अमेरिका की ओर से वेनेजुएला पर बढ़ते दबाव और हालिया सैन्य-राजनीतिक हलचल ने वहां के तेल सेक्टर में एक बार फिर हलचल मचा दी है। दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले इस देश में अगर अमेरिका का प्रभाव या नियंत्रण बढ़ता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है।
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव से भारत के करीब 1 अरब डॉलर (8,000 करोड़ रुपये से ज्यादा) के लंबे समय से अटके बकाए निकलने की उम्मीद बन रही है। इतना ही नहीं, वेनेजुएला में भारतीय कंपनियों के ठप पड़े तेल प्रोजेक्ट्स को भी नई जान मिल सकती है।
कभी भारत का बड़ा सप्लायर था वेनेजुएला
एक वक्त था जब भारत वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार हुआ करता था।
2020 से पहले भारत रोज़ाना 4 लाख बैरल से ज्यादा तेल वेनेजुएला से आयात करता था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस रिश्ते पर ब्रेक लगा दिया।
तेल की खरीद तो रुकी ही, साथ ही भारतीय कंपनियों का अरबों डॉलर का पैसा भी वहीं फंस गया। प्रतिबंध, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश की कमी ने वेनेजुएला के तेल उत्पादन को लगभग पंगु बना दिया।
OVL का पैसा क्यों फंसा?
भारत की सरकारी कंपनी ONGC विदेश लिमिटेड (OVL) वेनेजुएला के सैन क्रिस्टोबल तेल क्षेत्र में साझेदार है। इस प्रोजेक्ट में OVL की हिस्सेदारी है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते जरूरी मशीनरी, तकनीक और सर्विसेज वहां नहीं पहुंच पाईं।
नतीजा ये हुआ कि वेनेजुएला सरकार 2014 के बाद OVL को करीब 536 मिलियन डॉलर का डिविडेंड नहीं दे पाई। इसके बाद के वर्षों का भुगतान भी अटकता चला गया।
कुल मिलाकर बकाया रकम करीब 1 अरब डॉलर तक पहुंच गई। ऑडिट की अनुमति न मिलने से विवाद सुलझाने की कोशिशें भी बेनतीजा रहीं।
अमेरिका की एंट्री से क्या बदल सकता है?
एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर अमेरिका की अगुवाई में वेनेजुएला के तेल सेक्टर का पुनर्गठन या नियंत्रण में बदलाव होता है, तो सबसे पहला कदम प्रतिबंधों में ढील हो सकता है।
ऐसा होते ही OVL जैसी कंपनियां दोबारा वहां रिग्स, मशीनें और आधुनिक टेक्नोलॉजी भेज सकेंगी।
यहां तक कि गुजरात में मौजूद ONGC के रिग्स को वेनेजुएला ले जाकर सैन क्रिस्टोबल फील्ड में लगाया जा सकता है।
5,000 बैरल से 1 लाख बैरल तक का सफर!
फिलहाल सैन क्रिस्टोबल फील्ड में उत्पादन सिमटकर 5,000–10,000 बैरल प्रतिदिन रह गया है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर नए कुएं खोदे जाएं और आधुनिक तकनीक लाई जाए, तो उत्पादन बढ़कर
80,000 से 1,00,000 बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।
यानी तेल उत्पादन भी बढ़ेगा और उसी कमाई से भारत का अटका हुआ पैसा भी वापस आ सकता है।
भारत के लिए क्यों है ये मौका बेहद अहम?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और फिलहाल उसकी बड़ी निर्भरता मिडिल ईस्ट पर है।
वेनेजुएला से सप्लाई शुरू होने पर भारत को एक मजबूत वैकल्पिक स्रोत मिलेगा, जिससे तेल कीमतों पर मोलभाव की ताकत भी बढ़ेगी।
खास बात ये है कि रिलायंस, IOC, HPCL-मित्तल, नायरा एनर्जी और MRPL जैसी भारतीय रिफाइनरियों के पास वेनेजुएला के भारी कच्चे तेल को प्रोसेस करने की पूरी क्षमता पहले से मौजूद है।
चीन की पकड़ ढीली पड़ सकती है
फिलहाल वेनेजुएला का ज़्यादातर तेल चीन खरीद रहा है। लेकिन अगर अमेरिका का प्रभाव बढ़ता है, तो चीन की यह प्राथमिक पहुंच कमजोर हो सकती है।
ऐसे में भारत को फिर से लॉन्ग-टर्म सप्लाई डील्स मिलने की संभावना बनती है।
विश्लेषकों का मानना है कि वेनेजुएला से सप्लाई बढ़ने पर वैश्विक तेल कीमतों में स्थिरता आएगी। हालांकि अमेरिका यह भी नहीं चाहेगा कि दाम बहुत नीचे जाएं, क्योंकि इससे उसका शेल ऑयल बिजनेस नुकसान में चला जाएगा। इसलिए उत्पादन संतुलन के लिए ओपेक देशों के साथ तालमेल बना रह सकता है।














