“अतिक्रमण से लेकर सफाई व्यवस्था तक नागरिकों के सवाल—सड़कों पर मशीनें चल रही हैं, लेकिन क्या शहर सच में साफ हो रहा है?”
नोएडा: देश के आधुनिक और सुनियोजित शहरों में शुमार नोएडा की पहचान चौड़ी सड़कों, व्यवस्थित सेक्टरों, हरित पट्टियों और बेहतर नागरिक सुविधाओं से होती है। लेकिन शहर की यह तस्वीर जमीन पर कितनी प्रभावी है, इसे लेकर अब नागरिकों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं।
नोएडा के जागरूक एवं सक्रिय नागरिकों ने प्राधिकरण के CEO कृष्णा करुणेश के नाम एक खुले पत्र के माध्यम से शहर की जमीनी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए उनसे फाइलों, बैठकों और AC ऑफिस से बाहर निकलकर स्वयं नोएडा की सड़कों पर उतरने की अपील की है।
नागरिकों का कहना है कि शहर का प्रशासन केवल फाइलों में दर्ज रिपोर्ट, शिकायतों के निस्तारण और कार्रवाई की तस्वीरों से नहीं चल सकता। अधिकारी जब तक खुद मौके पर जाकर स्थिति नहीं देखेंगे, तब तक जमीन और कागजों के बीच का अंतर पूरी तरह सामने नहीं आएगा।
अट्टा मार्केट की तस्वीर कई सवालों का आईना
नागरिकों ने अपने पत्र में अट्टा मार्केट को इसका स्पष्ट उदाहरण बताया है। उनका कहना है कि बाजार के कई हिस्सों में फुटपाथ के बड़े हिस्से पर अतिक्रमण दिखाई देता है। इससे पैदल चलने वालों के लिए निर्धारित स्थान प्रभावित होता है और कई जगह लोगों को सड़क के किनारे से गुजरना पड़ता है।
फुटपाथ केवल शहर की सुंदरता बढ़ाने के लिए नहीं होते। उनका मूल उद्देश्य पैदल यात्रियों को सुरक्षित और सुगम आवागमन उपलब्ध कराना है।
ऐसे में जब फुटपाथ का उपयोग दूसरे कार्यों के लिए होने लगे, तो मामला सिर्फ अतिक्रमण का नहीं रह जाता। यह नागरिक सुरक्षा, यातायात व्यवस्था और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के इस्तेमाल से जुड़ा विषय बन जाता है।
नागरिकों का कहना है कि ऐसी ही चिंताएं नोएडा के कई 7X सेक्टरों और WC-6 को लेकर भी समय-समय पर सामने आती रही हैं।
कार्रवाई के बाद फिर वही अतिक्रमण—तो समाधान कहां है?
अतिक्रमण के खिलाफ प्राधिकरण की ओर से समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं। टीमें मौके पर पहुंचती हैं, कार्रवाई की जाती है और तस्वीरें भी रिकॉर्ड का हिस्सा बनती हैं।
लेकिन नागरिकों का सवाल है कि कार्रवाई के कुछ समय बाद अगर उसी स्थान पर अतिक्रमण फिर लौट आए तो क्या समस्या वास्तव में हल हुई?
यही सवाल IGRS शिकायतों के निस्तारण को लेकर भी उठता है।
किसी शिकायत पर कार्रवाई की तस्वीर यह बता सकती है कि उस समय अतिक्रमण हटाया गया था। लेकिन तस्वीर यह प्रमाणित नहीं करती कि समस्या भविष्य में दोबारा नहीं आएगी।
यदि कुछ समय बाद वही स्थिति फिर बन जाती है, तो नागरिक के लिए शिकायत बंद होना और समस्या का समाधान होना दो अलग-अलग बातें हो जाती हैं।
इसलिए नागरिकों ने मांग की है कि अतिक्रमण संबंधी शिकायत को बंद करने से पहले जमीनी सत्यापन और कार्रवाई के बाद फॉलो-अप निरीक्षण को व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।
सफाई के नाम पर बड़ी-बड़ी मशीनरी, लेकिन जमीन पर परिणाम कहां?
नागरिकों ने खुले पत्र में शहर की सफाई व्यवस्था और सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाली बड़ी मशीनरी को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
उनका कहना है कि प्राधिकरण ने सफाई के नाम पर बड़ी-बड़ी मशीनरी और वाहन तैनात कर रखे हैं। सड़क पर ये मशीनें और वाहन चलते हुए दिखाई भी देते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इनका वास्तविक परिणाम भी नागरिकों को दिखाई देता है?
नागरिकों की शिकायत है कि कई जगह मशीनें केवल सड़क पर चलती हुई दिखाई देती हैं, जबकि जमीन पर अपेक्षित सफाई नजर नहीं आती। कई बार यह भी स्पष्ट नहीं होता कि किस स्थान पर कितनी देर सफाई की गई, क्या-क्या साफ किया गया और सफाई के बाद उसकी गुणवत्ता की जांच किस अधिकारी ने की।
सबसे बड़ा सवाल निगरानी व्यवस्था को लेकर है।
यदि कोई सफाई वाहन या मशीन सड़क पर निकलती है तो उसकी गतिविधि पर निगरानी कौन रखता है? क्या कोई अधिकारी या सुपरवाइजर यह सुनिश्चित करता है कि मशीन वास्तव में निर्धारित स्थान की सफाई कर रही है? क्या सफाई के बाद मौके का निरीक्षण किया जाता है?
नागरिकों का कहना है कि कई जगह मशीनें चलती जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन सफाई का स्थायी असर नजर नहीं आता। कुछ स्थानों पर वाहन और मशीनें गुजरने के दौरान सड़क किनारे मौजूद कचरा पूरी तरह उठने के बजाय इधर-उधर फैलने की शिकायत भी नागरिकों द्वारा की जाती है।
यानी सवाल मशीनरी की संख्या का नहीं, मशीनरी के इस्तेमाल और उसके परिणाम की निगरानी का है।
मशीन चल रही है या सफाई हो रही है—दोनों में फर्क समझना होगा
नागरिकों के मुताबिक, सड़क पर सफाई वाहन का दिखाई देना अपने आप में सफाई व्यवस्था की सफलता का प्रमाण नहीं हो सकता।
जरूरी यह है कि मशीन के गुजरने के बाद सड़क, किनारा, फुटपाथ और आसपास का क्षेत्र वास्तव में कितना साफ हुआ।
यदि मशीन चली और कुछ देर बाद वही कचरा दोबारा दिखाई देने लगा, या मशीन की गतिविधि के दौरान कचरा दूसरे हिस्से में फैल गया, तो इस पूरी प्रक्रिया की समीक्षा की जरूरत है।
यही कारण है कि नागरिक चाहते हैं कि सफाई व्यवस्था में भी आउटकम आधारित निगरानी हो।
अर्थात केवल यह दर्ज न हो कि वाहन कितनी बार चला, बल्कि यह भी दर्ज हो कि किस क्षेत्र की सफाई हुई, सफाई का स्तर क्या था और बाद में मौके पर स्थिति कैसी रही।
कौन देख रहा है कि वाहन ने वास्तव में क्या काम किया?
नागरिकों का एक अहम सवाल यह भी है कि सफाई मशीनरी और वाहनों की फील्ड गतिविधियों की नियमित जांच कौन करता है।
यदि कोई वाहन अपने निर्धारित क्षेत्र में गया, तो क्या संबंधित अधिकारी मौके पर इसकी पुष्टि करता है?
यदि मशीन किसी स्थान पर रुकी, तो क्या वहां वास्तविक सफाई हुई?
यदि सफाई हुई तो उसका परिणाम क्या रहा?
और यदि किसी स्थान पर लंबे समय से सफाई की समस्या बनी हुई है, तो मशीनरी के बार-बार गुजरने के बावजूद समस्या क्यों बनी रहती है?
इन सवालों का जवाब केवल कागजी रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि अचानक किए गए जमीनी निरीक्षण से मिल सकता है।
औचक निरीक्षण ही दिखाएगा नोएडा की असली तस्वीर
खुले पत्र में नागरिकों ने वरिष्ठ अधिकारियों के औचक जमीनी निरीक्षण पर विशेष जोर दिया है।
नागरिकों का कहना है कि यदि निरीक्षण पहले से तय हो तो तैयारी की संभावना रहती है। इसके विपरीत अचानक किया गया निरीक्षण उस समय की वास्तविक स्थिति सामने ला सकता है।
किसी व्यक्ति या अधिकारी पर कोई आरोप लगाए बिना नागरिकों ने यह सुझाव दिया है कि यदि व्यवस्था को लेकर जनता में कोई धारणा बन रही है, तो उसे दूर करने का सबसे बेहतर तरीका पारदर्शी और आकस्मिक निरीक्षण है।
CEO स्वयं अचानक किसी बाजार, सेक्टर या सड़क पर पहुंचें और देखें—
सड़क कितनी साफ है?
फुटपाथ की वास्तविक स्थिति क्या है?
अतिक्रमण दोबारा तो नहीं लौटा?
सफाई मशीनरी वास्तव में काम कर रही है या केवल गुजर रही है?
और फील्ड अधिकारी मौके पर मौजूद हैं या नहीं?
पूर्व अधिकारियों के जमीनी निरीक्षण का नागरिकों ने किया उल्लेख
नागरिकों ने अपने पत्र में पूर्व में ऋतु माहेश्वरी और लोकेश एम. के कार्यकाल का भी उल्लेख किया है।
उनका कहना है कि उस समय वरिष्ठ अधिकारियों को विभिन्न क्षेत्रों का जमीनी निरीक्षण करते देखा जाता था। मौके पर जाकर स्थिति देखने के बाद संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए जाते थे।
नागरिकों के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों की ऐसी फील्ड विजिट से प्रशासनिक मशीनरी में सक्रियता और जवाबदेही का संदेश जाता है।
हालांकि वर्तमान व्यवस्था को लेकर नागरिकों की धारणा है कि हाल के महीनों में इस तरह के नियमित और आकस्मिक निरीक्षणों की सक्रियता कम दिखाई दे रही है।
CEO से हर सप्ताह कम से कम दो औचक निरीक्षण की मांग
नागरिकों ने CEO कृष्णा करुणेश से मांग की है कि वे हर सप्ताह कम से कम दो औचक जमीनी निरीक्षण करें।
अलग-अलग बाजारों, सेक्टरों, सफाई-प्रवण क्षेत्रों और शिकायत वाले स्थानों को निरीक्षण के लिए चुना जाए।
विशेष रूप से अट्टा मार्केट, WC-6 और 7X सेक्टरों में बिना पूर्व सूचना निरीक्षण किया जाए।
सफाई व्यवस्था की मशीनरी और वाहनों का भी औचक निरीक्षण किया जाए, ताकि यह देखा जा सके कि कागजों में दर्ज गतिविधि और जमीन पर वास्तविक कार्य में कितना अंतर है।
IGRS में ‘निस्तारित’ लिखने से समस्या खत्म नहीं होती
नागरिकों का कहना है कि IGRS जैसी शिकायत प्रणाली तभी प्रभावी होगी जब शिकायत का निस्तारण वास्तविक समाधान में बदले।
यदि शिकायत के बाद अतिक्रमण हटाया गया लेकिन कुछ समय बाद फिर लौट आया, तो समस्या स्थायी रूप से हल नहीं हुई।
इसी तरह यदि सफाई की शिकायत पर वाहन भेज दिया गया लेकिन कुछ समय बाद वही स्थिति बनी रही, तो केवल वाहन भेजना समाधान नहीं माना जा सकता।
इसलिए नागरिकों ने सुझाव दिया है कि—
IGRS शिकायत बंद करने से पहले जमीनी सत्यापन हो।
प्रवर्तन और सफाई अभियान के बाद फॉलो-अप निरीक्षण हो।
बार-बार समस्या वाले स्थानों की अलग निगरानी सूची बने।
औचक अभियानों की जानकारी सीमित रखी जाए।
और अधिकारियों की जवाबदेही केवल कार्रवाई की संख्या नहीं, बल्कि स्थायी परिणामों से तय हो।
फाइल में साफ, सड़क पर गंदा—यह अंतर खत्म करना होगा
नोएडा जैसे नियोजित शहर में प्रशासन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जा सकती कि कितनी मशीनें खरीदी गईं, कितने वाहन सड़क पर उतारे गए या कितनी शिकायतें निस्तारित की गईं।
असल सवाल यह है कि नागरिक को सड़क पर क्या दिखाई दे रहा है।
अगर फाइल में सफाई पूरी है लेकिन सड़क पर कचरा मौजूद है, तो समीक्षा जरूरी है।
अगर रिकॉर्ड में अतिक्रमण हट चुका है लेकिन फुटपाथ फिर घिर गया है, तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अगर मशीनें लगातार सड़क पर चल रही हैं लेकिन सफाई का असर दिखाई नहीं दे रहा, तो मशीनरी के संचालन और निरीक्षण व्यवस्था की जांच जरूरी है।
CEO साहब, AC ऑफिस छोड़कर एक दिन सड़क पर निकलकर देखिए
नागरिकों का यह खुला पत्र किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि प्रशासन से जमीनी जवाबदेही और बेहतर नागरिक सुविधाओं की अपेक्षा है।
नागरिक चाहते हैं कि CEO कृष्णा करुणेश कभी बिना पूर्व सूचना के शहर के किसी हिस्से में पहुंचें।
अट्टा मार्केट का फुटपाथ देखें।
7X सेक्टरों की स्थिति देखें।
WC-6 का निरीक्षण करें।
सफाई मशीनरी को मौके पर देखें।
उस मशीन के पीछे की सड़क देखें और यह भी देखें कि मशीन गुजरने के बाद वास्तव में कितना कचरा उठा और कितना वहीं रह गया।
IGRS में बंद की गई शिकायतों के कुछ स्थानों पर अचानक पहुंचकर देखें कि जमीन पर समस्या खत्म हुई या सिर्फ फाइल बंद हुई।
क्योंकि नोएडा की असली तस्वीर AC ऑफिस की रिपोर्ट में नहीं, सड़क पर दिखाई देती है।
मशीन का सड़क पर चलना सफाई नहीं है—सफाई का परिणाम सड़क पर दिखाई देना चाहिए।
फाइल में ‘निस्तारित’ लिख देना समाधान नहीं, नागरिक की परेशानी का वास्तव में खत्म होना ही असली समाधान है।
— नोएडा के जागरूक एवं सक्रिय नागरिक















