शिवसेना के मुखपत्र सामना ने महाराष्ट्र की नई उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के शपथग्रहण को लेकर तीखा हमला बोला है। सामना ने इसे “बेहद घटिया राजनीति” करार देते हुए कहा कि अजित पवार के निधन के बाद सूतक काल में शपथ लेना हिंदुत्व की परंपराओं के खिलाफ है। संपादकीय में यह भी कहा गया कि यह फैसला राजनीतिक योग्यता से नहीं, बल्कि भाजपा की रणनीति के तहत लिया गया।
‘चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी’
सोमवार को प्रकाशित संपादकीय में सामना ने लिखा कि महाराष्ट्र अभी अजित पवार के निधन के सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि अमित शाह और देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक चालों ने राज्य को दूसरा झटका दे दिया। सामना के शब्दों में, “अजित पवार की चिता की आग ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि सुनेत्रा पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली।”
पहली महिला उपमुख्यमंत्री, लेकिन योग्यता पर सवाल
संपादकीय में माना गया कि महाराष्ट्र को पहली महिला उपमुख्यमंत्री मिली है, लेकिन साथ ही यह भी साफ कहा गया कि यह पद किसी राजनीतिक कर्तृत्व या क्षमता के आधार पर नहीं मिला। सामना ने सवाल उठाया कि यह फैसला आखिर किसकी इच्छा से और किस दबाव में लिया गया।
परिवार को भी नहीं थी जानकारी
सामना के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम पर शरद पवार और सुप्रिया सुले की प्रतिक्रिया बेहद शांत रही। शरद पवार ने कहा कि उन्हें सुनेत्रा पवार के शपथग्रहण की कोई जानकारी नहीं थी। इससे संकेत मिलता है कि शपथ समारोह की जानकारी पवार परिवार तक को नहीं दी गई।
‘राजनीति नए निम्न स्तर पर पहुंच गई’
अजित पवार की शैली में बोलते हुए सामना ने लिखा कि मौजूदा दौर में राजनीति वाकई बेहद घटिया हो चुकी है और इसके सूत्रधार भाजपा का वर्तमान नेतृत्व है। पार्टी भले ही इसे आंतरिक फैसला बताए, लेकिन सच्चाई यह है कि अजित पवार के नेतृत्व में ही विधायकों का गुट सत्ता में शामिल हुआ था।
पार्टी को संभालने के नाम पर जल्दबाज़ी
संपादकीय में कहा गया कि अजित पवार के निधन के बाद पार्टी में अस्थिरता पैदा हो गई थी। नेताओं और कार्यकर्ताओं के भटकने की आशंका के चलते जल्दबाज़ी में सुनेत्रा पवार को नेतृत्व सौंप दिया गया। हालांकि सामना ने यह भी जोड़ा कि सूतक काल में इस तरह का शपथ समारोह हिंदू परंपराओं से मेल नहीं खाता।
नाव का इंजन और रिमोट फडणवीस के हाथ में
सामना ने तीखा रूपक इस्तेमाल करते हुए लिखा कि पार्टी अब ऐसी नाव बन गई है, जिसका कप्तान चला गया है। नाव का इंजन देवेंद्र फडणवीस के पास है और उसका रिमोट भी उन्हीं के हाथ में। सवाल यह है कि क्या सुनेत्रा पवार इस नाव को राजनीतिक तूफान से बाहर निकाल पाएंगी।
भविष्य भाजपा की कृपा पर निर्भर?
संपादकीय में अनुमान जताया गया कि 2029 का विधानसभा चुनाव भाजपा अकेले लड़ सकती है, और उससे पहले शिंदे गुट और अजित पवार गुट के कई विधायक भाजपा में शामिल हो सकते हैं। ऐसे हालात में सुनेत्रा पवार की असली राजनीतिक परीक्षा होगी।
‘गूंगी गुड़िया’ न बनें—सबसे बड़ी चुनौती
सामना ने चेतावनी दी कि सुनेत्रा पवार का उपमुख्यमंत्री पद केवल प्रतीकात्मक न रह जाए, यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती है। अगर वे अजित पवार जैसी प्रशासनिक पकड़, मेहनत, जनसंपर्क और भाजपा के सामने स्वतंत्र रुख दिखा पाती हैं, तभी वे अपनी अलग राजनीतिक पहचान बना सकेंगी।
‘सूतक आता-जाता है, राजनीति नहीं रुकती’
संपादकीय के अंत में सामना ने लिखा कि सूतक क्या होता है—वह आता है और चला जाता है, लेकिन राजनीति को रोका नहीं जा सकता। अजित पवार के जाने से पवार परिवार और महाराष्ट्र की राजनीति में उलझन बढ़ी है और यह उलझन कई लोगों के हित में है। निष्कर्ष साफ है—राजनीति सचमुच बेहद घटिया हो चुकी है।














