ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने फैसला किया है: जो आँखें वर्षों से खुली रहीं और फिर भी कुछ नहीं देख पाईं, अब वे इसरो के चश्मे से देखी जाएँगी। बजट—साठ लाख रुपए। उद्देश्य—अवैध निर्माण और अतिक्रमण की पहचान। परिणाम की गारंटी? स्पष्ट नहीं। पर हाँ, द्वार पर एक चमकदार एमओयू और खाते में कट गया रकम — यही तो आधुनिक समाधान की परिभाषा है।
नजदीकी दृष्टि दोष या महंगे चश्मे की बाज़ारू नीति?
प्राधिकरण का यकीन दिलचस्प है: समस्या दृश्यमान नहीं इसलिए उपग्रह से देखनी चाहिए। सवाल सीधा है — क्या भ्रष्टाचार-अवसर-आधारित अवैध निर्माण इतने सूक्ष्म हैं कि 130 मीटर रोड के दोनों ओर खुलेआम बने कॉलोनीज़ और हाउसिंग सोसायटी दिखाई ही नहीं पड़तीं? क्या दादरी बाइपास पर हजारों एकड़ ज़मीन पर उठ रहे औद्योगिक पार्कों की आहट इतनी कमज़ोर हो गई है कि प्राधिकरण के अभियंता और भूलेख के अधिकारी उसे सुन ही नहीं पाते?
यह वही प्राधिकरण है जिसे शिकायतों का ढेर रोज़ मिल रहा है—समाचारों में उठती आवाज़ें, सोशल मीडिया पर फैलती तस्वीरें और स्थानीय निवासियों की कराहना। फिर भी कार्रवाई ‘ऊपर से सिग्नल नहीं मिलने’ के बहाने अटक जाती है। और अब यह वही संस्था इसरो के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के पास जाएगी — तकनीक का सहारा लेकर अपनी अजब सूझ-बूझ छिपाने के लिए।
एक साल पहले गाजियाबाद की साख: वही कहानी
यह प्रयोग नया नहीं है। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने भी साल भर पहले इसी एजेंसी से डाटा लिया — और, हालांकि आधिकारिक भाष्य कम-ज़्यादा शिष्ट रहता है, एक वरिष्ठ अधिकारी ने खुलकर कहा कि मिला हुआ डेटा “किसी काम का नहीं” निकला। मतलब साफ़ है: महंगी उपग्रह तस्वीरें और प्रोसेस्ड रिपोर्ट तभी काम की होती हैं जब जमीन पर त्वरित सत्यापन और कार्यवाही हो — वरना वे सिर्फ़ नियत बजट की कहानी बनकर रह जाती हैं।
सवाल: भारी-भरकम अभियंता और भूलेख विभाग क्या कर रहे हैं?
अगर प्राधिकरण के इन-हाउस विभागों, सर्वेटीमों और क्षेत्रीय निरीक्षकों की ही निगाहों में कमी है, तो क्यों न पहले उनकी क्षमताओं में निवेश किया जाए? क्या ज़मीन के रिकॉर्ड और सर्वे की प्रक्रियाएँ सही से चल रही हैं? क्या स्थानीय अधिकारियों के पास रिपोर्टों की त्वरित पहचान व रोकथाम का कोई सिस्टम है — या सिस्टम तभी सक्रिय होता है जब किसी राजनीतिक ‘सिग्नल’ का इंतज़ार पूरा हो जाए?
सरकारी मशीनरी में अक्सर दो तरह की ख़ामियाँ दिखती हैं: एक, स्थानीय स्तर पर निष्क्रियता—लोग शिकायत करते हैं पर कार्रवाई नहीं होती; दूसरा, केंद्रिय/ऊपरी आदेशों का इंतज़ार—नीचे के अधिकारी बोलते हैं “ऊपर से सिग्नल नहीं मिल रहा।” इन दोनों का मेल मिलकर बनता है अवैध निर्माण का सहज परिवेश।
इसरो — क्या वह ‘निर्णायक’ जाँचक है या महंगी तकनीकी सजावट?
इसरो और नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर जैसी संस्थाएँ वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक आपदाओं का सर्वे, कृषि और जल संसाधनों के निगरानी में उत्कृष्ट योगदान देती रही हैं। पर क्या यही संस्थाएँ ज़मीन-स्तर के नोटिस, नोटिस-नॉनकम्प्लायंस और बलपूर्वक हटाने जैसे प्रशासनिक/कानूनी कदमों का विकल्प बन सकती हैं? नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर उपग्रह डेटा दे सकता है—पर कार्रवाई कौन करेगा? क्या एमओयू में यह प्रावधान है कि वे तो बस ‘फोटोग्राफ़ी’ करेंगे और हटाने-नोटिस-कार्रवाई की ज़िम्मेदारी प्राधिकरण की ही रहेगी? समाचार के अनुसार इस महीने के एमओयू में “स्ट्राइक” या व्यवहारिक कार्रवाई की शर्तें शामिल नहीं हैं — यानी केवल तस्वीरें और रिपोर्टें।
1️⃣ @OfficialGNIDA
ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को ज़मीन पर कुछ भी दिखाई नहीं देता इसलिए—अब 60 लाख रुपए देकर इसरो से स्पेस-चश्मा मंगाया जा रहा है!
अवैध निर्माण खोजने के लिए… आसमान से!#GreaterNoida @myogiadityanath @ChiefSecyUP @PMOIndia @CMOfficeUP pic.twitter.com/Jdzm2LkP11
— PARDAPHAAS NEWS (@pardaphaas) December 6, 2025
व्यावहारिकता बनाम तमाशा
साठ लाख रुपए—यह रकम किसी भी बड़े-scale सर्वे के लिए बहुत बड़ी नहीं है, पर निहितार्थ अहम हैं। अगर यह पैसा वास्तविक, ऑन-ग्राउंड एंटी-इन्क्रॉचमेंट टास्कफोर्स, बेहतर भूलेख डिजिटाईज़ेशन, नियमित सर्वे या शिकायत निपटान निदेशालय में लगाया जाए तो प्रभाव ज़्यादा टिकाऊ और पारदर्शी होगा। वरना यह खर्च भी वही कहानी दोहराएगा जो गाजियाबाद में हुई — महँगा डेटा, कम उपयोगिता, और एक और एमओयू जिसपर हस्ताक्षर होने के बाद जिम्मेदारी धुँधली हो जाती है।
कल्पना: अगर ISRO बोलता तो…
ਚिंतन का मनोरंजक पहलू — कल्पना करिए कि ISRO ने बड़ी ज़ोर-शोर से रिपोर्ट दी: “गुलिस्तानपुर के सामने अवैध कॉलोनी, 2.3 हेक्टेयर, 82 भवन, 15 लोचदार फ्लैट।” अगले दिन प्रशासन क्या करेगा? क्या त्वरित निरीक्षण, नोटिस और यदि आवश्यक हो तो रिकवरी-ऑपरेशन होंगे, या फिर यही रिपोर्ट प्रिंट कर के फाइलों के बीच दफ़न कर दी जाएगी? तकनीक अगर कार्रवाई के साथ समन्वित न हो तो वह सिर्फ दिखावा बनकर रह जाती है — और दिखावे के लिये साठ लाख खर्च करना तो फिर ‘विज्ञापन’ जैसा है, न कि सुधारात्मक कदम।
परीक्षण ठीक है, पर प्राथमिकता और पारदर्शिता ज़रूरी
किसी भी प्रशासनिक समस्या का समाधान बहु-आयामी होता है। उपग्रह-आधारित रिमोट सेंसिंग एक उपकरण है — उपयोगी तब होगा जब उसे ठोस on-ground कार्ययोजना, तेज़-तरीक़े से सत्यापन और पारदर्शी कार्रवाई से जोड़ा जाए। वरना यह महँगा चश्मा कभी निकट दृष्टि दोष नहीं ठीक करेगा — सिर्फ़ दिखावे से दफ़्तरों पर चमक लौटाएगा।
अंत में — शालीन सलाह नहीं, सख़्त निवेदन: अगर आपने साठ लाख देने का मन बनाया है, तो पहले यह तय कर लीजिए कि किसे देखना है, किसे हटाना है और किसे समेकित करने से शहर का कायाकल्प होगा। वरना ISRO के पास भेजी गई तस्वीरें भी वही कहेंगी जो गाज़ियाबाद की रिपोर्ट ने कही — “डेटा मिला, पर काम वही रहता है।”














