दिल्ली के जनकपुरी इलाके में दिल्ली जल बोर्ड की घोर लापरवाही ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया। सड़क पर बिना किसी चेतावनी या सुरक्षा घेराबंदी के खोदे गए गहरे गड्ढे में गिरकर 26 वर्षीय कमल ध्यानी की मौत हो गई। गुरुवार देर रात काम से घर लौटते वक्त कमल बाइक समेत उस गड्ढे में गिर गया और पूरी रात तड़पता रहा, लेकिन अंधेरे और लापरवाही ने उसकी आवाज़ किसी तक नहीं पहुंचने दी।
सबसे दर्दनाक पहलू यह रहा कि कमल के पिता नरेश ध्यानी और परिवार के छह अन्य सदस्य पूरी रात उसे ढूंढते रहे। वे कई बार उसी गड्ढे के पास से गुजरे, लेकिन वहां कोई बैरिकेडिंग या चेतावनी बोर्ड न होने की वजह से किसी को अंदाजा तक नहीं हुआ कि कमल उसी गड्ढे में फंसा पड़ा है।
रुआंसे गले से पिता ने कहा, “अगर वहां ज़रा-सी भी सुरक्षा होती, कोई घेरा या निशान होता, तो हम जरूर उस जगह को चेक करते… शायद मेरा बेटा आज जिंदा होता।”
नरेश ध्यानी, जो कैलाशपुरी के गढ़वाल मोहल्ले में रहते हैं और मंदिर में पुजारी हैं, मूल रूप से उत्तराखंड के रहने वाले हैं। कमल अपने जुड़वा भाई करण से सिर्फ चार मिनट छोटा था। दोनों भाई नौकरी कर परिवार की जिम्मेदारियां निभा रहे थे। कमल को बाइक का बेहद शौक था और उसने अपनी मेहनत की कमाई से तीन साल पहले बाइक खरीदी थी। वह सुरक्षा को लेकर भी सतर्क था—हादसे के वक्त उसने खास ऑनलाइन मंगवाया गया हेलमेट पहन रखा था, लेकिन असुरक्षित गड्ढे के सामने सारी सावधानी बेबस साबित हुई।
पूरी रात तलाश, सुबह मिली लाश
पुलिस के मुताबिक, रात करीब 2:50 बजे कमल के लापता होने की सूचना मिली थी। मोबाइल लोकेशन पोसंगीपुर पार्क के पास आई, जहां तलाश की गई, लेकिन अंधेरे में कुछ नजर नहीं आया। शुक्रवार सुबह करीब 8 बजे एक महिला की सूचना पर गड्ढे से कमल का शव बरामद किया गया।
प्रशासन पर सवाल, सरकार का एक्शन
हादसे के बाद इलाके में PWD और दिल्ली जल बोर्ड के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गड्ढे के आसपास न तो कोई चेतावनी बोर्ड था, न बैरिकेडिंग—यानी यह हादसा नहीं, सीधी लापरवाही है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। PWD मंत्री ने मौके का दौरा कर दुख जताया और इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार जूनियर इंजीनियर समेत तीन कर्मचारियों को तत्काल सस्पेंड कर दिया गया है। साथ ही, एक हाई-लेवल कमेटी गठित की गई है, जो यह जांच करेगी कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी किस स्तर पर हुई।
यह हादसा एक बार फिर सवाल खड़ा करता है—क्या राजधानी की सड़कों पर लोगों की जान इतनी सस्ती है कि बिना सुरक्षा खोदे गए गड्ढे किसी की जिंदगी निगल जाएं और जिम्मेदारी बाद में तय हो?














