“सेव डेमोक्रेसी मार्च’ से लेकर ‘जेल भरो आंदोलन’ तक गरमाया चुनावी विवाद—CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, SIR पर रोक और कार्रवाई की मांग; 4 अक्टूबर को उद्धव-राज ठाकरे का संयुक्त मोर्चा”
नई दिल्ली/मुंबई। गांधी जयंती के दिन देश की राजनीति में चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर विरोध का तापमान और बढ़ गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और नागरिक समूहों ने अलग-अलग मोर्चों से आंदोलन का ऐलान किया है। INDIA ब्लॉक ने 2 अक्टूबर से देश के सभी जिलों में ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकालने की घोषणा की है, जबकि दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन और मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के आंदोलन को लेकर प्रशासन ने अनुमति नहीं दी है। इसके बावजूद आयोजकों ने कार्यक्रम आगे बढ़ाने की घोषणा की है।
मुद्दे के केंद्र में Special Intensive Revision यानी SIR, मतदाता सूचियों में बदलाव, चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही से जुड़े सवाल हैं। विपक्ष और आंदोलनकारी संगठनों की ओर से गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली को वैधानिक बताते हुए निर्णयों को सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही है। ऐसे में अब विवाद सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सड़क से लेकर संस्थागत जवाबदेही तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।
देश के जिलों तक पहुंचेगा ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’
INDIA ब्लॉक ने 2 अक्टूबर से देशभर में जिला स्तर पर ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ का कार्यक्रम घोषित किया है। इसके तहत जिलों में मार्च निकालकर जिलाधिकारियों के कार्यालयों तक पहुंचने और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को उठाने की योजना है। विपक्षी दलों का कहना है कि मतदाता सूची में होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा संबंध नागरिक के मतदान के अधिकार से है, इसलिए इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है।
यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है जब SIR को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि मतदाता सूची में बदलाव के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने प्रक्रियागत आपत्तियों और निर्णयों को लेकर उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष रखा है।
यानी अब असली टकराव इस बात पर है कि मतदाता सूची को संशोधित करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और आम मतदाता को अपने नाम की स्थिति पर भरोसा कैसे मिले?
दिल्ली में जंतर-मंतर पर अनुमति नहीं, फिर भी आंदोलन की तैयारी
दिल्ली में 2 अक्टूबर को सुबह 11 बजे जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान AISA, RJD सांसद मनोज झा और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण सहित आयोजकों ने किया है। प्रदर्शन में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और CEC ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही से जुड़े मुद्दे उठाए जाने हैं।
दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं दी है। पुलिस सूत्रों के अनुसार संभावित भीड़ को देखते हुए जंतर-मंतर और नई दिल्ली क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई है। सड़कों पर बैरिकेड लगाए गए हैं तथा प्रवेश और निकास बिंदुओं पर अतिरिक्त बल तैनात किया गया है। विभिन्न रिपोर्टों में संभावित भीड़ का अनुमान करीब 3,000 से 4,000 लोगों तक बताया गया है।
इसका अर्थ साफ है—2 अक्टूबर को दिल्ली में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रस्तावित प्रदर्शन के बीच संतुलन कायम करने की होगी।
मुंबई में CJP का ‘जेल भरो’ ऐलान
मुंबई में कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आंदोलन का ऐलान किया है। संगठन ने 2 अक्टूबर को शिवाजी पार्क में प्रदर्शन की योजना बनाई थी, लेकिन पुलिस की ओर से वहां अनुमति नहीं दी गई।
मुंबई पुलिस का कहना है कि शिवाजी पार्क से संबंधित न्यायिक आदेश और वहां लागू प्रतिबंधों के कारण पुलिस इस स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति देने की स्थिति में नहीं है। पुलिस ने वैकल्पिक स्थल के रूप में आजाद मैदान का उल्लेख किया है।
इसके बाद CJP ने ‘जेल भरो आंदोलन’ का ऐलान किया। संगठन का कहना है कि वह अपनी मांगों को लेकर पीछे नहीं हटेगा। हालांकि किसी भी प्रदर्शन में प्रतिभागियों और प्रशासन दोनों के लिए कानून-व्यवस्था तथा वैधानिक निर्देशों का पालन महत्वपूर्ण रहेगा।
CJP की तीन बड़ी मांगें क्या हैं?
CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर तीन प्रमुख मांगें सामने रखी हैं—
पहली मांग—ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा।
दूसरी मांग—उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई।
तीसरी मांग—SIR पर रोक।
इसके साथ संगठन की ओर से जनवरी 2025 की मतदाता सूची बहाल करने की मांग भी उठाई गई है।
CJP का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि ये राजनीतिक और संगठनात्मक आरोप हैं, जिन पर संबंधित संस्थाओं का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
आदित्य ठाकरे का समर्थन, 4 अक्टूबर को बड़ा मुंबई मार्च
मुंबई का घटनाक्रम यहीं थमने वाला नहीं है। शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे ने CJP के आंदोलन को समर्थन दिया है। इसके अलावा उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे ने 4 अक्टूबर को मुंबई में संयुक्त विरोध मार्च का ऐलान किया है।
रिपोर्टों के मुताबिक यह मार्च बायकुला से BMC मुख्यालय की ओर निकाला जाना प्रस्तावित है और इसमें अन्य विपक्षी दलों को भी शामिल होने का निमंत्रण दिया गया है। कांग्रेस और NCP-SP ने भी इसमें भाग लेने की घोषणा की है।
राज और उद्धव ठाकरे का एक साथ सड़क पर उतरना महाराष्ट्र की राजनीति में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। दोनों दलों ने इस आंदोलन को चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े सवालों के खिलाफ बताया है।
विवाद के केंद्र में SIR—आखिर सवाल क्या है?
SIR यानी Special Intensive Revision मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा की प्रक्रिया है। इसके जरिए मतदाता सूची को अद्यतन और सत्यापित किया जाता है। लेकिन इस बार राजनीतिक विवाद इस बात पर केंद्रित है कि नाम जोड़ने, हटाने और सत्यापन की प्रक्रिया किस तरह लागू की जा रही है और उसका मतदाताओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
विपक्षी दलों और आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं के नाम प्रभावित होने का खतरा है। दूसरी ओर चुनाव आयोग ने प्रक्रियागत सवालों पर अपना पक्ष रखा है और SIR से जुड़े निर्णयों को वैधानिक प्रक्रिया के तहत लिए जाने की बात कही है।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोप और संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
चुनाव आयोग पर उठे सवाल, आयोग का भी अपना पक्ष
विवाद की एक बड़ी वजह चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर सामने आई रिपोर्टें भी हैं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने कुछ निर्णयों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। हालांकि चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों के आधार पर निर्णयों की वैधता पर उठाए जा रहे सवालों को खारिज किया और कहा कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
इसलिए पूरे विवाद को समझने के लिए आरोपों के साथ आयोग का जवाब और उपलब्ध दस्तावेज—दोनों को देखना जरूरी है।
सड़क से जिला कार्यालय और मुंबई से दिल्ली तक आंदोलन
2 अक्टूबर से शुरू हो रही गतिविधियों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि चुनावी प्रक्रिया अब सिर्फ चुनाव के समय का मुद्दा नहीं रह गई है। मतदाता सूची, SIR, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की जवाबदेही जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों तथा नागरिक संगठनों के आंदोलन का केंद्र बन चुके हैं।
एक तरफ दिल्ली में जंतर-मंतर को लेकर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच अनुमति का सवाल है, दूसरी तरफ मुंबई में शिवाजी पार्क को लेकर प्रशासनिक रोक के बावजूद CJP ने जेल भरो आंदोलन की घोषणा की है।
इसके बीच INDIA ब्लॉक का जिला स्तर तक मार्च और 4 अक्टूबर को उद्धव-राज ठाकरे का मुंबई मार्च आंदोलन को और व्यापक राजनीतिक आयाम दे रहा है।
अब असली परीक्षा प्रशासन और आंदोलनकारियों दोनों की
2 अक्टूबर का दिन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ही समय में कई शहरों में राजनीतिक और नागरिक संगठन सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार और कानून-व्यवस्था—दोनों को साथ लेकर चलना प्रशासन के लिए चुनौती होगी।
वहीं प्रदर्शनकारियों के सामने भी यह जिम्मेदारी होगी कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहे और प्रशासन द्वारा लगाए गए वैधानिक प्रतिबंधों का उल्लंघन न हो।
चुनाव लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत माध्यम है। इसलिए मतदाता सूची में एक नाम जुड़ने या हटने से लेकर चुनाव आयोग के प्रत्येक निर्णय तक पारदर्शिता और विश्वास का सवाल जुड़ा रहता है।
अब सवाल केवल यह नहीं है कि कौन सड़क पर उतर रहा है। बड़ा सवाल यह है कि उठाए गए सवालों का जवाब कौन देगा, किस मंच पर देगा और क्या उन जवाबों से मतदाता का भरोसा मजबूत होगा?
2 अक्टूबर से शुरू होने वाला यह आंदोलन उसी बड़े सवाल को देश के सामने रखने जा रहा है—मतदाता सूची की विश्वसनीयता, चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर अंतिम जवाब किसके पास है?
और 4 अक्टूबर को मुंबई में ठाकरे बंधुओं का प्रस्तावित मार्च इस बहस को महाराष्ट्र की सड़कों तक पहुंचाने की तैयारी में है।
पर्दाफाश न्यूज़ की नजर अब इस बात पर रहेगी कि आंदोलन कितना व्यापक होता है, प्रशासन की प्रतिक्रिया क्या रहती है और चुनाव आयोग इन राजनीतिक एवं नागरिक सवालों का संस्थागत स्तर पर क्या जवाब देता है।















