“मोरना पुलिस चौकी पहुंचा फरियादी, शिकायत सुनने के लिए नहीं मिला कोई पुलिसकर्मी—अब सवाल, जनता अपनी फरियाद लेकर जाए तो जाए कहां?”
नोएडा।
कमिश्नरेट गौतमबुद्धनगर पुलिस की ओर से आए दिन अपने “सराहनीय कार्य” और बेहतर पुलिसिंग की तस्वीरें सामने आती रहती हैं। पुलिस की उपलब्धियों और कार्रवाई के प्रेस नोट भी लगातार जारी होते हैं। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के बीच नोएडा के थाना सेक्टर-24 क्षेत्र की मोरना पुलिस चौकी से सामने आया एक वीडियो जमीनी पुलिस व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर रहा है।
मामला एक ऐसे फरियादी का है, जो अपनी गाड़ी को दूसरी गाड़ी द्वारा टक्कर मारे जाने के बाद शिकायत दर्ज कराने के लिए मोरना पुलिस चौकी पहुंचा था। पीड़ित का कहना है कि उसके पास घटना से संबंधित वीडियो और कैमरा रिकॉर्डिंग भी मौजूद है। उम्मीद थी कि चौकी पर उसकी शिकायत सुनी जाएगी और मामले में आवश्यक कार्रवाई होगी।
लेकिन चौकी पहुंचने के बाद जो स्थिति सामने आई, उसने फरियादी को ही सवाल करने पर मजबूर कर दिया।
चौकी में पहुंचा फरियादी, पुलिसकर्मी तलाशता रहा
पीड़ित द्वारा बनाए गए वीडियो में वह चौकी परिसर के भीतर पुलिसकर्मियों को तलाशता दिखाई देता है। उसका कहना है कि चौकी पर उसे कोई पुलिसकर्मी दिखाई नहीं दिया।
फरियादी कैमरे के सामने अपनी समस्या बताते हुए सवाल करता है कि जब शिकायत दर्ज कराने के लिए वह पुलिस चौकी पहुंच चुका है और वहां कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं है, तो आखिर वह अपनी शिकायत किसके सामने दर्ज कराए?
यानी एक तरफ घटना का शिकार व्यक्ति पुलिस की मदद लेने चौकी पहुंचा और दूसरी तरफ उसे वहां पुलिसकर्मी ही तलाशने पड़े।
“सराहनीय कार्य” की तस्वीर और चौकी की हकीकत में कितना अंतर?
कमिश्नरेट गौतमबुद्धनगर पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर आधिकारिक तौर पर लगातार बेहतर पुलिसिंग, त्वरित कार्रवाई और जनसुनवाई की बातें सामने आती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि जनसुनवाई की शुरुआत आखिर कहां से होती है?
क्या किसी फरियादी के लिए पुलिस चौकी तक पहुंचना ही पर्याप्त है या वहां उसकी शिकायत सुनने वाला पुलिसकर्मी भी उपलब्ध होना चाहिए?
यदि पुलिसकर्मी किसी अन्य सरकारी ड्यूटी, गश्त, जांच अथवा आपात स्थिति में बाहर थे, तो चौकी पर आने वाले फरियादी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या थी? यह भी पुलिस विभाग को स्पष्ट करना चाहिए।
आख़िर नोएडा की जनता के साथ हो रहे अन्याय के लिए अब नोएडा पुलिस अपनी चौकियो से नदारद दिख रही है आखिर आम इंसान कहा जाए अपनी पीड़ा लिखवाने बाकी कागजो में तो मौसम गरम रहता ही है और आये दिन अखबारों में न 1 पुलिस दिखती रहती है।
अभी एक पीड़ित अपनी समस्या लिखवाने चौकी गया तो वहाँ क्या… pic.twitter.com/faZ4jTNtFy
— Dr.Ashray Gupta (@ashray_gupta) October 2, 2026
मोरना चौकी प्रभारी उप निरीक्षक अजीत सिंह बताए जा रहे
पीड़ित द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार मोरना पुलिस चौकी के प्रभारी उप निरीक्षक अजीत सिंह बताए जा रहे हैं।
हालांकि, वीडियो में पुलिसकर्मियों के दिखाई नहीं देने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उस समय पूरी पुलिस टीम ड्यूटी से अनुपस्थित थी। वास्तविक स्थिति पुलिस विभाग के आधिकारिक स्पष्टीकरण के बाद ही स्पष्ट होगी।
लेकिन सवाल फिर भी कायम है कि वीडियो बनाए जाने के समय चौकी पर शिकायत लेकर पहुंचे इस व्यक्ति की शिकायत सुनने की जिम्मेदारी किसकी थी?
गाड़ी में टक्कर, सबूत भी मौजूद… फिर शिकायत कहां दर्ज हो?
पीड़ित के अनुसार उसकी गाड़ी को दूसरी गाड़ी ने टक्कर मारकर क्षतिग्रस्त कर दिया। घटना के संबंध में उसके पास वीडियो फुटेज और कैमरा रिकॉर्डिंग उपलब्ध है।
यानी शिकायतकर्ता के पास घटना से संबंधित संभावित साक्ष्य मौजूद होने का दावा है और वह स्वयं पुलिस के पास पहुंचा था।
ऐसे में यदि किसी फरियादी को पुलिस चौकी पर ही पुलिसकर्मी नहीं मिलता, तो यह व्यवस्था के लिए निश्चित तौर पर विचार करने वाला विषय है।
2 अक्टूबर को गांधी जयंती… क्या फरियादी की भी छुट्टी?
यह मामला 2 अक्टूबर, गांधी जयंती के दिन सामने आया। सरकारी कार्यालयों में अवकाश था, लेकिन अपराध, दुर्घटना और आम आदमी की परेशानी किसी कैलेंडर को देखकर नहीं आती।
यही वजह है कि इस पूरे मामले पर व्यंग्यात्मक सवाल भी उठ रहा है—
“क्या गांधी जयंती पर चौकी में पुलिस की ड्यूटी भी छुट्टी पर थी?”
बेशक यह सवाल व्यंग्यात्मक है, लेकिन इसके पीछे एक वास्तविक नागरिक चिंता है—यदि कोई व्यक्ति किसी घटना के बाद पुलिस सहायता लेने चौकी पहुंचता है, तो उसे कम से कम शिकायत दर्ज कराने अथवा संबंधित अधिकारी से संपर्क करने की व्यवस्था मिलनी चाहिए।
पर्दाफाश का सवाल—प्रेस नोट में पुलिस सक्रिय, चौकी पर फरियादी परेशान क्यों?
कमिश्नरेट गौतमबुद्धनगर पुलिस की ओर से जारी होने वाले प्रेस नोटों में अक्सर “सराहनीय कार्य” शीर्षक प्रमुखता से दिखाई देता है।
लेकिन जनता के लिए पुलिस की असली परीक्षा प्रेस नोट में नहीं, बल्कि उस समय होती है जब कोई पीड़ित व्यक्ति अपनी समस्या लेकर पुलिस चौकी पहुंचता है।
कागजों पर कार्रवाई, प्रेस नोट में उपलब्धियां और जमीन पर फरियादी को पुलिसकर्मी की तलाश—इन तीनों तस्वीरों में आखिर तालमेल कब बैठेगा?
मोरना पुलिस चौकी से सामने आया यह वीडियो कम से कम इतना सवाल जरूर पूछ रहा है कि—
“अगर फरियादी चौकी तक पहुंच गया, तो क्या पुलिस भी फरियादी तक पहुंची?”
फिलहाल इस मामले में पुलिस विभाग अथवा मोरना पुलिस चौकी प्रभारी की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। पुलिस का पक्ष आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वीडियो बनाए जाने के समय चौकी पर तैनात पुलिसकर्मी कहां थे, उनकी ड्यूटी क्या थी, चौकी पर शिकायत प्राप्त करने की व्यवस्था क्या थी और वाहन क्षति की शिकायत लेकर पहुंचे व्यक्ति की शिकायत पर आगे क्या कार्रवाई की गई।
पर्दाफाश न्यूज़ इस मामले में पुलिस का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।















