सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) आवेदन कानून 1937 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। अदालत ने केंद्र से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। यह मामला मुस्लिम महिलाओं के विरासत, संपत्ति और विवाह से जुड़े अधिकारों में कथित भेदभाव को लेकर उठाया गया है।
क्या है याचिका का मुख्य मुद्दा?
याचिका में कहा गया है कि Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 के तहत मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम अधिकार दिए जाते हैं, खासकर उत्तराधिकार और संपत्ति के मामलों में। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह कानून महिलाओं के साथ असमान व्यवहार करता है और उन्हें बराबरी का हक नहीं देता।
अनुच्छेद 14 और 25 का हवाला
वरिष्ठ वकील Prashant Bhushan ने अदालत में दलील दी कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को पुरुषों से आधा या उससे कम हिस्सा मिलना किसी भी तरह से “आवश्यक धार्मिक प्रथा” नहीं माना जा सकता, जिसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिले।
लगभग 1 करोड़ महिलाओं पर असर का दावा
याचिका में दावा किया गया है कि इस कानून के कारण देश में करीब 1 करोड़ मुस्लिम महिलाएं प्रभावित हो रही हैं। विरासत और संपत्ति के मामलों में उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं मिल पाता, जिससे वे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ जाती हैं।
UCC की अनुपस्थिति का मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू न होने के कारण यह कानून अभी भी प्रभावी है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस कानून को असंवैधानिक घोषित करता है, तो उत्तराधिकार से जुड़े अन्य कानूनों की व्याख्या पर भी असर पड़ सकता है।
अदालत के फैसले पर टिकी नजरें
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद अब सभी की नजरें केंद्र सरकार के जवाब और आगामी सुनवाई पर टिकी हैं। यह मामला न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक और संवैधानिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह याचिका महिलाओं के समान अधिकारों और धार्मिक कानूनों के बीच संतुलन का बड़ा सवाल खड़ा करती है। आने वाला फैसला यह तय कर सकता है कि क्या पारंपरिक कानूनों में बदलाव कर लैंगिक समानता को प्राथमिकता दी जाएगी या नहीं।














