“लीज डीड में दर्ज सुविधाओं की जानकारी सार्वजनिक कराने की मांग, ग्राम विकास संगठन ने प्राधिकरण के सामने उठाया बड़ा सवाल — किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के दाखिले को लेकर भी गंभीर शिकायत”
नोएडा। पर्दाफाश न्यूज़।
नोएडा में किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सवाल सिर्फ एक बोर्ड लगाने का नहीं, बल्कि उन सुविधाओं की सार्वजनिक जानकारी देने का है, जिनका उल्लेख नोएडा प्राधिकरण द्वारा आवंटित भूमि की लीज डीड की शर्तों में किया गया है।
ग्राम विकास संगठन नोएडा ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी निर्देशों और उसके बाद नोएडा प्राधिकरण की बैठक में लिए गए निर्णय के बावजूद आज वर्ष 2026 तक प्राधिकरण की ओर से आवंटित भूमि पर संचालित स्कूलों और अस्पतालों के बाहर निर्धारित 10×15 फीट के डिस्प्ले बोर्ड नहीं लगाए गए हैं।
संगठन का कहना है कि इन बोर्डों पर लीज डीड के अनुसार ग्रामीणों, किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों सहित संबंधित पात्र लोगों को मिलने वाली सुविधाओं की स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए, ताकि जरूरतमंद परिवारों को अपने अधिकारों की जानकारी हो और वे संबंधित संस्थान से नियमानुसार सुविधा की मांग कर सकें।
यानी सवाल सीधा है—अगर प्राधिकरण ने नियम और शर्तें तय की थीं, तो उनका सार्वजनिक प्रदर्शन आखिर क्यों नहीं हुआ?
2015 में निर्देश, फिर बैठक… लेकिन जमीन पर तस्वीर जस की तस?
ग्राम विकास संगठन नोएडा के संयोजक डीपी चौहान के नेतृत्व में संगठन का एक प्रतिनिधिमंडल नोएडा प्राधिकरण के सेक्टर-96 स्थित प्रशासनिक कार्यालय पहुंचा और अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी वंदना त्रिपाठी से मुलाकात कर पूरे मामले को सामने रखा।
संगठन के अनुसार, वर्ष 2015 में मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से पत्र जारी कर नोएडा प्राधिकरण को निर्देशित किया गया था कि प्राधिकरण क्षेत्र में आने वाले स्कूलों और अस्पतालों में लीज डीड के अनुसार ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं की जानकारी 10×15 फीट के बोर्ड पर प्रदर्शित कराई जाए।
इसके बाद 25 जुलाई 2015 को नोएडा प्राधिकरण में इस विषय पर बैठक भी आयोजित की गई थी। संगठन के मुताबिक बैठक में यह निर्णय लिया गया था कि लीज डीड की शर्तों के अनुसार कमजोर वर्ग एवं अन्य पात्र वर्गों को दी जाने वाली सुविधाओं का विवरण लिखकर डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं।
बताया गया कि प्राधिकरण की ओर से संबंधित परियोजना अभियंताओं के माध्यम से उन स्कूलों और अस्पतालों को भी इसकी जानकारी दी गई थी, जो प्राधिकरण द्वारा आवंटित भूमि पर संचालित हो रहे हैं।
लेकिन संगठन का दावा है कि 2015 से 2026 आ गया, मगर बोर्ड आज भी नजर नहीं आ रहे हैं।
यही वह बिंदु है जिस पर अब जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।
11 साल में बोर्ड नहीं लगा तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल
किसी भी सरकारी आदेश या प्राधिकरण के निर्णय का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उसका पालन जमीन पर दिखाई दे।
यदि वास्तव में 2015 में बोर्ड लगाने का निर्देश और निर्णय हुआ था, संबंधित संस्थानों को इसकी सूचना भी दी गई थी, तो फिर इतने वर्षों तक इसका अनुपालन हुआ या नहीं—इसकी निगरानी किस स्तर पर हुई?
क्या प्राधिकरण ने स्कूलों और अस्पतालों का निरीक्षण कर यह जांच की कि बोर्ड लगाए गए या नहीं?
यदि जांच हुई, तो कितने संस्थानों में बोर्ड मिले?
यदि बोर्ड नहीं मिले, तो संबंधित संस्थानों को क्या नोटिस दिए गए?
क्या लीज डीड की शर्तों के उल्लंघन की स्थिति में कोई कार्रवाई प्रस्तावित या की गई?
और सबसे बड़ा सवाल—अगर पात्र किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी ही सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं की गई, तो आम परिवार अपने अधिकारों को जानेगा कैसे?
ग्राम विकास संगठन ने इन्हीं सवालों को नोएडा प्राधिकरण के सामने रखा है।
157 स्कूलों पर संगठन ने उठाई उंगली
ग्राम विकास संगठन के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अशोक चौहान ने प्राधिकरण के समक्ष मांग रखी कि नोएडा प्राधिकरण द्वारा भूमि आवंटित किए गए सभी 157 स्कूलों को नोटिस जारी किया जाए और उनसे लीज डीड में दर्ज शर्तों के अनुपालन की स्थिति स्पष्ट कराई जाए।
संगठन का कहना है कि यदि स्कूलों को प्राधिकरण की ओर से भूमि आवंटन विशेष शर्तों के साथ किया गया है, तो उन शर्तों की जानकारी और पात्र परिवारों के लिए उपलब्ध सुविधाओं को सार्वजनिक करना आवश्यक है।
यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल बोर्ड लगाने तक सीमित नहीं है।
संगठन ने आरोप लगाया है कि किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों के दाखिले के मामले में भी समस्याएं सामने आ रही हैं।
हालांकि, किसी भी व्यक्तिगत स्कूल या संस्था पर नियम उल्लंघन का निष्कर्ष संबंधित दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारी की जांच के बाद ही निकाला जाना चाहिए। लेकिन संगठन का कहना है कि पारदर्शी व्यवस्था के लिए सभी 157 स्कूलों के लीज डीड अनुपालन की जांच जरूरी है।
“बोर्ड लगेगा तो अधिकार की जानकारी होगी” — अशोक चौहान
अशोक चौहान ने प्राधिकरण के सामने यह मुद्दा भी उठाया कि क्षेत्र के किसान जब इलाज के लिए निजी अस्पतालों में जाते हैं तो उन्हें कथित तौर पर अपेक्षित छूट या सुविधाओं की जानकारी नहीं मिलती।
संगठन की मांग है कि निजी अस्पतालों के बाहर भी स्पष्ट रूप से ऐसा बोर्ड लगाया जाए, जिसमें लीज डीड के अनुसार पात्र लोगों को उपलब्ध सुविधाओं, छूट अथवा अन्य प्रावधानों की जानकारी दर्ज हो।
यह मांग मूलतः पारदर्शिता और सूचना के अधिकार से जुड़ी है।
किसी किसान या कमजोर परिवार को किसी सुविधा का लाभ मिलना है या नहीं, यह संबंधित लीज डीड, लागू नियमों और पात्रता शर्तों पर निर्भर करेगा। लेकिन यदि पात्रता और सुविधा की जानकारी ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होगी, तो आम व्यक्ति अपने दावे को प्रभावी ढंग से कैसे प्रस्तुत करेगा?
यही वजह है कि संगठन ने बोर्ड लगाने को महज औपचारिकता नहीं बल्कि जागरूकता और जवाबदेही का माध्यम बताया है।
दाखिलों का सवाल भी गंभीर — क्या लीज डीड की शर्तें लागू हो रही हैं?
ग्राम विकास संगठन ने विशेष रूप से किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के दाखिलों का मुद्दा उठाया है।
संगठन की मांग है कि नोएडा प्राधिकरण सभी 157 स्कूलों को नोटिस जारी कर यह स्पष्ट कराए कि:
- लीज डीड में दर्ज सामाजिक दायित्वों का कितना पालन किया जा रहा है?
- पात्र किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए क्या प्रावधान हैं?
- इन प्रावधानों की जानकारी अभिभावकों को कैसे दी जा रही है?
- स्कूलों में इन सुविधाओं से संबंधित सूचना बोर्ड क्यों नहीं लगाए गए?
- पिछले वर्षों में प्राधिकरण ने अनुपालन की निगरानी के लिए क्या कार्रवाई की?
इन सवालों के जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है क्योंकि सरकारी/प्राधिकरण भूमि के आवंटन से जुड़ी शर्तें केवल कागजों में दर्ज रहने के लिए नहीं होतीं।
यदि किसी शर्त का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्ग को सुविधा उपलब्ध कराना है, तो उसके क्रियान्वयन की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अस्पतालों को लेकर भी उठी जांच की मांग
मामला केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है। संगठन ने प्राधिकरण द्वारा आवंटित भूमि पर संचालित निजी अस्पतालों में भी लीज डीड से संबंधित सुविधाओं की जानकारी सार्वजनिक कराने की मांग की है।
संगठन का कहना है कि अस्पतालों के बाहर स्पष्ट बोर्ड होने से किसान और कमजोर वर्ग के मरीजों को यह जानकारी मिल सकेगी कि उन्हें किन परिस्थितियों में कौन सी सुविधा अथवा छूट मिल सकती है।
यहां भी एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है—किसी अस्पताल द्वारा छूट अथवा सुविधा दिए जाने की बाध्यता वही होगी जो संबंधित लीज डीड, प्राधिकरण के आदेश और लागू नियमों में वास्तव में निर्धारित है।
इसीलिए संगठन ने प्राधिकरण से मांग की है कि वह सभी संबंधित संस्थानों की लीज डीड और अनुपालन की जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करे।
अब गेंद नोएडा प्राधिकरण के पाले में
प्रतिनिधिमंडल ने अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी वंदना त्रिपाठी के समक्ष अपनी समस्याएं और मांगें रखीं। संगठन के अनुसार, प्राधिकरण की अधिकारी ने मामले को सुनने के बाद अतिशीघ्र समस्या के समाधान का आश्वासन दिया है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि आश्वासन के बाद प्राधिकरण की कार्रवाई किस रूप में सामने आती है।
क्या 157 स्कूलों को नोटिस जारी होंगे?
क्या अस्पतालों के लीज डीड की भी जांच होगी?
क्या 10×15 फीट के बोर्ड वास्तव में लगाए जाएंगे?
क्या बोर्ड पर सिर्फ सामान्य जानकारी होगी या लीज डीड में दर्ज वास्तविक सुविधाओं और पात्रता की स्पष्ट जानकारी दी जाएगी?
और सबसे अहम—क्या किसानों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के दाखिले से जुड़ी शिकायतों की भी नियमों के तहत जांच होगी?
पर्दाफाश के सवाल
11 साल पुराने निर्देश पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
157 स्कूलों में लीज डीड की शर्तों का अनुपालन कौन जांचेगा?
किसानों और कमजोर वर्गों को मिलने वाली सुविधाओं की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं?
10×15 के अनिवार्य बताए जा रहे डिस्प्ले बोर्ड आखिर कहां हैं?
क्या स्कूलों और अस्पतालों को कभी अनुपालन रिपोर्ट देने के लिए बाध्य किया गया?
अगर नियम लागू हैं तो उनका पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों का जवाब सिर्फ ग्राम विकास संगठन या किसानों को नहीं, बल्कि नोएडा के उन सभी परिवारों को मिलना चाहिए जिनके अधिकार इन प्रावधानों से जुड़े हैं।
अब सिर्फ आश्वासन नहीं, कार्रवाई का इंतजार
ग्राम विकास संगठन नोएडा के संयोजक डीपी चौहान, राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अशोक चौहान और अन्य पदाधिकारियों की ओर से उठाया गया मुद्दा अब नोएडा प्राधिकरण के सामने है।
प्रतिनिधिमंडल में सतेन्द्र गुर्जर सहित अन्य लोग भी उपस्थित रहे।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब जरूरत है कि प्राधिकरण केवल पुराने रिकॉर्ड खंगालने तक सीमित न रहे, बल्कि 157 स्कूलों और संबंधित अस्पतालों की लीज डीड, अनुपालन और पात्र वर्गों को दी जा रही सुविधाओं की वस्तुस्थिति की जांच करे।
यदि नियमों का पालन हो रहा है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
यदि पालन नहीं हो रहा है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
और यदि कहीं किसानों या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, तो सक्षम प्राधिकारी को कानून और लीज डीड की शर्तों के अनुरूप तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई करनी चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक बोर्ड का नहीं है।
सवाल उस अधिकार की जानकारी का है, जो कागजों में दर्ज होने के बाद भी जमीन पर आम आदमी तक पहुंच रहा है या नहीं।
अब देखना यह है कि 2015 में उठी फाइल 2026 में सिर्फ फिर से खुलेगी या वास्तव में 157 स्कूलों के बाहर किसानों और कमजोर वर्गों के अधिकार का बोर्ड भी दिखाई देगा।















