पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले झारखंड की सियासत में संभावित बदलाव की चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि झारखंड में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच नए समीकरण तलाशे जा रहे हैं। इसके पीछे कई हालिया घटनाक्रम और बदलते राजनीतिक हित जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।
कांग्रेस और RJD से नाराजगी बनी वजह
सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान से ही कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से दूरी बनाने की कोशिश में हैं। गठबंधन के बावजूद बिहार चुनाव में JMM को एक भी सीट न मिलने से हेमंत सोरेन कांग्रेस नेतृत्व से खासे नाराज़ बताए जाते हैं।
इसी दौरान खबर है कि सीएम सोरेन अपनी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ दिल्ली में बीजेपी के एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री से मुलाकात भी कर चुके हैं, जिसमें उन्होंने अपने राजनीतिक विकल्पों पर गंभीर चर्चा की थी।
गठबंधन नहीं, ‘राजनैतिक तालमेल’ की रणनीति
जानकारों के अनुसार हेमंत सोरेन बीजेपी के साथ औपचारिक गठबंधन के बजाय ‘पॉलिटिकल अंडरस्टैंडिंग’ चाहते हैं। वे ऐसी व्यवस्था चाह रहे हैं, जैसी आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और ओडिशा में नवीन पटनायक ने अपनाई — जहां उन्होंने सत्ता राज्य में रखी लेकिन केंद्र से सहयोगी रिश्ते भी निभाए।
JMM नेताओं का दावा है कि आवश्यकता पड़ने पर वे कांग्रेस और RJD के विधायकों में सेंध लगाकर बहुमत कायम रख सकते हैं — बशर्ते बीजेपी इस प्रक्रिया में रोड़ा न बने।
बीजेपी का गणित: साझेदारी का क्या फायदा?
दूसरी ओर, बीजेपी के भीतर इस संभावित तालमेल को लेकर मिश्रित राय है। पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिलती, तो JMM के साथ जाने का रणनीतिक लाभ कम होगा।
हालांकि, समर्थक गुट का तर्क है कि गठबंधन होने पर BJP को झारखंड में आदिवासी मतदाताओं का भरोसा मिलेगा और आने वाले समय में राज्यसभा सीटों पर भी फायदा होगा। साथ ही इसका असर पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भी दिख सकता है।
हेमंत सोरेन की चुनौती: वित्तीय संकट और कानूनी दबाव
झारखंड सरकार इस समय गंभीर वित्तीय संकट का सामना कर रही है। कई योजनाओं को लागू करने में केंद्र से टकराव की वजह से बाधाएं आ रही हैं। माना जा रहा है कि बीजेपी के साथ तालमेल होने पर केंद्र सरकार झारखंड के लिए वित्तीय सहायता और योजनाओं की मंजूरी में उदार रुख अपना सकती है, जैसा बिहार और आंध्र प्रदेश में देखा गया है।
इसके अलावा, मुख्यमंत्री सोरेन और उनके कई करीबी सहयोगी भ्रष्टाचार और जमीन घोटाले से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों के चंगुल में हैं। खुद सोरेन जेल यात्रा कर चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के साथ समीकरण बनने पर उन्हें कानूनी मोर्चे पर भी राहत मिल सकती है।
नतीजा क्या होगा?
अब सवाल यह है कि क्या आगामी महीनों में झारखंड की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिलेगा? या यह सिर्फ राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है?
फिलहाल इतना तय है कि आने वाले समय में झारखंड की राजनीति सिर्फ सत्ता समीकरण नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल, दिल्ली और राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी प्रभावित कर सकती है।














