“7 अक्टूबर 2001 को गुजरात की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने 22 मई 2014 को देश की बागडोर थामी; सत्ता के केंद्र में लगातार बने रहने की कहानी अब भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक अध्ययन”
पर्दाफाश न्यूज़
भारतीय राजनीति में कुछ तारीखें सिर्फ कैलेंडर का हिस्सा नहीं होतीं, वे इतिहास की दिशा बदलने वाली तारीखें बन जाती हैं। 7 अक्टूबर 2001 भी ऐसी ही एक तारीख है। इसी दिन नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता संभाली थी। करीब साढ़े बारह वर्ष बाद 22 मई 2014 को उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसके बाद 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की सत्ता बरकरार रखी।
आज नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन का वह पड़ाव सामने है, जहां गुजरात से शुरू हुई सत्ता-यात्रा को 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
यह उपलब्धि सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई नेता लंबे समय तक सत्ता में रहा। असली सवाल यह है कि भारतीय लोकतंत्र में सत्ता के इतने लंबे दौर के बावजूद मोदी ने अपने राजनीतिक प्रभाव को कैसे कायम रखा? किस संगठनात्मक रणनीति, किस राजनीतिक संदेश, किस चुनावी सामाजिक समीकरण और किस नेतृत्व शैली ने उन्हें लगातार चुनावी राजनीति के केंद्र में बनाए रखा?
यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले वर्षों में राजनीतिक इतिहासकार और राजनीति विज्ञान के अध्येता तलाशेंगे।
गुजरात: जहां से शुरू हुई लंबी सत्ता-कथा
2001 में जब नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया, तब परिस्थितियां आसान नहीं थीं। भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी यह फैसला सामान्य राजनीतिक बदलाव जैसा नहीं था। मोदी इससे पहले मुख्यतः संगठन की राजनीति में सक्रिय रहे थे और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी संगठन में जिम्मेदारियां संभाल चुके थे।
गुजरात उस समय राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक चुनौतियों और नेतृत्व परिवर्तन के दौर से गुजर चुका था। 1990 के दशक में राज्य ने कई सरकारें और कई मुख्यमंत्री देखे। राजनीतिक समीकरण बदलते रहे और सत्ता का स्थायित्व चुनौती बना रहा।
ऐसे माहौल में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाना एक राजनीतिक प्रयोग था।
लेकिन यह प्रयोग कुछ ही वर्षों में भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी राजनीतिक परियोजनाओं में बदल गया।
मोदी ने गुजरात में प्रशासन, निवेश, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास को अपनी राजनीति के केंद्रीय संदेश में बदल दिया। “विकास” धीरे-धीरे उनके राजनीतिक ब्रांड का सबसे महत्वपूर्ण शब्द बन गया।
यहीं से गुजरात मॉडल की राजनीतिक कहानी राष्ट्रीय विमर्श में प्रवेश करती है।
2001 से 2014: मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक
नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में करीब 12 वर्ष से अधिक समय तक काम किया। इस दौरान उनका राजनीतिक कद राज्य की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा।
लेकिन इस यात्रा का सबसे कठिन अध्याय भी इसी दौर में आया।
2002 का गुजरात दंगा नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर सबसे गंभीर और विवादित अध्यायों में से एक रहा। गोधरा कांड के बाद गुजरात में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। राज्य सरकार की भूमिका और तत्कालीन प्रशासन की प्रतिक्रिया पर वर्षों तक राजनीतिक, सामाजिक और न्यायिक बहस चलती रही।
यह भी तथ्य है कि नरेंद्र मोदी की सरकार और उनके नेतृत्व को लेकर विभिन्न न्यायिक और जांच प्रक्रियाएं चलीं। बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त विशेष जांच दल ने मोदी के खिलाफ अभियोजन योग्य साक्ष्य न मिलने की बात कही और सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में उस प्रक्रिया को बरकरार रखा।
लेकिन राजनीतिक बहस पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
यही भारतीय लोकतंत्र की जटिलता है—एक नेता को एक ही समय में विकास के प्रतीक, मजबूत प्रशासक और एक अत्यंत विवादित राजनीतिक दौर से जुड़े नेता के रूप में देखा जा सकता है।
पर्दाफाश का सवाल यहीं से निकलता है—
क्या किसी नेता का राजनीतिक मूल्यांकन केवल उसकी उपलब्धियों से होना चाहिए, या उसके कार्यकाल के विवादों और आलोचनाओं को भी बराबर जगह मिलनी चाहिए?
लोकतंत्र में दोनों सवालों का मौजूद रहना जरूरी है।
वाइब्रेंट गुजरात से राष्ट्रीय ब्रांड तक
मोदी के नेतृत्व में गुजरात में निवेश और औद्योगिक विकास को राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाया गया। Vibrant Gujarat निवेश सम्मेलन धीरे-धीरे राज्य की आर्थिक ब्रांडिंग का बड़ा मंच बन गया।
इस अभियान ने मोदी को सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं रहने दिया।
उन्हें एक ऐसे नेता की छवि मिली जो उद्योग, निवेश, बुनियादी ढांचे और तेज निर्णयों की भाषा बोलता था।
यहीं से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन हुआ।
मोदी की राजनीति गुजरात से निकलकर देश के मध्यवर्ग, कारोबारी समुदाय, युवाओं और उन मतदाताओं तक पहुंचने लगी जो एक मजबूत और निर्णायक सरकार की तलाश में थे।
2013 में भाजपा ने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अपने चुनाव अभियान का प्रमुख चेहरा बनाया।
फिर आया 2014।
और भारतीय राजनीति बदल गई।
2014: दिल्ली की सत्ता पर निर्णायक दस्तक
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दस वर्ष के शासन के बाद देश ने सत्ता परिवर्तन देखा।
22 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
गुजरात का नेता अब देश का नेता बन चुका था।
लेकिन मोदी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती यहीं से शुरू हुई थी।
क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में चुनाव जीतना और प्रधानमंत्री के रूप में पूरे देश के अलग-अलग सामाजिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक समूहों को साधना दो बिल्कुल अलग परीक्षाएं थीं।
मोदी ने इस परीक्षा के लिए तीन प्रमुख हथियारों पर भरोसा किया—
व्यक्तिगत नेतृत्व, संगठन की ताकत और सीधा मतदाता संवाद।
मन की बात से लेकर विशाल चुनावी सभाओं तक, सोशल मीडिया से लेकर डिजिटल राजनीतिक संचार तक, मोदी ने प्रधानमंत्री के पद को लगातार जनसंपर्क के केंद्र में रखा।
2019: पहली बड़ी पुष्टि
2014 की जीत को विरोधी दलों ने कई कारणों से जोड़ा था—कांग्रेस विरोधी लहर, यूपीए के खिलाफ असंतोष, नेतृत्व का संकट और भाजपा के मजबूत संगठन को।
लेकिन 2019 ने तस्वीर बदल दी।
भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 से भी बेहतर प्रदर्शन किया और लोकसभा में अपनी सीटों की संख्या बढ़ाई।
अब यह कहना कठिन था कि 2014 केवल सत्ता विरोधी लहर का परिणाम था।
मोदी स्वयं राष्ट्रीय चुनावी राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में स्थापित हो चुके थे।
2024: बहुमत घटा, लेकिन सत्ता बरकरार
2024 का चुनाव इस कहानी में एक नया अध्याय लेकर आया।
भाजपा अपने दम पर लोकसभा में बहुमत से नीचे चली गई। लेकिन एनडीए ने सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या हासिल की और नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।
यही तथ्य मोदी की राजनीतिक यात्रा को और दिलचस्प बनाता है।
2024 में भाजपा को 2019 की तुलना में सीटों का नुकसान हुआ, लेकिन मोदी सत्ता से बाहर नहीं हुए।
यानी उनके नेतृत्व की कहानी अब केवल एक पार्टी के पूर्ण बहुमत की कहानी नहीं रह गई थी। यह गठबंधन राजनीति के दौर में भी सत्ता के केंद्र में बने रहने की कहानी बन गई।
यहीं से मोदी की राजनीति का अगला सवाल पैदा होता है—
क्या तीसरा कार्यकाल उनके राजनीतिक प्रभुत्व का विस्तार है या एक नए गठबंधन युग की शुरुआत?
इसका जवाब इतिहास देगा।
मोदी की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार—सीधा संवाद
नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक बड़ा पहलू है—मतदाता से सीधा संवाद।
वे पारंपरिक राजनीतिक मध्यस्थों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय सीधे जनता तक संदेश पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
रेडियो कार्यक्रम, सोशल मीडिया, डिजिटल अभियान, वीडियो संदेश, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम और चुनावी सभाएं—इन सभी ने प्रधानमंत्री की राजनीतिक संचार शैली को बदल दिया।
भाजपा का संगठन इस व्यक्तिगत नेतृत्व को बूथ स्तर तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
यही वजह है कि मोदी की चुनावी राजनीति केवल भाषणों की राजनीति नहीं है।
इसके पीछे संगठन, डेटा, बूथ प्रबंधन, सोशल मीडिया नेटवर्क और लगातार चलने वाला राजनीतिक अभियान भी है।
मोदी के सामने आलोचनाओं की लंबी सूची भी
लेकिन किसी भी लंबे राजनीतिक शासन का मूल्यांकन सिर्फ उपलब्धियों की सूची से नहीं किया जा सकता।
मोदी सरकार के सामने भी गंभीर आलोचनाएं रही हैं।
बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, सामाजिक ध्रुवीकरण, संस्थागत स्वतंत्रता, विपक्ष के साथ संबंध, जांच एजेंसियों के इस्तेमाल को लेकर उठते सवाल, प्रेस की स्वतंत्रता और सामाजिक तनाव—ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार को लगातार विपक्ष और नागरिक समाज की आलोचना झेलनी पड़ी है।
दूसरी तरफ सरकार समर्थक इन आलोचनाओं को राजनीतिक विरोध की सामान्य प्रक्रिया बताते हैं और जनधन, आधार, डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढांचे, गरीब कल्याण योजनाओं, कोविड वैक्सीनेशन, जीएसटी, अनुच्छेद 370 में बदलाव, राम मंदिर निर्माण और विदेश नीति जैसे विषयों को अपनी उपलब्धियों के रूप में सामने रखते हैं।
इसलिए मोदी युग का निष्पक्ष मूल्यांकन न तो सिर्फ प्रशंसा से संभव है और न केवल आलोचना से।
इतिहास को दोनों पक्षों को दर्ज करना होगा।
अर्थव्यवस्था: उपलब्धि भी, चुनौती भी
मोदी सरकार के दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार काफी बढ़ा है और भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ है।
लेकिन आर्थिक कहानी का दूसरा पहलू भी है।
प्रति व्यक्ति आय, रोजगार की गुणवत्ता, ग्रामीण आय, असमानता और छोटे कारोबारों पर आर्थिक दबाव जैसे सवाल लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं।
इसलिए “भारत की अर्थव्यवस्था बड़ी हुई” कहना पर्याप्त नहीं है।
असल सवाल यह है—
क्या आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचा?
यही वह प्रश्न है जिसका जवाब मोदी सरकार को आने वाले वर्षों में देना होगा।
विदेश नीति में मोदी का आक्रामक आत्मविश्वास
मोदी युग की एक बड़ी पहचान विदेश नीति भी रही है।
अमेरिका से लेकर रूस, खाड़ी देशों से लेकर इजरायल, जापान से लेकर यूरोप और ग्लोबल साउथ तक भारत ने अपनी रणनीतिक भूमिका को अधिक मुखर बनाने की कोशिश की।
G20 की भारत में मेजबानी ने भी भारत की वैश्विक कूटनीतिक मौजूदगी को मजबूत किया।
मोदी ने विदेश नीति को घरेलू राजनीतिक संदेश का हिस्सा भी बनाया।
लेकिन यहां भी तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है।
चीन के साथ सीमा तनाव, पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर भारत को लगातार कठिन रणनीतिक संतुलन साधना पड़ा है।
यानी विदेश नीति में भी उपलब्धि के साथ चुनौती मौजूद है।
25 साल बाद सबसे बड़ा सवाल—मोदी के बाद क्या?
नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यह नहीं कि उन्होंने 25 वर्ष सत्ता में बिताए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन्होंने भाजपा की राजनीति को कितना बदल दिया?
एक समय भाजपा सामूहिक नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में पहचानी जाती थी। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं की अलग-अलग राजनीतिक पहचान थी।
मोदी युग में भाजपा की चुनावी राजनीति काफी हद तक प्रधानमंत्री के चेहरे के आसपास केंद्रित हुई।
यह रणनीति चुनाव जीतने में बेहद प्रभावी साबित हुई।
लेकिन हर मजबूत राजनीतिक व्यवस्था के सामने एक स्वाभाविक प्रश्न होता है—
उसके बाद क्या?
क्या भाजपा मोदी के बाद भी उसी तरह चुनाव जीत पाएगी?
क्या पार्टी में वैकल्पिक राष्ट्रीय नेतृत्व तैयार है?
क्या मोदी मॉडल किसी दूसरे नेता द्वारा दोहराया जा सकता है?
इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं।
गुजरात से दिल्ली तक—एक नेता, कई अध्याय
7 अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने गुजरात की सत्ता संभाली थी।
उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह नियुक्ति भारतीय राजनीति के सबसे लंबे सत्ता अध्यायों में बदल जाएगी।
गुजरात में राजनीतिक अस्थिरता से निकलकर मोदी ने अपनी प्रशासनिक शैली स्थापित की।
2002 ने उनके राजनीतिक जीवन पर गहरी बहस और विवाद की छाप छोड़ी।
वाइब्रेंट गुजरात ने उन्हें विकास और निवेश के ब्रांड से जोड़ा।
2014 ने उन्हें राष्ट्रीय सत्ता के केंद्र में पहुंचाया।
2019 ने उनकी चुनावी स्वीकार्यता को और मजबूत किया।
2024 ने दिखाया कि भाजपा के पूर्ण बहुमत से नीचे आने के बावजूद मोदी गठबंधन के सहारे तीसरी बार प्रधानमंत्री बन सकते हैं।
यानी 25 वर्ष की यह यात्रा सिर्फ सत्ता में रहने की कहानी नहीं है।
यह भारतीय राजनीति के बदलते चरित्र की कहानी भी है।
पर्दाफाश का निष्कर्ष: उपलब्धि बड़ी है, लेकिन अंतिम फैसला इतिहास करेगा
नरेंद्र मोदी के सत्ता के शिखर पर 25 वर्ष पूरे होना भारतीय लोकतंत्र में निश्चित रूप से असाधारण राजनीतिक उपलब्धि है।
लेकिन लोकतंत्र में किसी नेता की महानता का अंतिम फैसला उसके समर्थक या विरोधी नहीं करते।
समय करता है।
इतिहास यह देखेगा कि मोदी ने भारत की अर्थव्यवस्था को कहां पहुंचाया।
यह भी देखेगा कि रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की चुनौती का क्या समाधान निकला।
इतिहास यह भी दर्ज करेगा कि उनके शासन में संस्थाओं की भूमिका कितनी मजबूत हुई।
वह 2002 के गुजरात की त्रासदी को भी भूलेगा नहीं और उसके बाद गुजरात में हुए आर्थिक तथा प्रशासनिक बदलावों को भी नजरअंदाज नहीं करेगा।
वह 2014 की राजनीतिक क्रांति, 2019 की बड़ी जीत और 2024 की गठबंधन वापसी—तीनों को एक साथ देखेगा।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा—
क्या नरेंद्र मोदी सिर्फ 25 साल तक सत्ता के शिखर पर रहने वाले नेता थे, या उन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी?
इस सवाल का जवाब आज देना जल्दबाजी होगी।
लेकिन एक बात निर्विवाद है—
7 अक्टूबर 2001 को गुजरात से शुरू हुई नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा आज भारतीय राजनीति के सबसे लंबे, सबसे प्रभावशाली और सबसे बहसतलब सत्ता अध्यायों में शामिल हो चुकी है।
25 वर्ष बाद भी उनका राजनीतिक प्रभाव कायम है।
उनके समर्थक इसे नेतृत्व की असाधारण क्षमता मानते हैं।
उनके आलोचक इसे सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण की मिसाल बताते हैं।
लेकिन दोनों पक्ष एक बात पर सहमत दिखाई देते हैं—
भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी को नजरअंदाज करके आज की राजनीति को समझना संभव नहीं है।
और यही शायद 25 वर्षों की उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है।















