Tuesday, September 22, 2026
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यूपी में 2027 से पहले बीजेपी-संघ का महामंथन: छह महीने पहले ही क्यों तेज हुई संगठन की हलचल?

“ध्रुवीकरण से जातीय समीकरण की ओर बदलते चुनावी विमर्श की चिंता, कार्यकर्ताओं और विधायकों की नाराजगी पर भी फोकस”

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का वक्त बाकी है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चुनावी तैयारियों की रफ्तार बढ़ा दी है। लखनऊ से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल तक लगातार संगठनात्मक बैठकें हो रही हैं। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर संगठन की स्थिति और जमीनी फीडबैक ले रहे हैं। वहीं, बीजेपी और संघ के बीच समन्वय बैठकों का सिलसिला भी तेज हुआ है।

इन बैठकों के केंद्र में सिर्फ बूथ मैनेजमेंट या चुनावी तैयारियां नहीं हैं, बल्कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल, कार्यकर्ताओं की नाराजगी, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की पकड़, अधिकारियों को लेकर शिकायतें और बदलते सामाजिक-जातीय समीकरण जैसे सवाल भी हैं। सबसे अहम बात यह है कि बीजेपी के सामने 2027 का चुनाव ऐसे समय में है, जब विपक्ष जातीय जनगणना, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है।

छह महीने पहले ही क्यों सक्रिय हुआ बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व?

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में एक साथ कई स्तरों पर संगठनात्मक गतिविधियां तेज की हैं। बीएल संतोष संगठन और सरकार के बीच तालमेल से जुड़े मुद्दों पर बैठकें कर रहे हैं, जबकि प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े लगातार अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर स्थानीय संगठन की स्थिति का जायजा ले रहे हैं।

अब राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी पश्चिमी यूपी के दौरे पर पहुंचे। मेरठ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ बूथ से लेकर जिला स्तर तक की चुनावी तैयारियों की समीक्षा की गई। उनके कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं और युवाओं के साथ सीधे संवाद पर भी जोर रहा।

बीजेपी के लिए इन बैठकों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी को उत्तर प्रदेश में अपने संगठन और सामाजिक समीकरणों की नए सिरे से समीक्षा करनी पड़ी है।

सबसे बड़ा सवाल: हिंदुत्व बनाम जातीय समीकरण

बीजेपी की चुनावी राजनीति में हिंदुत्व और कानून-व्यवस्था लंबे समय से प्रमुख मुद्दे रहे हैं। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में राजनीतिक विमर्श का एक बड़ा हिस्सा जातीय सामाजिक समीकरणों की ओर गया।

समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया था। अब 2027 से पहले अखिलेश यादव इस सामाजिक समीकरण को और विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

यही वजह है कि बीजेपी-संघ के मंथन में भी जातीय राजनीति और पीडीए की राजनीति को लेकर चर्चा की खबरें सामने आई हैं। पार्टी के सामने यह सवाल है कि अगर चुनाव का प्रमुख विमर्श धार्मिक ध्रुवीकरण से हटकर पिछड़ा, दलित, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और जातीय हिस्सेदारी पर केंद्रित होता है, तो संगठन को अपनी रणनीति में किस तरह बदलाव करना होगा।

विधायकों से लेकर कार्यकर्ताओं तक की नाराजगी पर नजर

बीजेपी के सामने दूसरा बड़ा मुद्दा स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लेकर मिल रहा फीडबैक है। संगठन के विभिन्न स्तरों पर ऐसी प्रतिक्रियाएं सामने आने की बात कही जा रही है कि कुछ विधायकों की अपने क्षेत्रों में पकड़ पहले जैसी नहीं रही है।

कहीं कार्यकर्ताओं की शिकायतें हैं, तो कहीं जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद की कमी की बात कही जा रही है। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरी भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

बीजेपी के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसका चुनावी ढांचा बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं पर काफी हद तक निर्भर करता है। अगर कार्यकर्ता सक्रिय नहीं रहते या संगठन के प्रति असंतोष महसूस करते हैं, तो चुनावी मशीनरी को जमीनी स्तर पर नुकसान पहुंच सकता है।

इसीलिए शीर्ष नेतृत्व की बैठकों में कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद और उनकी शिकायतें सुनने पर जोर दिया जा रहा है।

अधिकारी बनाम संगठन का मुद्दा भी गंभीर

सरकार, संगठन और प्रशासन के बीच तालमेल का सवाल भी बीजेपी के मंथन का अहम हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में समय-समय पर मंत्री, विधायक और पार्टी कार्यकर्ता अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें उठाते रहे हैं।

संगठन के भीतर यह सवाल भी उठता रहा है कि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों की बात प्रशासन तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रही है।

बीजेपी-संघ की समन्वय बैठकों में सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल तथा प्रशासनिक स्तर पर शिकायतों के समाधान की जरूरत पर चर्चा होने की रिपोर्ट है। चुनाव से पहले पार्टी के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को सरकार की योजनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच खुद को प्रभावी महसूस हो।

लखनऊ की समन्वय बैठक में बूथ से लेकर सरकार तक चर्चा

लखनऊ में बीजेपी और संघ के बीच हुई समन्वय बैठक को भी इसी व्यापक तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक में संगठन और सरकार के बीच तालमेल, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता और विपक्ष के राजनीतिक विमर्श का जवाब देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

यूजीसी से जुड़े विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार की स्थिति को जनता तक सही तरीके से पहुंचाने की रणनीति पर भी चर्चा की गई। कार्यकर्ताओं को आम लोगों के बीच सीधा संवाद बढ़ाने का संदेश दिए जाने की बात सामने आई।

इसके अलावा कार्यकर्ताओं की शिकायतें, जनप्रतिनिधियों को लेकर स्थानीय असंतोष, अधिकारियों के साथ तालमेल और संगठन के भीतर की खींचतान जैसे विषय भी मंथन का हिस्सा बताए गए हैं।

UGC विवाद ने सवर्ण असंतोष की चर्चा बढ़ाई

यूजीसी के नए नियमों से जुड़ा विवाद भी बीजेपी के लिए एक संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सामान्य वर्ग से जुड़े कुछ संगठनों ने इन नियमों का विरोध किया है। दिल्ली में प्रस्तावित यूजीसी विरोधी महापंचायत की भी चर्चा हुई, जिसे केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद स्थगित किए जाने की खबर सामने आई।

उत्तर प्रदेश के आगरा में भी इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन की खबरें सामने आईं। ऐसे में बीजेपी-संघ की बैठक में इस मुद्दे पर सरकार की स्थिति और उसके प्रयासों की जानकारी कार्यकर्ताओं तथा जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर चर्चा की रिपोर्ट महत्वपूर्ण हो जाती है।

पश्चिमी यूपी पर खास नजर, बदलते सामाजिक समीकरण चुनौती

नितिन नबीन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश दौरा भी बीजेपी की क्षेत्रवार रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। मेरठ में संगठनात्मक बैठक के बाद सहारनपुर में सांसदों, विधायकों और संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठक का कार्यक्रम रहा।

पश्चिमी यूपी बीजेपी के लिए सामाजिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम, पिछड़ा और सवर्ण मतदाताओं के अलग-अलग सामाजिक समीकरण चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं।

ऐसे में बीजेपी के सामने चुनौती केवल विपक्षी दलों की सक्रियता नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक समीकरणों को समझना और संगठन को उसके अनुरूप सक्रिय रखना भी है।

पूर्वांचल और अवध में तावड़े का फोकस

प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े भी लगातार अलग-अलग क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं। गोरखपुर, काशी, अवध और अन्य इलाकों में संगठनात्मक बैठकों के जरिए स्थानीय राजनीतिक और संगठनात्मक स्थिति की समीक्षा की जा रही है।

इन बैठकों में मूल सवाल लगभग एक जैसे हैं—कहां विधायक कमजोर हैं, कहां कार्यकर्ता नाराज हैं, किस क्षेत्र में संगठन कमजोर हुआ है, कहां जातीय समीकरण बदल रहे हैं और किन इलाकों में विपक्ष का सामाजिक न्याय या पीडीए वाला संदेश प्रभाव डाल रहा है।

इससे साफ है कि बीजेपी 2027 की तैयारी को केवल लखनऊ-केंद्रित अभियान के तौर पर नहीं, बल्कि क्षेत्रवार राजनीतिक गणित के रूप में देख रही है।

संघ भी मैदान में, युवाओं से संवाद पर जोर

बीजेपी की तैयारियों के साथ संघ की गतिविधियां भी बढ़ी हैं। नोएडा और मुजफ्फरनगर में युवाओं के साथ संघ के संवाद कार्यक्रमों की खबरें सामने आई हैं। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश में संघ के कई अन्य कार्यक्रम भी प्रस्तावित बताए जा रहे हैं।

बीजेपी और संघ के बीच समन्वय का मुख्य उद्देश्य बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना और सरकार तथा संगठन के बीच तालमेल बेहतर करना बताया जा रहा है।

यानी चुनाव नजदीक आने से पहले ही सरकार, बीजेपी संगठन और संघ—तीनों स्तरों पर गतिविधियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा ने गिनाईं कई चुनौतियां

टीवी9 से बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा ने बीजेपी के सामने कई स्तरों पर चुनौतियों का उल्लेख किया। उनके मुताबिक, 2017 और 2022 की तुलना में इस बार पार्टी के सामने परिस्थितियां अलग हैं और जनता के बीच कुछ विधायकों को लेकर नाराजगी दिखाई दे रही है।

मिश्रा के अनुसार, विधायकों में अधिकारियों को लेकर असंतोष, कार्यकर्ताओं में सरकार को लेकर शिकायतें और यूजीसी के मुद्दे पर सवर्ण समाज के कुछ वर्गों की नाराजगी जैसे विषय पार्टी के लिए चुनौती बन सकते हैं। उन्होंने व्यापारियों के बीच यूपीआई से जुड़े मुद्दों और प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार की शिकायतों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने यह भी कहा कि इस बार चुनावी विमर्श 2024 की तरह जातीय आधार पर अधिक केंद्रित होता दिखाई दे रहा है। हालांकि ये आकलन और राजनीतिक टिप्पणियां उनके हैं, न कि स्वतंत्र रूप से सत्यापित निष्कर्ष।

बीजेपी के सामने अब सबसे बड़ी परीक्षा संगठन की

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के सामने सबसे बड़ी जरूरत अपने संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने की दिखाई दे रही है। पार्टी के पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नेतृत्व, बड़ा संगठनात्मक नेटवर्क और संघ का व्यापक ढांचा है।

दूसरी तरफ विपक्ष रोजगार, आरक्षण, जातीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता देने की कोशिश कर रहा है।

यही वजह है कि चुनाव से छह महीने पहले ही बीजेपी और संघ ने जमीनी फीडबैक जुटाने और संगठनात्मक कमियों को दूर करने की प्रक्रिया तेज कर दी है।

आने वाले महीनों में क्षेत्रवार बैठकें, बूथ स्तर की समीक्षा, संघ के साथ समन्वय और कार्यकर्ताओं के साथ सीधे संवाद का सिलसिला और बढ़ सकता है। असल परीक्षा यह होगी कि बैठकों में सामने आ रही शिकायतें कितनी जल्दी संगठनात्मक फैसलों में बदलती हैं और पार्टी बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच अपनी चुनावी रणनीति को किस तरह आकार देती है।

यूपी में 2027 की चुनावी तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन बीजेपी और संघ की बढ़ती सक्रियता यह संकेत जरूर दे रही है कि पार्टी चुनाव से पहले संगठन, सरकार और सामाजिक समीकरण—तीनों मोर्चों पर व्यापक समीक्षा कर रही है।

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VIKAS TRIPATHI
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