“ब्राह्मण–मुस्लिम–दलित से लेकर ओबीसी तक सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश, संगठन में बड़े फेरबदल ने बढ़ाई सियासी हलचल”
पर्दाफाश न्यूज़ | लखनऊ
उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 की विधानसभा जंग से काफी पहले कांग्रेस ने ऐसा संगठनात्मक फेरबदल किया है, जिसने उसके पुराने राजनीतिक आधार की वापसी को लेकर बहस तेज कर दी है। सवाल सीधा है—क्या कांग्रेस उत्तर प्रदेश में वही सामाजिक विस्तार दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रही है, जिसने कभी उसे प्रदेश की राजनीति में बेहद मजबूत स्थिति तक पहुंचाया था?
प्रदेश कांग्रेस की कमान अब रामपुर खास की विधायक और उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा ‘मोना’ को दी गई है। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इससे पहले जून 2026 में कांग्रेस ने दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का AICC प्रभारी नियुक्त किया था। हालिया फेरबदल में ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व से जुड़े नेताओं को भी संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं।
यानी संदेश केवल चेहरे बदलने का नहीं है। संगठन के शीर्ष स्तर पर अलग-अलग सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देने की कवायद साफ दिखाई देती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या संगठन की यह सामाजिक इंजीनियरिंग वोट में बदल पाएगी?
1985 की याद, जब कांग्रेस ने 269 सीटों पर मारी थी बाजी
कांग्रेस के मौजूदा प्रयोग को समझने के लिए 1985 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण संदर्भ देता है। उस समय विधानसभा में 425 सीटें थीं और कांग्रेस ने 269 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था। पार्टी को 39.25 प्रतिशत वोट मिले थे और नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने थे।
वह दौर आज से बिल्कुल अलग था। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंडल राजनीति का वर्तमान स्वरूप नहीं था, राम मंदिर आंदोलन अपने बाद के प्रभाव तक नहीं पहुंचा था और समाजवादी तथा बहुजन राजनीति ने वह विस्तार हासिल नहीं किया था जो बाद के दशकों में देखने को मिला।
कांग्रेस का सामाजिक आधार भी ज्यादा व्यापक था। ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच पार्टी की पहुंच मजबूत मानी जाती थी।
लेकिन 1989 के बाद तस्वीर तेजी से बदली। क्षेत्रीय दलों के विस्तार, मंडल-कमंडल की राजनीति और नए सामाजिक गठबंधनों ने कांग्रेस के पुराने आधार को लगातार चुनौती दी। नतीजा यह हुआ कि जिस उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कभी सत्ता का केंद्र थी, वहां पार्टी धीरे-धीरे विधानसभा की मुख्य प्रतिस्पर्धा से बाहर होती गई।
इसलिए 1985 का आंकड़ा आज कांग्रेस के लिए सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदर्भ भी है—हालांकि 269 सीटों की उस जीत को 2027 के संभावित नतीजे से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
2022 का आईना भी सामने है
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका अपना हालिया चुनावी रिकॉर्ड है।
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 399 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे केवल दो सीटें मिलीं और उसका वोट शेयर करीब 2.33 प्रतिशत रहा।
यही वह आंकड़ा है जो कांग्रेस के मौजूदा संगठनात्मक प्रयोग को गंभीर कसौटी पर रखता है।
सवाल यह नहीं कि पार्टी ने किस सामाजिक वर्ग से किस नेता को जिम्मेदारी दी। असली सवाल यह है कि क्या ये चेहरे संगठन को बूथ तक ले जा पाएंगे? क्या कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता फिर सक्रिय होंगे? क्या पार्टी उन विधानसभा क्षेत्रों में अपना नेटवर्क खड़ा कर पाएगी जहां वर्षों से उसका संगठन कमजोर पड़ा है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सामाजिक प्रतिनिधित्व चुनावी समर्थन में बदल सकेगा?
2024 ने कांग्रेस को दिया था एक संकेत
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और छह सीटें जीतीं। इनमें रायबरेली, अमेठी, बाराबंकी, सीतापुर, सहारनपुर और इलाहाबाद शामिल थीं।
इन नतीजों ने कांग्रेस को यह संकेत जरूर दिया कि उत्तर प्रदेश में पार्टी पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुई है। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों की प्रकृति अलग होती है।
विधानसभा चुनाव में 403 सीटों पर अलग-अलग स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, जातीय संरचना, बूथ संगठन और स्थानीय मुद्दे ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
यही कारण है कि 2024 की सफलता को 2027 की विधानसभा राजनीति का सीधा पैमाना मानना भी सही नहीं होगा।
आराधना मिश्रा: पुराने संगठन और नए प्रयोग के बीच पुल?
आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाना कांग्रेस के लिए कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
वह रामपुर खास से विधायक हैं और पार्टी के विधानसभा दल का नेतृत्व कर चुकी हैं। वह वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। भारतीय राजनीति में रामपुर खास सीट कांग्रेस के पुराने मजबूत क्षेत्रों में रही है और आराधना मिश्रा ने यहां से अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी है।
उनकी नियुक्ति के साथ कांग्रेस ने एक ऐसे चेहरे को आगे किया है जिसकी राजनीतिक पहचान उत्तर प्रदेश की पारंपरिक कांग्रेस राजनीति से भी जुड़ी है और जो अपेक्षाकृत नई पीढ़ी के नेतृत्व का प्रतिनिधित्व भी करती हैं।
अब चुनौती यही है कि क्या रामपुर खास का राजनीतिक अनुभव पूरे प्रदेश में संगठन खड़ा करने की क्षमता में बदलेगा?
क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष के सामने केवल चुनाव लड़ने की चुनौती नहीं है। उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल, बुंदेलखंड से लेकर अवध तक पार्टी की अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को साधना होगा।
इमरान मसूद की वापसी का पश्चिमी यूपी कनेक्शन
सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक पहुंच को लेकर भी चर्चा बढ़ी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में इमरान मसूद सहारनपुर से कांग्रेस के टिकट पर जीते थे। अब उन्हें प्रदेश संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिलना यह बताता है कि पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक नेटवर्क को महत्व दे रही है।
मुस्लिम मतदाताओं के बीच कांग्रेस की पहुंच का सवाल उत्तर प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन केवल किसी एक समुदाय से आने वाला चेहरा अपने आप में पूरे समुदाय का समर्थन सुनिश्चित नहीं करता। स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार, गठबंधन, मुद्दे और क्षेत्रीय समीकरण भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
इसलिए इमरान मसूद की नियुक्ति को एक राजनीतिक संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके चुनावी प्रभाव का आकलन अभी भविष्य के लिए खुला प्रश्न है।
राजेंद्र पाल गौतम: दलित संपर्क की जिम्मेदारी
कांग्रेस ने जून 2026 में राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का AICC प्रभारी बनाया था। वह पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग से जुड़े रहे हैं और दलित राजनीति में सक्रिय चेहरा हैं।
इसके बाद पार्टी ने उत्तर प्रदेश संगठन में अन्य पिछड़े और दलित वर्गों तक पहुंच बढ़ाने वाले नेताओं को भी जिम्मेदारियां दी हैं। सितंबर में कुंवर सिंह निषाद को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मीडिया एवं प्रचार विभाग का अध्यक्ष बनाया गया।
यह क्रम बताता है कि कांग्रेस का संगठनात्मक प्रयोग केवल ब्राह्मण और मुस्लिम प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। पार्टी अलग-अलग सामाजिक समूहों में अपनी राजनीतिक पहुंच दोबारा बनाने की कोशिश कर रही है।
तो क्या लौट रहा है कांग्रेस का ‘पुराना फॉर्मूला’?
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।
अगर 1985 को कांग्रेस के पुराने व्यापक सामाजिक आधार के प्रतीक के तौर पर देखा जाए, तो मौजूदा नियुक्तियों में कुछ समानताएं जरूर दिखाई देती हैं। लेकिन चार दशक की राजनीति को केवल जातीय समीकरणों के जरिए समझना संभव नहीं है।
आज उत्तर प्रदेश में भाजपा का मजबूत संगठन है। समाजवादी पार्टी का अपना सामाजिक और राजनीतिक आधार है। बहुजन समाज पार्टी की अलग उपस्थिति है। इसके अलावा छोटे और क्षेत्रीय दल भी कई इलाकों में चुनावी समीकरण प्रभावित करते हैं।
इस बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस के लिए केवल बड़े सामाजिक चेहरों को मंच पर लाना पर्याप्त नहीं होगा।
उसे बूथ कमेटियां बनानी होंगी। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना होगा। मजबूत विधानसभा क्षेत्रों की पहचान करनी होगी। स्थानीय नेतृत्व को अधिकार देना होगा। टिकट वितरण में सामाजिक प्रतिनिधित्व और जीत की क्षमता के बीच संतुलन बनाना होगा।
और सबसे अहम—पार्टी को यह तय करना होगा कि वह 2027 में कितनी सीटों पर अपने दम पर राजनीतिक विस्तार करना चाहती है और गठबंधन में उसकी भूमिका क्या होगी।
सपा से तालमेल—सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली
कांग्रेस की उत्तर प्रदेश रणनीति को समाजवादी पार्टी से अलग करके देखना मुश्किल है।
2024 में दोनों दलों का गठबंधन लोकसभा चुनाव में साथ था। लेकिन विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा और संगठनात्मक हित कहीं ज्यादा जटिल होंगे।
कांग्रेस यदि अपने नए सामाजिक आधार और संगठनात्मक विस्तार को मजबूत करना चाहती है, तो उसे गठबंधन की राजनीति और अपने स्वतंत्र विस्तार के बीच संतुलन बनाना होगा।
यहीं 2027 की असली राजनीतिक परीक्षा भी छिपी है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कांग्रेस कितनी सीटों पर चुनाव लड़ती है। सवाल यह होगा कि जिन सीटों पर वह उतरती है, वहां उसके पास जमीनी संगठन, प्रभावी उम्मीदवार और बूथ स्तर की मशीनरी कितनी है।
269 सीटों का इतिहास और दो सीटों की वर्तमान हकीकत
कांग्रेस के सामने आज एक दिलचस्प राजनीतिक विरोधाभास है।
एक तरफ 1985 का इतिहास है—425 में 269 सीटों की शानदार जीत। दूसरी तरफ 2022 की हकीकत है—403 सदस्यीय विधानसभा में सिर्फ दो सीटें और 2.33 प्रतिशत वोट शेयर।
इसी अंतर को पाटने के लिए कांग्रेस ने अब संगठन का चेहरा बदला है।
आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष, इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष और राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी की भूमिका देना सामाजिक प्रतिनिधित्व की दिशा में स्पष्ट संगठनात्मक संदेश है। साथ ही ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व से जुड़े अन्य पदों पर भी नियुक्तियां की गई हैं।
लेकिन चुनावी राजनीति में संगठनात्मक संदेश और मतपत्र पर मिलने वाले समर्थन के बीच लंबी दूरी होती है।
अब कांग्रेस के सामने असली सवाल
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का नया प्रयोग अब केवल दिल्ली या लखनऊ के दफ्तरों में तय नहीं होगा। इसकी असली परीक्षा गांव, कस्बे, विधानसभा क्षेत्र और बूथ पर होगी।
क्या पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता वापस सक्रिय होंगे?
क्या नए सामाजिक समूहों में पार्टी का भरोसा बढ़ेगा?
क्या आराधना मिश्रा प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में संगठन को एकजुट कर पाएंगी?
क्या इमरान मसूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बाहर भी पार्टी के लिए प्रभावी संगठनात्मक भूमिका निभा पाएंगे?
क्या राजेंद्र पाल गौतम दलित मतदाताओं के बीच कांग्रेस की राजनीतिक जगह बढ़ा पाएंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या कांग्रेस अपने दम पर संगठन मजबूत करेगी या 2027 की लड़ाई में उसकी रणनीति फिर बड़े पैमाने पर गठबंधन पर निर्भर रहेगी?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं।
इतना जरूर साफ है कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में केवल प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदला है; उसने अपने संगठन की सामाजिक संरचना को नए सिरे से गढ़ने का संकेत दिया है।
1985 की 269 सीटें इतिहास हैं। 2022 की दो सीटें हालिया चुनावी हकीकत हैं। 2024 की छह लोकसभा सीटें एक अलग चुनाव में मिले संकेत हैं। अब 2027 की चुनौती इन तीनों को जोड़कर नहीं, बल्कि अपनी नई जमीन तैयार करके आगे बढ़ने की है।
इसलिए कांग्रेस के मौजूदा फेरबदल को ‘1985 की वापसी’ कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन यह कहना भी मुश्किल है कि पार्टी पुराने व्यापक सामाजिक आधार की याद से पूरी तरह दूर है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस ने अपना दांव बदल दिया है।
अब निगाह इस पर होगी कि यह दांव सिर्फ संगठन की तस्वीर बदलता है या उत्तर प्रदेश की चुनावी जमीन पर भी कोई ठोस बदलाव पैदा करता है।— पर्दाफाश न्यूज़















