Wednesday, February 11, 2026
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महाशिव का ज्योतिर्लिंग”सोमनाथ” की गाथा — प्रधानमंत्री की जुबानी

महाशिव का वह ज्योतिर्लिंग — सोमनाथ — केवल ईंट-पत्थर का मंदिर नहीं, यह भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। प्रभास पाटन के पश्चिमी तट पर स्थित यह स्थान सदियों से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और प्रार्थना का केंद्र रहा है। सोमनाथ का प्रकाश महादेव का प्रकाश है — जिसने अँधेरे में भी मार्ग दिखाया, और जिसे कोई शक्ति पूर्ण रूप से बुझा नहीं सकी।

हज़ार साल पहले, जनवरी 1026 में, गजनी के महमूद ने जिस निर्दयी आक्रमण का प्रयास किया — उसका उद्देश्य केवल एक स्मारक को ध्वस्त करना नहीं था, बल्कि अस्मिता, आस्था और सभ्यता के एक प्रतीक को मिटाना था। पर महादेव की ज्योति ऐसी अग्नि है जो तुषार नहीं झुकती। मंदिर को बार-बार निशाना बनाया गया, पर हर बार मनुष्य ने अपने ही खंडहरों से उसे उठाया, फिर से सजाया और उसे पुरानी भव्यता के साथ खड़ा किया।

हम देख सकते हैं कि यह केवल पत्थरों की पुनर्रचना नहीं थी — यह करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा थी। समुद्री व्यापारी, नाविक, साधु-संत और आम जनता — सबने मिलकर इस तीर्थ की महिमा को दूर-दूर तक पहुँचाया। सोमनाथ ने हमें यह सिखाया कि असली शक्ति उसकी मनोबल, उसकी आस्था और उसकी जैसी संस्कृति में निहित होती है — जो बार-बार टूटने के बाद भी फिर से जीवन्त हो उठती है।

साल 1951 में जब सोमनाथ ने अपना वर्तमान रूप ग्रहण किया, तब वह केवल एक निर्माण का कार्य नहीं था, बल्कि एक नई उम्मीद का प्रतीक था। 11 मई 1951 को उस पुनर्निर्माण का जो महोत्सव हुआ — वह इतिहास के पन्नों में उस अहंकार के विरुद्ध उठे संघर्ष का प्रमाण है। और आज, जब हम 2026 में उस पहले आक्रमण के 1000 साल और पुनर्निर्माण के 75 वर्ष दोनों को याद कर रहे हैं, हमें यह समझना होगा कि यह कहानी केवल अतीत की नहीं — यह भविष्य की भी है।

महादेव की गाथा हमें सिखाती है कि सभ्यता को जब भी आघात मिला, उसने ज्ञान, धैर्य और द्रढ़ निश्चय से वही उत्तर दिया। दक्षिण के प्राचीन मंदिर हों या सोमनाथ जैसे तटीय तीर्थ — ये सब हमें हमारी संस्कृति की गहरी समझ देते हैं, और हमें बताते हैं कि असली पुनरुत्थान बाहरी शानो-शौकत से नहीं, बल्कि जनता की आस्था और प्रेरणा से होता है।

इसलिए आज मैं पूरे विश्वास और गर्व से कहता हूं — सोमनाथ की कहानी विध्वंस की नहीं, बल्कि अटूट आस्था, अस्मिता और स्वाभिमान की गाथा है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी राष्ट्रीय जीवनधारा धैर्य और पुनर्जागरण की है; हर बार जो टुकड़े पड़े, उनसे हमने फिर नए सिरे से उठना सीखा। यह महादेव का वच्‍न है — और यह हम सबका संकल्प भी।

आइए, हम सब मिलकर महादेव की इस अनन्त ज्योति को सँजोएँ रखें, अपनी संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करें, और आने वाली पीढ़ियों के लिए वही आत्मविश्वास और गौरव बनाए रखें — सोमनाथ की तरह अटूट, सोमनाथ की तरह चिरस्थायी। हरे महादेव।

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