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अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को फारूक अब्दुल्ला ने बताया गलत, केंद्र पर बरसे; दो साल बाद भी स्टेटहुड बहाली का सवाल बरकरार

“जम्मू-कश्मीर के साथ सौतेलेपन का व्यवहार क्यों?’—नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष ने उठाए सवाल, एलजी प्रशासन की भूमिका पर भी जताई नाराजगी”

श्रीनगर/जम्मू। जम्मू-कश्मीर के संवैधानिक अधिकारों, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और राज्य के दर्जे की बहाली का सवाल एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के फैसले और उसके बाद केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को गलत और गैर-कानूनी बताते हुए आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं और उनके अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। साथ ही, उन्होंने राज्य का दर्जा बहाल करने के वादे पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आखिर जम्मू-कश्मीर को उसका पूर्ण राज्य का दर्जा कब वापस मिलेगा?

डॉ. अब्दुल्ला के बयान ने केंद्र सरकार के सामने एक बार फिर उन सवालों को खड़ा कर दिया है, जिनका संबंध केवल जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक संरचना से नहीं, बल्कि संघवाद, लोकतांत्रिक जवाबदेही और जनता के विश्वास से भी है। उनका कहना है कि परिसीमन और चुनाव जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ीं, लेकिन राज्य के दर्जे की बहाली के मामले में अपेक्षित प्रगति दिखाई नहीं देती। ऐसे में सवाल यह है कि जब जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार काम कर रही है, तो उसे पूर्ण राज्य के रूप में स्थापित करने की प्रक्रिया अब तक निर्णायक मुकाम तक क्यों नहीं पहुंची?

अनुच्छेद 370 पर फैसले को लेकर तीखा विरोध

नेशनल कॉन्फ्रेंस अध्यक्ष ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और उसे संवैधानिक रूप से वैध ठहराए जाने के फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई। उनके अनुसार, जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को समाप्त करने की प्रक्रिया ने प्रदेश की जनता की भावनाओं और राजनीतिक सहमति से जुड़े बुनियादी प्रश्न खड़े किए हैं। उन्होंने इस कदम को गलत ठहराते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ ऐसा फैसला किया गया, जिसका प्रभाव उनकी संवैधानिक स्थिति और राजनीतिक अधिकारों पर दूरगामी रहा है।

अब्दुल्ला की आपत्ति का केंद्रीय आधार यह है कि जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था में इतने व्यापक बदलाव के बाद भी स्थानीय जनता के विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। उनका मानना है कि विशेष दर्जे को समाप्त करने के साथ राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करना राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण कदम था, जिसके परिणाम आज भी प्रदेश की शासन व्यवस्था में महसूस किए जा रहे हैं।

हालांकि, इस मुद्दे पर कानूनी स्थिति को स्पष्ट रखना भी जरूरी है। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र के कदम को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया था। इसलिए अब्दुल्ला की टिप्पणी को उनके राजनीतिक और संवैधानिक मत के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि न्यायालय के फैसले के कानूनी रूप से निरस्त हो जाने के रूप में। अदालत के निर्णय और उस पर किसी राजनीतिक नेता की असहमति के बीच यह अंतर लोकतांत्रिक बहस की बुनियादी शर्त है।

‘अब राज्य का दर्जा कहां है?’—केंद्र से सीधा सवाल

फारूक अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार से सबसे महत्वपूर्ण सवाल जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे की बहाली को लेकर किया। उनका कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हुई, चुनाव कराए गए और निर्वाचित सरकार भी अस्तित्व में आ गई, लेकिन राज्य का दर्जा बहाल करने के सवाल पर अब भी अनिश्चितता बनी हुई है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए चुनाव कराए जा सकते हैं, तो राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में ठोस कदम उठाने में देरी क्यों हो रही है? उनके मुताबिक, चुनावों के बाद राज्य का दर्जा लौटाने को लेकर जो भरोसा दिया गया था, उसे समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिए था।

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की संवैधानिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर होता है। राज्य का दर्जा मिलने से निर्वाचित सरकार की संस्थागत स्थिति, विधायी अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही के स्वरूप पर असर पड़ता है। हालांकि, राज्य का दर्जा बहाल होने पर भी जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था में लागू विशेष प्रावधानों और केंद्र के अधिकारों का प्रश्न अलग-अलग कानूनी आधारों पर निर्धारित होगा।

अब्दुल्ला का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्य का दर्जा लौटाने के संबंध में आश्वासन तो दिए, लेकिन जनता को अब तक ऐसा परिणाम नहीं मिला, जिससे यह भरोसा मजबूत हो सके कि वादा पूरा करने की दिशा में निर्णायक कार्रवाई हो रही है। उनके बयान के केंद्र में यही राजनीतिक विरोधाभास है—एक ओर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली का दावा और दूसरी ओर पूर्ण राज्य के दर्जे पर जारी प्रतीक्षा।

‘जम्मू-कश्मीर के साथ सौतेलेपन का व्यवहार’

डॉ. अब्दुल्ला ने नई दिल्ली पर जम्मू-कश्मीर के साथ सौतेलेपन का व्यवहार करने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रदेश के लोगों की सहमति के बिना उनके विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया गया और ऐतिहासिक राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया। उनके अनुसार, इन फैसलों ने जम्मू-कश्मीर और केंद्र के संबंधों में एक ऐसा राजनीतिक तनाव पैदा किया है, जिसे केवल प्रशासनिक उपायों से दूर नहीं किया जा सकता।

उनकी आलोचना का आशय यह है कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार है, लेकिन ऐसे फैसलों की राजनीतिक स्वीकार्यता, जनविश्वास और संस्थागत जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी को लेकर उठ रहे सवालों का उत्तर केवल यह कहकर नहीं दिया जा सकता कि चुनाव करा दिए गए हैं। चुनाव प्रतिनिधियों को चुनने का माध्यम हैं; वे अपने आप राज्य का दर्जा बहाल नहीं करते। इसी तरह, राज्य का दर्जा लौटाने की घोषणा और उसके लिए आवश्यक संवैधानिक तथा प्रशासनिक कदम उठाने के बीच भी स्पष्ट अंतर है।

यदि केंद्र सरकार राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रति प्रतिबद्ध है, तो इस प्रतिबद्धता की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए प्रक्रिया, संभावित समय-सीमा और शेष चरणों के बारे में स्पष्टता महत्वपूर्ण होगी। यह मांग किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं, बल्कि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही के व्यापक सिद्धांत से जुड़ी है।

निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों पर टकराव

फारूक अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि निर्वाचित सरकार को अपने दायित्वों का निर्वहन करने में पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं मिल रही और उपराज्यपाल का प्रशासन उसके कामकाज में हस्तक्षेप करता है। उन्होंने कहा कि उपराज्यपाल का प्रशासन लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के काम में दखल देने और बाधाएं उत्पन्न करने का कोई अवसर नहीं छोड़ता।

यह आरोप जम्मू-कश्मीर की शासन व्यवस्था में अधिकारों के बंटवारे से जुड़ी बहस को सामने लाता है। केंद्र शासित प्रदेश के रूप में जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल की भूमिकाएं संवैधानिक प्रावधानों, लागू कानूनों और निर्धारित प्रशासनिक नियमों से संचालित होती हैं। इसलिए किसी विशेष निर्णय या हस्तक्षेप की वैधता का आकलन संबंधित मामले और लागू कानूनी व्यवस्था के आधार पर किया जाना चाहिए।

लेकिन व्यापक राजनीतिक प्रश्न अपनी जगह कायम है: यदि जनता ने किसी सरकार को चुनकर सत्ता में भेजा है, तो उस सरकार की जवाबदेही और निर्णय लेने की क्षमता किस सीमा तक सुनिश्चित है? यदि निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने अधिकारों के प्रयोग में बार-बार संस्थागत बाधाओं का सामना करना पड़ता है, तो शासन की प्रभावशीलता और जनता के विश्वास पर उसका असर पड़ सकता है।

इसीलिए निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर स्पष्टता आवश्यक है। जिम्मेदार शासन का तकाजा है कि दोनों संस्थाएं अपने-अपने वैधानिक दायरे में काम करें, विवादों का समाधान निर्धारित संवैधानिक प्रक्रियाओं से हो और प्रशासनिक मतभेदों के कारण जनता से जुड़े कार्य प्रभावित न हों।

‘लोकतंत्र में डर और दबाव की कोई जगह नहीं’

अब्दुल्ला ने लोकतांत्रिक मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि डराने-धमकाने, जबरदस्ती करने, परेशान करने, अन्याय करने या लोगों की आवाज दबाने की लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है। उन्होंने संविधान की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि जनता की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश देती है, जब जम्मू-कश्मीर में शासन, सुरक्षा, नागरिक अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। लोकतंत्र का अर्थ केवल समय पर चुनाव कराना नहीं है। इसमें निर्वाचित संस्थाओं का सम्मान, नागरिकों की शिकायतों की सुनवाई, प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही और कानून के समक्ष समानता भी शामिल हैं।

हालांकि, किसी भी आरोप की गंभीरता के अनुरूप उसके तथ्यात्मक आधार का परीक्षण आवश्यक है। यदि किसी प्रशासनिक कार्रवाई को अनुचित हस्तक्षेप, दबाव या अधिकारों के उल्लंघन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो संबंधित घटनाओं, आदेशों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर उसका आकलन किया जाना चाहिए। इससे राजनीतिक बहस अधिक विश्वसनीय बनती है और जवाबदेही की मांग ठोस आधार पर खड़ी होती है।

केंद्र के सामने चुनौती: भरोसा बहाल करना

फारूक अब्दुल्ला के बयान ने केंद्र सरकार के सामने जम्मू-कश्मीर के भविष्य से जुड़े तीन बड़े सवाल फिर से रख दिए हैं—राज्य का दर्जा बहाल करने की प्रक्रिया कब आगे बढ़ेगी, निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की सीमाएं किस तरह स्पष्ट होंगी और केंद्र तथा जम्मू-कश्मीर के बीच राजनीतिक विश्वास कैसे मजबूत होगा?

इन सवालों का उत्तर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे जाकर देना होगा। केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह राज्य का दर्जा बहाल करने के संबंध में अपनी नीति और आगे की प्रक्रिया को स्पष्ट करे। वहीं, जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार और राजनीतिक दलों को भी संवैधानिक व्यवस्था के भीतर संवाद, तथ्यों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से अपनी मांगों को आगे बढ़ाना होगा।

अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानूनी स्थिति का महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन उस फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर में शासन, प्रतिनिधित्व और राज्य के दर्जे को लेकर उठने वाली राजनीतिक बहस समाप्त नहीं हो जाती। न्यायिक निर्णय की वैधता और उसके राजनीतिक परिणामों पर असहमति दो अलग विषय हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दोनों पर संवैधानिक मर्यादा के भीतर चर्चा हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम

फारूक अब्दुल्ला के बयान का सबसे प्रभावशाली पहलू यही है कि उन्होंने बहस को सीधे राज्य के दर्जे की बहाली और जनता से किए गए वादों की जवाबदेही से जोड़ दिया है। उनका सवाल—‘अब राज्य का दर्जा कहां है?’—केंद्र सरकार की राजनीतिक प्रतिबद्धता और जम्मू-कश्मीर की भावी प्रशासनिक व्यवस्था पर स्पष्ट उत्तर की मांग करता है।

जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए यह प्रश्न केवल संवैधानिक शब्दावली का विषय नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, निर्णय लेने की शक्ति और अपने राजनीतिक भविष्य में भागीदारी से जुड़ा हुआ है। परिसीमन और चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरण हैं, लेकिन राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रश्न अपनी अलग संवैधानिक और राजनीतिक अहमियत रखता है।

अब केंद्र सरकार के सामने चुनौती केवल अपने पुराने आश्वासनों को दोहराने की नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करने की है कि उन्हें पूरा करने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, नेशनल कॉन्फ्रेंस और अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी यह जरूरी होगा कि वे जनता की अपेक्षाओं को ठोस नीतिगत मांगों और संवैधानिक प्रयासों में बदलें।

फिलहाल, फारूक अब्दुल्ला के तीखे बयान ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर उस बुनियादी प्रश्न को केंद्र में ला दिया है, जिसका उत्तर प्रदेश की जनता लंबे समय से चाहती है: जब लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बहाल हो चुका है, तो जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा लौटाने के लिए निर्णायक कदम कब उठाए जाएंगे?

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VIKAS TRIPATHI
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