोगों के पक्ष में लीज कराई गई।
तीसरा आरोप—18 लीज डीड, जिनमें 15 पर सवाल
तीसरे आरोप में कहा गया कि 7 अक्टूबर 2011 के निर्देश के बाद नायब तहसीलदार ने उसी दिन 18 लीज डीड निष्पादित कीं।
इनमें से 15 लीज डीड को विभाग ने नियमों के विपरीत बताया।
हाईकोर्ट के आदेश में दर्ज विवरण के अनुसार इनमें—
- 3 लीज डीड निजी कंपनियों के पक्ष में,
- 6 गांव से बाहर के लोगों के पक्ष में,
- 8 ऐसे व्यक्तियों के पक्ष में, जो गांव के निवासी होने के बावजूद कथित तौर पर लीज के लिए पात्र नहीं थे,
बताई गईं।
इसके अतिरिक्त एक लीज डीड श्रीमती ज्योति शर्मा के पक्ष में किए जाने का आरोप भी था, जिसके संबंध में समिति की स्वीकृति न होने की बात कही गई।
चौथा आरोप—बाद में बदले नियम को पहले से लागू करना
चौथा आरोप पहले तीन आरोपों से जुड़ा था। इसमें कहा गया कि आबादी विनियमों में 18 नवंबर 2011 को सरकारी अधिसूचना के माध्यम से संशोधन हुआ था, लेकिन विभागीय आरोप के अनुसार प्रस्तुत सर्वे रिपोर्ट के माध्यम से संशोधित प्रावधानों को उनकी वास्तविक संशोधन तिथि से पहले प्रभावी करने की स्थिति पैदा की गई।
यानी विभागीय जांच का मूल सवाल केवल जमीन आवंटन नहीं था, बल्कि सर्वे, पात्रता, समिति के सामने रखे गए तथ्यों और नियमों के लागू होने की तारीख से भी जुड़ा था।
2013 से 2021 तक मामला क्यों अटका रहा?
हरीश चंद्र ने आरोपों का जवाब 23 मई 2014 को दिया और बाद में 9 जुलाई 2015 को पूरक जवाब भी दिया। लेकिन विभागीय कार्यवाही लंबे समय तक चलती रही।
इसी दौरान 15 मई 2019 की चयन समिति की बैठक में उन्हें IAS कैडर में पदोन्नति के लिए अनुशंसित किया गया, लेकिन विभागीय जांच लंबित होने के कारण उनकी पदोन्नति की सिफारिश सीलबंद लिफाफे में रखी गई।
इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण का दरवाजा खटखटाया।
2021 में अधिकरण ने क्या कहा?
हरीश चंद्र की याचिका पर 8 जनवरी 2021 को अधिकरण ने विभागीय कार्यवाही को तुरंत समाप्त नहीं किया, बल्कि अनुशासनिक प्राधिकारी को कार्यवाही पूरी करने के लिए तीन महीने का समय दिया।
साथ ही महत्वपूर्ण शर्त लगाई गई कि यदि तीन महीने में कार्यवाही पूरी नहीं होती है तो वह निरस्त/नलिटी मानी जाएगी।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार इसके बाद जांच तेज हुई और 1 मार्च 2021 को जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें चारों आरोप सिद्ध पाए जाने की बात दर्ज है। इसके बाद 9 मार्च 2021 को कारण बताओ नोटिस दिया गया और हरीश चंद्र ने 25 मार्च 2021 को जवाब भेजा, जो विभाग को 5 अप्रैल 2021 को प्राप्त हुआ।
तीन महीने की समयसीमा 8 अप्रैल 2021 को समाप्त हो गई।
लेकिन विभाग ने समय-विस्तार के लिए आवेदन 12 जुलाई 2021 को दाखिल किया।
यहीं से हाईकोर्ट में असली कानूनी सवाल उठा
विभाग का कहना था कि कोरोना की दूसरी लहर के कारण सरकारी कामकाज प्रभावित हुआ। संबंधित अधिकारी के कोविड संक्रमित होने और रोजमर्रा के प्रशासनिक कामकाज में बाधा आने के कारण कार्यवाही समय पर पूरी नहीं हो सकी।
दूसरी तरफ हरीश चंद्र की ओर से तर्क दिया गया कि तीन महीने की समयसीमा खत्म होते ही कार्यवाही नलिटी हो चुकी थी और उसके बाद समय-विस्तार मांगा ही नहीं जा सकता था।
लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण गाइडलाइन
हाईकोर्ट ने Abhishek Prabhakar Awasthi मामले में पूर्ण पीठ के फैसले और सुप्रीम कोर्ट के Ram Prakash Singh मामले में दिए गए सिद्धांतों को आधार बनाया।
पूर्ण पीठ की गाइडलाइन का सार यह है कि यदि अदालत द्वारा तय समय में विभागीय जांच पूरी नहीं हो पाती तो नियोक्ता/विभाग समय-विस्तार के लिए अदालत में आवेदन कर सकता है और देरी के कारण बताने होंगे।
अदालत तथ्यों और परिस्थितियों को देखकर तय करेगी कि समय बढ़ाया जाए या नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि समय-विस्तार का आवेदन समयसीमा समाप्त होने के बाद भी किया जा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विभाग अदालत की समयसीमा को नजरअंदाज कर मनमाने ढंग से कार्यवाही जारी रख सकता है। समय-विस्तार के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन भी महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Ram Prakash Singh फैसले के पैराग्राफ 62 से 65 का उल्लेख किया।
उसमें कहा गया कि संस्थागत बाधाओं के कारण हर मामले में समयसीमा खत्म होने से पहले विस्तार मांगना संभव नहीं हो सकता। हालांकि समयसीमा खत्म होने से पहले विस्तार मांगना वांछनीय है।
असाधारण परिस्थितियों में समयसीमा समाप्त होने के बाद भी आवेदन किया जा सकता है और अदालत कारणों को देखकर उसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
लेकिन यदि कर्मचारी समयसीमा के बाद कार्यवाही जारी रखने पर आपत्ति करता है तो विभाग को आगे बढ़ने के बजाय समय-विस्तार मांगना चाहिए और अनुमति मिलने तक कार्यवाही रोकनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालत/अधिकरण के आदेशों की गरिमा और कानून के शासन को बनाए रखना जरूरी है। यदि समयसीमा के साथ यह शर्त हो कि समय पर जांच पूरी न होने पर कार्यवाही समाप्त मानी जाएगी, तो विभाग तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक उस शर्त को हटाने/रिकॉल करने की अनुमति न मिल जाए।
कोविड को लेकर हाईकोर्ट ने क्या माना?
हाईकोर्ट ने माना कि समय-विस्तार का आवेदन देर से आया, लेकिन यह भी देखा कि उस समय कोविड-19 की दूसरी लहर के कारण सरकारी कामकाज प्रभावित था।
सुप्रीम कोर्ट ने कोविड परिस्थितियों को देखते हुए 15 मार्च 2020 से 28 फरवरी 2022 तक की अवधि को limitation की गणना से बाहर रखने के निर्देश दिए थे।
हाईकोर्ट ने माना कि इस असाधारण परिस्थिति का प्रभाव समय-विस्तार आवेदन की देरी पर भी विचार करने योग्य था। इसलिए अधिकरण द्वारा केवल यह कहकर आवेदन खारिज करना कि समयसीमा समाप्त हो चुकी थी, कानून के अनुरूप नहीं था।
हाईकोर्ट ने अधिकरण का आदेश पलटा, लेकिन आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं दिया
यह बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है।
हाईकोर्ट ने 16 नवंबर 2021 के अधिकरण के उस आदेश को गलत माना, जिसमें समय-विस्तार आवेदन को केवल समयसीमा समाप्त होने के आधार पर खारिज किया गया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि हरीश चंद्र के खिलाफ लगाए गए चारों आरोप सही हैं या गलत।
अदालत ने साफ किया कि उसके सामने तत्काल विवाद समय-विस्तार आवेदन और अधिकरण के आदेश की वैधता का था। फिर भी, चूंकि विभागीय कार्यवाही 2013 से लंबित थी, अदालत ने न्यायहित में कहा कि अंतिम आदेश पारित करते समय हरीश चंद्र की ओर से प्रस्तुत अतिरिक्त सामग्री पर भी अनुशासनिक प्राधिकारी विचार करे।
चार सप्ताह की अंतिम समयसीमा
हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि विभागीय कार्यवाही अंतिम आदेश पारित करने के चरण तक पहुंच चुकी है, इसलिए अनुशासनिक प्राधिकारी को चार सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेना होगा।
और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो पूरी विभागीय कार्यवाही लैप्स मानी जाएगी और 8 जनवरी 2021 के अधिकरण के आदेश को उस सीमा तक संशोधित माना जाएगा। इसके बाद हाईकोर्ट ने राज्य की रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
फिर सरकार ने क्या किया?
इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने उपलब्ध विभागीय रिकॉर्ड, जांच में सिद्ध पाए गए आरोपों, लोक सेवा आयोग की सहमति और हाईकोर्ट के 3 सितंबर 2026 के आदेश को आधार बनाकर 28 सितंबर 2026 को हरीश चंद्र को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार शासनादेश में इन्हीं आधारों का उल्लेख किया गया है।
पर्दाफाश न्यूज़ का निष्कर्ष
पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो यह कहना अधिक सही होगा कि हाईकोर्ट ने हरीश चंद्र को बर्खास्त करने का आदेश नहीं दिया था। अदालत ने विभागीय कार्यवाही को केवल समयसीमा के तकनीकी आधार पर समाप्त करने से इनकार किया, अधिकरण के समय-विस्तार संबंधी आदेश को गलत माना और अनुशासनिक प्राधिकारी को अंतिम निर्णय के लिए चार सप्ताह का अवसर दिया।
वहीं दूसरी ओर, विभागीय जांच में दर्ज आरोपों में सर्वे प्रक्रिया, सैटेलाइट इमेजिंग का इस्तेमाल न करने, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने, पात्रता से बाहर के व्यक्तियों/कंपनियों के पक्ष में लीज डीड और समिति के समक्ष भ्रामक रिपोर्ट जैसे गंभीर बिंदु शामिल थे। इन आरोपों को विभागीय जांच में सिद्ध माना गया, और बाद में शासन ने उपलब्ध रिकॉर्ड तथा न्यायिक आदेशों के आधार पर बर्खास्तगी का फैसला लिया।
एक और सावधानी जरूरी है: मामले से जुड़ी खबरों में जमीन के कथित बाजार मूल्य को लगभग ₹4,000 करोड़ बताया गया है, जबकि हाईकोर्ट के आदेश के जिस पाठ की प्रति उपलब्ध है, उसके एक हिस्से में मूल्य संबंधी आंकड़ा अलग दिखाई देता है। इसलिए संपत्ति के मूल्य को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में लिखने के बजाय इसे शासन/जांच से संबंधित रिपोर्ट में बताए गए अनुमान के रूप में प्रस्तुत करना अधिक तथ्यपरक होगा।
पर्दाफाश न्यूज़ के लिए इस पूरे मामले की सबसे अहम बात यही है—हाईकोर्ट ने विभाग को मनमानी छूट नहीं दी, बल्कि यह स्पष्ट किया कि अदालत द्वारा तय समयसीमा का सम्मान करते हुए, वास्तविक और असाधारण कारण होने पर न्यायालय से समय-विस्तार लेना होगा। इसी न्यायिक प्रक्रिया के बाद विभागीय कार्रवाई अपने अंतिम चरण तक पहुंची और उत्तर प्रदेश सरकार ने हरीश चंद्र को निलंबित नहीं बल्कि सरकारी सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी किया।















