रंगारेड्डी, याचरम : चुनावी नारे, जीत की खुशी और एक क्रूर ‘अंजाम’—तीनों का ऐसा अजीब-सा गठजोड़ कि इंसानियत को शर्मसार कर दे। राजधानी के पास याचरम गाँव में 19 जनवरी की शाम 100 आवारा कुत्तों को ज़हर भरे इंजेक्शन देकर मार डालने की खबर ने सिर्फ़ एक गांव नहीं, पूरे सिस्टम की समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए। अगले दिन पुलिस में मामला दर्ज हुआ और आरोप के घेरे में गाँव के सरपंच, ग्राम सभा समिति के सदस्य और ग्राम सचिव तक आ गए। FIR में पशु क्रूरता के तहत धाराएँ दर्ज हैं—कानून है, पर क्या कानून के पालन का जी होगा जब अदालत और गाँव के दरवाज़े के बीच इंसानियत गायब हो?
चुनावी नारे — और फिर भी ‘कुत्ता-क़ायदा’
ग्राम पंचायत चुनावों में ‘कुत्ता मुक्त गांव’ जैसे नारे हवा में उड़े — पर नारे और नीतियाँ अलग-अलग चीज़ें होती हैं। जीत के बाद कुछ पंचायतों ने ये नारा इतनी गंभीरता से लिया कि इसे व्यावहारिक नीति में बदलने के बजाय, गोली और जहर को नीति बना दिया। 6 जनवरी से लेकर अब तक (सूचना के मुताबिक़) तेलंगाना के अलग-अलग जिलों में लगभग 500 कुत्ते मारे जाने की खबरें आईं — संख्या जितनी बड़ी, उतना ही दर्दनाक सच। और सबसे ख़तरनाक बात यह कि मृत कुत्तों की लाशें भी नहीं मिलीं—जैसे कोई अपराध छुपाने की कोशिश।
क्रूरता के पीछे का तर्क — भय, असुविधा और सस्ती राजनीति
लोग कहते हैं: कुत्ते आक्रामक हो रहे हैं, काटते हैं, सड़क दुर्घटनाएँ बढ़ रही हैं, रेबीज़ का डर है। ये सब वास्तविक चिंताएँ हैं। पर उनका जवाब जहर होना किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं। सामाजिक समस्या का समाधान हिंसा नहीं, प्रणालीगत उपाय हैं—नसबंदी, टीकाकरण, शेल्टर-होम, और सार्वजनिक जागरूकता। NGOs और Stray Animal Foundation of India जैसे संगठन जब शोर मचाते हैं, तब पता चलता है कि प्रशासन में निद्रा क्यों टूटती—क्योंकि न केवल दुष्कर्म हुआ है, बल्कि उसके प्रमाण भी मिटाने की कोशिश हुई।
कानून और नैतिकता — दोनों पर आंच
पशु क्रूरता अधिनियम के अंतर्गत FIR दर्ज होना पहला कदम है, पर फ़ैसला सिर्फ़ कोर्ट नहीं, समाज को भी करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के हाल के निर्देश, जहाँ भोजन देने वालों और आवारा पशुओं के बीच संतुलन की बात कही गई — ये दिखाते हैं कि समाधान सख्ती ही नहीं, समझदारी और ज़िम्मेदारी भी मांगता है। अदालतें कह सकती हैं कि काटे जाने पर मुआवज़ा राज्य देगा, पर यह भी सच है कि काटने के पीछे कारण तलाशे जाने चाहिए — भुखमरी, बीमारी, और आवास के लिए संघर्ष।
‘कुत्ता मारना’ नहीं — नसबंदी और टीकाकरण चाहिए
पशु-हक़ फ़ायदेमंद व्यावहारिक समाधान बताते हैं: स्थायी नियंत्रण के लिए सर्गिकल या अन्य नसबंदी कार्यक्रम, मुफ्त और सुलभ रेबीज़-टीकाकरण, शेल्टर और पुनर्वास, और समुदाय-आधारित प्रशासनिक योजनाएँ। NGOs की आवाज़ पर कान न देकर, पुलिस-FIR का सहारा लेना समस्या का इलाज नहीं—यह सिर्फ़ विडंबना है कि बीमारी का संक्रमण रोकने के लिए इंजेक्शन ज़रूरी हैं, पर इंसानियत के इलाज में ज़हर दे दिया गया।
व्यंग्य में कटु सच्चाई
चुनावी घोषणापत्र का नया दाखिला: ‘कुत्ता-मुक्त गांव’ — यानी वोट मिले, इंसानियत खो दी। नारा इतना असरदार हुआ कि गाँव के कुछ नेता सोच बैठे कि कुत्तों को वोट से बाहर कर दिया जाए—मतलब वोट बैंक तो बन गया, पर नैतिकता बाहर खिसक गई। क्या यही वह ‘साफ़-सुथरा विकास’ है जिसका हमें वादा किया जाता है? कुत्तों की नसबंदी करवा कर उनकी आबादी नियंत्रित की जा सकती थी — पर ज़हर की सुई ने न केवल उनकी जान ली, बल्कि समाज की इंसानियत पर भी वार किया।
अंत में — एक अनिवार्य अपील
यह खबर गम्भीर है और कड़वी—मगर इसका निवारण आसान है: सरकार को चाहिए कि तुरंत प्रभाव से व्यवस्थित नसबंदी-टीकाकरण कैंप, शेल्टर-होम और समुदाय आधारित जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाएँ। साथ ही, निर्दयी कृत्यों के पीछे के चुनावी और सामाजिक प्रेरकों की जाँच कर कानून के तहत कड़ी कार्रवाई हो। कुत्ता भी इसी धरती का जीव है — उसे मिटाना समाधान नहीं। और हाँ, अगली बार जब कोई ‘कुत्ता-मुक्त’ नारा लगे, तो वोट देने से पहले ये सोच लें: क्या आप इंसानियत के साथ-साथ वोट भी दे रहे हैं, या केवल शोर और ज़हर का समर्थन?














