सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा विधेयकों पर निर्णय लेने की समयसीमा तय करने को लेकर दायर प्रेसीडेंशियल रेफ़रेंस पर अपना ऐतिहासिक फैसला गुरुवार (20 नवंबर) को सुनाएगी। इस पीठ की अध्यक्षता कर रहे प्रधान न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई 23 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, इसलिए यह फैसला उनके रिटायर होने से पहले ही सुनाया जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सुप्रीम कोर्ट को एक प्रेसीडेंशियल रेफ़रेंस भेजते हुए 14 अहम कानूनी प्रश्नों पर राय मांगी है। मुख्य सवाल यह है:
जब संविधान में राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों पर निर्णय देने हेतु कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट इस पर कोई समयसीमा तय कर सकता है?
यह मुद्दा तब प्रमुखता में आया जब सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की एक पीठ ने अप्रैल में तमिलनाडु से जुड़े एक मामले में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए विधेयकों पर कार्रवाई करने की एक निर्धारित समयसीमा तय कर दी थी।
कोर्ट ने इतना ही नहीं, बल्कि राज्यपाल द्वारा लंबित रखे गए तमिलनाडु के 10 विधेयकों को स्वयं मंज़ूर घोषित भी कर दिया था। यह पहली बार था जब अदालत के आदेश से सीधे किसी राज्य के विधेयकों को मंजूरी मिली।
यही फैसला आगे चलकर संवैधानिक बहस का कारण बना और राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट राय मांगते हुए यह रेफ़रेंस भेजा।
सुनवाई और निर्णय
मुख्य न्यायाधीश गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की संविधान पीठ ने लगातार 10 दिनों तक चली सुनवाई के बाद 11 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अब जब सीजेआई 23 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, नियमों के अनुसार यह निर्णय उनके रिटायर होने से पहले देना आवश्यक है। अन्यथा किसी भी न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने पर पूरी सुनवाई एक नई पीठ को दोबारा से करनी पड़ती।
अनुच्छेद 200 और 201 पर केंद्रित बहस
राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए अधिकांश प्रश्न संविधान के अनुच्छेद 200 और 201 से जुड़े हैं, जिनमें राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास राज्य विधानसभा से पारित विधेयकों पर निर्णय लेने की शक्तियों का प्रावधान है।
हालाँकि प्रेसीडेंशियल रेफ़रेंस में तमिलनाडु के फैसले को सीधे चुनौती नहीं दी गई है, लेकिन पूछे गए प्रश्न उसी निर्णय के इर्द-गिर्द घूमते हैं और उस पर कानूनी स्पष्टता चाहते हैं।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला देशभर में
राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसी संवैधानिक पदों की शक्तियों,
राज्य सरकारों के साथ उनके संबंधों,
और विधायी प्रक्रिया
को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करेगा।
इसलिए माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाले समय में भारत के संवैधानिक ढांचे के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा।














