Monday, September 28, 2026
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बृजभूषण की ‘राहत’ पर फिर सवाल, महिला पहलवानों ने खोला नया कानूनी मोर्चा

“बरी के फैसले को सेशंस कोर्ट में चुनौती, राउज एवेन्यू कोर्ट का बृजभूषण सिंह और विनोद तोमर को नोटिस—9 अक्टूबर को अगली सुनवाई”

नई दिल्ली: भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व अध्यक्ष और बीजेपी नेता बृजभूषण शरण सिंह को यौन उत्पीड़न के मामले में मिली कानूनी राहत के बाद एक बार फिर मामला अदालत की चौखट पर लौट आया है। छह महिला पहलवानों से जुड़े इस हाई-प्रोफाइल मामले में चार महिला पहलवानों ने 3 अगस्त 2026 को दिए गए बरी के फैसले को चुनौती देते हुए सेशंस कोर्ट का रुख किया है। अब राउज एवेन्यू कोर्ट ने इस चुनौती को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए बृजभूषण शरण सिंह, सह-आरोपी रहे विनोद तोमर और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर 2026 को होगी।

यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि 3 अगस्त को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्विनी पंवार की अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और पूर्व WFI असिस्टेंट सेक्रेटरी विनोद तोमर को मामले में बरी कर दिया था। अदालत के उस फैसले के बाद बृजभूषण सिंह ने इसे अपने पक्ष में सत्य की जीत बताया था। लेकिन अब चार महिला पहलवानों की चुनौती ने उस फैसले की न्यायिक समीक्षा का एक नया अध्याय खोल दिया है।

अदालत में फिर पहुंचा वही सवाल—क्या निचली अदालत ने सबूतों को सही नजरिए से परखा?

महिला पहलवानों की ओर से दायर अपील में निचली अदालत के फैसले को कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं बताया गया है। अपील में आरोप लगाया गया है कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों का आकलन सही और समग्र तरीके से नहीं किया गया तथा फैसले में ऐसी धारणाओं का सहारा लिया गया जिन्हें अपीलकर्ताओं ने यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ित के ‘अपेक्षित व्यवहार’ से जुड़ी पुरानी और रूढ़िवादी धारणाएं बताया है।

अपीलकर्ताओं का यह भी कहना है कि फैसले में साक्ष्यों का चयनात्मक मूल्यांकन हुआ और निष्कर्ष कुछ ऐसी धारणाओं पर आधारित रहे जिन्हें वे कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं मानतीं। यह आरोप फिलहाल अपील का हिस्सा है; इसका अंतिम मूल्यांकन अब सेशंस कोर्ट को करना है।

यही वह बिंदु है जहां मामला केवल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ आरोपों तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों के मूल्यांकन और यौन उत्पीड़न की शिकायतों को देखने के कानूनी दृष्टिकोण का प्रश्न भी अदालत के सामने आता है।

3 अगस्त का फैसला और अब उसकी न्यायिक चुनौती

3 अगस्त 2026 को राउज एवेन्यू की मजिस्ट्रेट अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी किया था। उपलब्ध अदालत रिपोर्टिंग के अनुसार, अदालत ने अभियोजन के मामले में साक्ष्यों की कमी और बयानों में विरोधाभास सहित उन पहलुओं पर विचार किया, जिनके आधार पर अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।

यही फैसला अब चार महिला पहलवानों ने सेशंस कोर्ट में चुनौती दी है। यानी 3 अगस्त का आदेश अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में निर्विवाद रूप से बंद नहीं हुआ है; अपील के माध्यम से ऊपरी अदालत के समक्ष उसके कानूनी आधार और साक्ष्यों के मूल्यांकन को चुनौती दी गई है।

28 सितंबर को विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह की अदालत ने नोटिस जारी करके बृजभूषण सिंह, विनोद तोमर और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा। अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को निर्धारित की गई है।

2023 में जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन, अब फिर अदालत के कटघरे में सवाल

इस पूरे मामले ने 2023 में देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। महिला पहलवानों ने बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया था। आंदोलन में देश के प्रमुख पहलवान शामिल हुए और मामला खेल प्रशासन, महिला सुरक्षा, संस्थागत जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर राष्ट्रीय बहस का विषय बना।

दिल्ली पुलिस ने जून 2023 में मामले में आरोपपत्र दाखिल किया था। पुलिस ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 354A, 354D और 506(1) के तहत आरोप लगाए थे। बाद में मई 2024 में अदालत ने आरोप तय किए थे। विनोद तोमर पर एक शिकायत के संबंध में आपराधिक धमकी का आरोप भी मामला बना।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आरोप लगना और अदालत में आरोप सिद्ध होना दो अलग-अलग कानूनी अवस्थाएं हैं। 3 अगस्त को ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बृजभूषण सिंह और विनोद तोमर को बरी किया था। अब महिला पहलवानों की अपील उस फैसले की कानूनी समीक्षा चाहती है।

127 सुनवाइयों के बाद भी खत्म नहीं हुआ विवाद

इस मामले की लंबी न्यायिक प्रक्रिया अपने आप में महत्वपूर्ण है। अदालत में मुकदमे की कार्यवाही कई चरणों से गुजरी और रिपोर्टिंग के अनुसार ट्रायल के दौरान 127 सुनवाइयां हुईं। जून 2024 में ट्रायल शुरू हुआ और आखिरकार 3 अगस्त 2026 को निचली अदालत ने फैसला सुनाया।

लेकिन फैसले के साथ विवाद समाप्त नहीं हुआ। महिला पहलवानों ने अदालत के निष्कर्षों पर सवाल उठाते हुए अपील का रास्ता चुना। इस तरह तीन साल से अधिक समय से चल रहा मामला अब एक नए न्यायिक चरण में प्रवेश कर चुका है।

बृजभूषण का पक्ष भी अदालत के सामने आएगा

3 अगस्त के फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि उन्होंने शुरुआत से ही अपनी बेगुनाही पर भरोसा जताया था और यदि उनके खिलाफ कोई आरोप साबित होता तो वह कठोरतम दंड स्वीकार करने की बात कहते रहे हैं। बरी होने के बाद उन्होंने फैसले को अपने पक्ष में सत्य की जीत बताया था।

अब अपील पर जारी नोटिस के बाद उनका पक्ष भी सेशंस कोर्ट के सामने आएगा। अदालत दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर यह तय करेगी कि अपील पर आगे किस प्रकार की न्यायिक कार्रवाई की जानी है।

विनोद तोमर की बरी होने की चुनौती भी साथ

महिला पहलवानों ने केवल बृजभूषण शरण सिंह के बरी होने को चुनौती नहीं दी है। अपील में पूर्व WFI असिस्टेंट सेक्रेटरी विनोद तोमर को आपराधिक धमकी के आरोप से बरी किए जाने के फैसले को भी चुनौती दी गई है। 25 सितंबर को दायर अपील में दोनों के खिलाफ निचली अदालत के फैसले पर सवाल उठाए गए थे।

इसका अर्थ है कि आगामी सुनवाई में अदालत के सामने दो महत्वपूर्ण पहलू रहेंगे—बृजभूषण सिंह के खिलाफ मामले में निचली अदालत के साक्ष्य-मूल्यांकन की वैधता और विनोद तोमर के संबंध में आपराधिक धमकी के आरोप से बरी किए जाने के फैसले की चुनौती।

अब 9 अक्टूबर पर टिकी निगाहें

28 सितंबर को जारी नोटिस के बाद अब अगली निर्णायक प्रक्रियात्मक तारीख 9 अक्टूबर है। उस दिन बृजभूषण शरण सिंह, विनोद तोमर और दिल्ली पुलिस की ओर से जवाब सामने आ सकता है। इसके बाद अदालत यह तय करेगी कि अपील किस दायरे में और किस प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगी।

फिलहाल यह कहना कानूनी रूप से जल्दबाजी होगी कि अपील का परिणाम क्या होगा। महिला पहलवानों ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है, जबकि बृजभूषण सिंह और विनोद तोमर निचली अदालत से बरी हो चुके हैं। अब ऊपरी अदालत के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड की समीक्षा होगी।

तीन साल पुरानी लड़ाई फिर अदालत में—फैसला अब अगली सीढ़ी पर

जंतर-मंतर के प्रदर्शन से शुरू हुआ यह मामला अब एक और न्यायिक मोड़ पर पहुंच चुका है। एक तरफ निचली अदालत का बरी करने वाला फैसला है, दूसरी तरफ चार महिला पहलवानों की अपील है, जिसमें उस फैसले के कानूनी आधार और साक्ष्यों के मूल्यांकन पर गंभीर आपत्तियां दर्ज की गई हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का अंतिम फैसला अभी बाकी है। अदालत के सामने अब सवाल किसी राजनीतिक बयान या सार्वजनिक धारणा का नहीं, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों, कानून के सिद्धांतों और निचली अदालत के फैसले की न्यायिक समीक्षा का है।

9 अक्टूबर की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी कि उसी के बाद यह स्पष्ट होगा कि महिला पहलवानों की चुनौती किस दिशा में आगे बढ़ती है। फिलहाल एक बात साफ है—3 अगस्त को बरी होने के साथ जिस मामले के खत्म होने की उम्मीद की जा रही थी, वह चार महिला पहलवानों की अपील के बाद फिर अदालत के केंद्र में आ गया है।

पर्दाफाश न्यूज़ की नजर अब 9 अक्टूबर की सुनवाई और अदालत में सामने आने वाले दोनों पक्षों के जवाब पर रहेगी।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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