नोएडा, 23 जनवरी 2026: सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी से भरे गड्ढे में गिरकर मौत के बाद मामला सिर्फ एक दुखद हादसा नहीं रहा — बल्कि प्रशासनिक, नियोजनात्मक और पर्यावरणीय विसंगतियों का बड़ा उजागर होता मामला बन गया है। नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को अपने 7 प्रमुख बिंदुओं पर 60 से अधिक पन्नों का विस्तृत जवाब सौंप दिया है, साथ में डिजास्टर-मैनेजमेंट रिपोर्ट भी एसआईटी को उपलब्ध कराई गई है। एसआईटी इन दस्तावेजों का विश्लेषण कर 24 जनवरी को राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा—और माना जा रहा है कि रिपोर्ट के बाद प्रशासनिक स्तर पर तेज़ कार्रवाई और परिवर्तन संभव हैं।
प्राथमिक तथ्य और अब तक की कार्रवाई
घटना स्थल: सेक्टर-150, नोएडा — एक वाणिज्यिक प्लॉट/परियोजना क्षेत्र जहां वर्षो से पानी व अपशिष्ट जल जमा होने से तालाब बन गया था।
घटना: कोहरे में कार ड्राइवर ने कार दाहिनी ओर मोड़ी और वाहन पानी से भरे गड्ढे में जा गिरा; चालक युवराज मेहता की मौत हुई।
संबंधित संस्थाएँ: नोएडा प्राधिकरण, जिला प्रशासन (गौतम बुद्ध नगर), उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य पर्यावरण विभाग।
उच्चस्तरीय संज्ञान: एनजीटी ने समाचार रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया और मामले को पर्यावरण संरक्षण व नियोजन-लापरवाही के संदर्भ में देखा।
वर्तमान स्थिति: नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को विस्तृत जवाब दिया; एसआईटी ने प्रारम्भिक फैक्ट-फाइंडिंग CM योगी को मौखिक रूप से दी—सूत्रों के अनुसार अगले दो दिनों में दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सम्भावना जताई जा रही है।
नोएडा ऑथोरिटी के जवाब — 7 बिंदुओं का सार
नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को निम्न मुद्दों पर जानकारी दी है (संक्षेप में):
1.स्पोर्ट्स सिटी के 21 प्लॉटों का आवंटन — किसे कब और किस शर्त पर आवंटन हुआ।
2.ओसी (Occupation Certificate) व सीसी (Completion Certificate) — ये कब जारी हुए और उनकी शर्तें क्या थीं।
3.यूटिलिटी सुविधाओं की उपलब्धता — साइट पर सड़कों, सड़क सुरक्षा उपायों, पानी-सीवर जैसी सुविधाएँ कब उपलब्ध कराई गईं।
4.पजेशन (हस्तांतरण) की तिथि — प्लॉट/परियोजना का पजेशन किस तारीख को हुआ।
5.पहले हुए हादसों पर उठाया गया कदम — साइट पर किसी ट्रक के दुर्घटनाग्रस्त होने पर पहले क्या कार्रवाई की गई।
6.युवराज हादसे के बाद तत्काल उठाए गए कदम — घटना के तुरंत बाद जो कार्रवाई की गई उसका ब्यौरा।
7.डिजास्टर मैनेजमेंट रिपोर्ट — जलभराव/तालाब बन जाने और आपात प्रबंधन की स्थिति पर किए गए आकलन व सुझाए गए सुधार।
ये दस्तावेज़ एसआईटी के लिए निर्णायक होंगे कि किन-किन स्तरों पर नियोजन, निर्माण, निरीक्षण या रखरखाव में कमी रही — और किस तरह की संवैधानिक/प्रशासनिक जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
एनजीटी का फोकस: नियोजन बनाम जमीन पर वास्तविकता
एनजीटी की नोटिंग में कहा गया है कि वह रिपोर्ट-आधारित खबरों और स्थानीय लोगों की शिकायतों को गंभीरता से देख रहा है। खासकर यह तथ्य कि:
वह जगह मूल रूप से एक निजी मॉल परियोजना के लिए आवंटित थी पर सालों में बारिश का पानी और आस-पास की हाउसिंग सोसाइटी से निकले अपशिष्ट जल के जमा होने से वह तालाब में बदल गई।
2015 में तैयार उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग की वर्षा जल प्रबंधन योजना के बावजूद — कई सर्वे और निरीक्षणों के बाद भी — जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हुआ। एनजीटी ने इसे गंभीर नियोजन और अनुपालन की चूक माना है।
एनजीटी ने मामले के प्रतिवादियों के रूप में नोएडा प्राधिकरण, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव और गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी को नामित किया है और इन्हें 10 अप्रैल की अगली सुनवाई से कम से कम एक हफ्ता पहले हलफनामे के माध्यम से जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।
स्थानीय आक्रोश और प्रशासनिक देरी की कथित कीमत
स्थानीय लोग और परिजन घटना से बहुत आक्रोशित हैं — उनका कहना है कि यह मौत जिला प्रशासन, पुलिस और प्राधिकरण की तीनों स्तरों पर बड़ी विफलता है। आरोपों में मुख्य रूप से शामिल हैं:
लगातार जमा हो रहे पानी/अपशिष्ट जल पर समय पर सुधारात्मक कदम न उठाना;
साइट की सुरक्षा, चेतावनी संकेत, रुकावट या बैरियर न होना;
ओसी/सीसी और पजेशन की प्रक्रियाओं में लापरवाही या शर्तों का पालन न होना।
एसआईटी की रिपोर्ट यदि इन बातों पर स्पष्ट तौर पर जिम्मेदारी तय करती है, तो सूत्रों का कहना है कि अगले कुछ दिनों में दोषी अधिकारियों पर प्रशासनिक कार्रवाई तेज़ हो सकती है।
क्या बदलाव संभव हैं? — अगले चरण
24 जनवरी को एसआईटी द्वारा राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद, प्रशासनिक और पॉलिसी-स्तर पर त्वरित कदमों की संभावना जताई जा रही है—जिसमें कड़ी जवाबदेही, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई, और प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल सुधारात्मक कार्य शामिल हो सकते हैं।
एनजीटी की सुनवाई (अप्रैल) और संबंधित विभागों के हलफनामों के बाद दीर्घकालिक नियोजन-सुधार, वर्षा जल प्रबंधन की पुनरावलोकन, तथा साइट-स्तर की रिस्क-रिमेडिएशन के लिए निर्देश भी जारी हो सकते हैं।
एक मानवीय जीवन के पीछे छिपी गम्भीर नीतिगत चूक
युवराज मेहता की मौत केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं; यह एक चेतावनी है कि शहरी नियोजन, जल-प्रबंधन और परियोजना-हैंडओवर के बीच अगर पारदर्शिता, सख्ती और जमीन पर क्रियान्वयन नहीं होगा तो उसकी कीमत जीवन देकर चुकानी पड़ सकती है। एसआईटी व एनजीटी की जांच-कार्यवाही इस मामले में निर्णायक मोड़ है — और जनता की निगाह अब उन कार्रवाईयों पर टिकी है जो रिपोर्ट के निष्कर्षों के बाद होंगी।














