संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने बुधवार को तीन अहम विधेयकों—संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 और संघ शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक, 2025—पर अपनी पहली औपचारिक परामर्श बैठक की. करीब तीन घंटे चली इस बैठक में इन विधेयकों के संवैधानिक वैधता, कानूनी परिणाम और लोकतांत्रिक प्रभावों पर विस्तार से चर्चा हुई.
पीएम-सीएम को लेकर सबसे बड़ा प्रस्ताव
संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025 का सबसे चर्चित प्रावधान यह है कि यदि प्रधानमंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री को लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना अनिवार्य होगा. यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो 31वें दिन से उनका पद स्वतः रिक्त माना जाएगा. सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक नैतिकता बनाए रखने के लिए आवश्यक है.
शीर्ष कानूनी विशेषज्ञों की प्रस्तुति
बैठक में देश के चार प्रमुख विधि विशेषज्ञों ने समिति के समक्ष अपने विचार रखे—
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) दिनेश माहेश्वरी, अध्यक्ष, विधि आयोग
डॉ. अंजू राठी राणा, सदस्य-सचिव, विधि आयोग
प्रो. (डॉ.) जीएस बाजपेयी, कुलपति, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (NLU), दिल्ली
प्रो. श्री कृष्ण देवा राव, कुलपति, नालसार विधि विश्वविद्यालय, हैदराबाद
सूत्रों के मुताबिक, विशेषज्ञों ने विधेयकों के मूल उद्देश्य का समर्थन किया, लेकिन कुछ प्रावधानों पर संवैधानिक संतुलन, न्यायिक प्रक्रिया और संभावित दुरुपयोग को लेकर सवाल भी उठाए.
लिखित राय मांगी, अगली बैठक 22 जनवरी को
चर्चा के बाद जेपीसी ने चारों विशेषज्ञों से तीनों विधेयकों पर विस्तृत लिखित राय और समिति सदस्यों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के जवाब देने को कहा है.
31 सदस्यीय जेपीसी में 21 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसद शामिल हैं. समिति की अगली बैठक 22 जनवरी को होगी.
विपक्ष को बुलाने की मांग
बैठक के दौरान एक विपक्षी सांसद ने सुझाव दिया कि विपक्षी दलों को भी समिति के सामने अपनी बात रखने का अवसर दिया जाए. सूत्रों के अनुसार, जेपीसी अध्यक्ष ने इस प्रस्ताव पर विचार करने का आश्वासन दिया है.
अपराजिता सारंगी का तीखा बयान
बैठक के बाद जेपीसी अध्यक्ष अपराजिता सारंगी ने कहा कि सरकार ने सभी राजनीतिक दलों को शालीनता के साथ समिति में भाग लेने का निमंत्रण दिया, लेकिन कुछ दलों ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा,
“सरकार कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहती है, लेकिन कुछ दलों की सोच ‘जेल से सरकार चलाने’ की है, जो लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ और उसका अपमान है.”
अपराजिता सारंगी ने दोहराया कि समिति का उद्देश्य राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक स्पष्टता और सुशासन सुनिश्चित करना है.














