“5 लाख रुपये मुआवजे और डीएम के खिलाफ कार्रवाई वाले हिस्से पर सुप्रीम कोर्ट की रोक; आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने का आदेश बरकरार”
नई दिल्ली/नोएडा: गौतमबुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) मेधा रूपम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है, लेकिन शीर्ष अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रोक केवल हाईकोर्ट के उन हिस्सों पर है, जिनमें डीएम मेधा रूपम के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की गई थीं, उनके खिलाफ कदम उठाने की बात कही गई थी और छात्रा आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
वहीं, आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत की गई हिरासत को रद्द करने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है। इस महत्वपूर्ण अंतर को लेकर पैदा हुई भ्रम की स्थिति को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने आदेश में छोटा सा बदलाव करते हुए स्थिति स्पष्ट की।
मामले में अब अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को होगी। इस दौरान डीएम मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल याचिकाओं पर आगे सुनवाई की जाएगी।
हाईकोर्ट के किन हिस्सों पर लगी रोक?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत को रद्द करते हुए डीएम मेधा रूपम के खिलाफ भी कई गंभीर टिप्पणियां की थीं। हाईकोर्ट के आदेश के पैरा 27 से 33 में डीएम की भूमिका और उनके खिलाफ कार्रवाई से संबंधित निर्देश दिए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इन्हीं पैरा 27 से 33 पर रोक लगाई थी। इसके अलावा छात्रा को 5 लाख रुपये मुआवजा देने से संबंधित निर्देश पर भी रोक लगाई गई है।
हालांकि, हाईकोर्ट के जिस पैरा में आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द करने का मूल आदेश दर्ज था, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई। हाईकोर्ट का यह आदेश छात्रा की हिरासत की वैधता से सीधे जुड़ा है और फिलहाल वह प्रभावी है।
यही अंतर इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बन गया है।
‘पूरे फैसले पर रोक’ की खबरों से पैदा हुआ भ्रम
सुप्रीम कोर्ट के बुधवार के आदेश के बाद सार्वजनिक स्तर पर यह खबर तेजी से सामने आई कि शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक लगा दी है। हालांकि, गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ऐसा नहीं है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में बदलाव कर साफ किया कि हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक नहीं लगाई गई है। रोक केवल उन हिस्सों तक सीमित है, जिनमें डीएम के खिलाफ टिप्पणियां, कार्रवाई संबंधी निर्देश और 5 लाख रुपये मुआवजे का आदेश शामिल है।
इस स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया कि आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द करने वाला हाईकोर्ट का मूल आदेश फिलहाल कायम है।
मामले में दो अलग-अलग याचिकाएं
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की गई थीं। एक याचिका गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम की ओर से दाखिल की गई, जबकि दूसरी याचिका उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से आई।
डीएम की याचिका में मुख्य रूप से उनके खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश में की गई टिप्पणियों और कार्रवाई संबंधी निर्देशों पर रोक लगाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस हिस्से में उन्हें राहत दी है।
दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक लगाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल पूरे फैसले पर रोक लगाने का आदेश नहीं दिया है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि डीएम को व्यक्तिगत रूप से राहत मिली है, लेकिन आकृति चौधरी की NSA हिरासत को रद्द करने वाला हाईकोर्ट का आदेश अभी बरकरार है।
क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा मामला अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई कार्रवाई से जुड़ा है। प्रदर्शन के दौरान स्थिति बिगड़ने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था।
आकृति की हिरासत को लेकर कानूनी चुनौती इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंची। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को छात्रा के खिलाफ NSA के तहत की गई कार्रवाई को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में डीएम की भूमिका पर भी सवाल उठाए और छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। आदेश में यह भी कहा गया था कि मुआवजे की रकम डीएम और संबंधित अधिकारियों के निजी वेतन से वसूली जाए।
हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों और निर्देशों के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने डीएम की व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर उठाया सवाल
डीएम मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत की प्रशासनिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को NSA जैसे कानून के तहत हिरासत में लेने की प्रक्रिया केवल एक अधिकारी के स्तर पर पूरी नहीं होती। यह एक बहु-स्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जिसमें ऊपर से नीचे तक कई अधिकारी शामिल होते हैं।
ऐसे में किसी हिरासत के फैसले के लिए केवल जिला मजिस्ट्रेट को अकेले जिम्मेदार ठहराने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
यही बात डीएम की याचिका के संदर्भ में अहम मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के उन हिस्सों पर रोक लगाई है, जिनमें डीएम के खिलाफ कार्रवाई और व्यक्तिगत रूप से मुआवजा देने संबंधी निर्देश शामिल हैं।
आकृति की NSA हिरासत का आदेश अभी कायम
इस मामले का सबसे अहम कानूनी पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने वाले हाईकोर्ट के मूल आदेश पर रोक नहीं लगाई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को छात्रा की NSA हिरासत को अवैध मानते हुए उसे रद्द कर दिया था। यह आदेश हाईकोर्ट के पैरा 25 में दर्ज था।
सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस पैरा पर रोक नहीं लगाए जाने का मतलब है कि आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने वाला हाईकोर्ट का आदेश फिलहाल प्रभावी बना हुआ है।
वहीं, हाईकोर्ट के पैरा 27 से 33, जिनमें डीएम के खिलाफ टिप्पणियां और कार्रवाई से संबंधित निर्देश थे, उन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
7 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई
अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को होगी। उस दिन सुप्रीम कोर्ट के सामने मामले के विभिन्न कानूनी पहलुओं पर आगे सुनवाई होगी।
फिलहाल शीर्ष अदालत के आदेश से दो बातें स्पष्ट हैं—पहली, डीएम मेधा रूपम के खिलाफ हाईकोर्ट के प्रतिकूल निर्देशों और 5 लाख रुपये के मुआवजे वाले हिस्से पर रोक है। दूसरी, आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने वाले हाईकोर्ट के मूल आदेश पर रोक नहीं है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक लगा दी है।
अब आगे क्या?
मामले की अगली सुनवाई तक डीएम के खिलाफ हाईकोर्ट के जिन हिस्सों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है, वे प्रभावी नहीं रहेंगे। दूसरी ओर, आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने वाला आदेश फिलहाल कायम रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का अगला चरण इस बात पर महत्वपूर्ण होगा कि हिरासत की प्रशासनिक प्रक्रिया में अलग-अलग अधिकारियों की जिम्मेदारी किस तरह निर्धारित की जाती है और किसी निर्णय के लिए व्यक्तिगत अधिकारी को किस सीमा तक जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
फिलहाल शीर्ष अदालत का गुरुवार का स्पष्टीकरण इस मामले में पैदा हुए भ्रम को दूर करता है। डीएम मेधा रूपम को हाईकोर्ट की टिप्पणियों और मुआवजे के आदेश के मामले में अंतरिम राहत मिली है, लेकिन आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करने वाला हाईकोर्ट का फैसला अभी बरकरार है।















