अजमेर/नई दिल्ली : इस्लामाबाद में हुई अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता बेनतीजा रहने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। इस बीच सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
पाकिस्तान की मध्यस्थता पर तीखा सवाल
अजमेर शरीफ दरगाह के गद्दी-नशीन और ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के अध्यक्ष चिश्ती ने कहा कि आतंकवाद को बढ़ावा देने के इतिहास वाले पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाना एक बड़ी गलती थी। उन्होंने कहा कि ऐसे देश को शांति प्रक्रिया में शामिल करना ही वार्ता की विश्वसनीयता को कमजोर करता है।
‘कमजोर मध्यस्थ से वार्ता विफल होती है’
चिश्ती ने कहा कि जब मध्यस्थ मजबूत और भरोसेमंद नहीं होते, तो वार्ता का असफल होना तय होता है। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि पाकिस्तान के नेताओं के बयानों में असंगति और बाद में पलटने की प्रवृत्ति ने पूरी प्रक्रिया को और कमजोर किया।
अमेरिका के दृष्टिकोण पर भी सवाल
उन्होंने अमेरिका की रणनीति पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह के निर्णय यह दर्शाते हैं कि अमेरिका की नीति में स्पष्टता और विश्वसनीयता की कमी है। उनके मुताबिक, गलत मध्यस्थ का चयन वार्ता की असफलता का प्रमुख कारण बना।
#WATCH | Ajmer, Rajasthan: On failed US-Iran talks, Chairman, All India Sufi Sajjadanashin Council (AISSC), Syed Nasruddin Chishti says, “… Pakistan was made a mediator despite its dark history of promoting and supporting terrorism. To see such a nation now posing as a… pic.twitter.com/ICPDhP6Dbp
— ANI (@ANI) April 12, 2026
भारत को बताया अधिक विश्वसनीय विकल्प
चिश्ती ने कहा कि अगर भारत को मध्यस्थ बनाया जाता, तो बातचीत अधिक मजबूत और परिणामदायी हो सकती थी। उन्होंने भारत को एक भरोसेमंद और संतुलित देश बताते हुए कहा कि इससे सहमति बनने की संभावना बढ़ जाती।
वैश्विक असर की चेतावनी
उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका-ईरान के बीच तनाव का असर केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने पहले ही कई देशों को प्रभावित किया है और ऐसी वार्ताओं की विफलता स्थिति को और गंभीर बना सकती है।
अमेरिका-ईरान शांति वार्ता की असफलता ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में मध्यस्थ की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है। सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती के बयान ने इस बहस को और तेज कर दिया है कि क्या भविष्य में अधिक विश्वसनीय देशों को इस तरह की वार्ताओं में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।














