Friday, January 16, 2026
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अरावली मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, 20 नवंबर के अपने ही आदेश पर लगाई रोक

अरावली पहाड़ियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला लेते हुए 20 नवंबर को दिए गए अपने ही आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को होगी।

यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की, जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल हैं।

क्या था 20 नवंबर का फैसला?

20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की एक समान परिभाषा को स्वीकार किया था। अदालत ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैले अरावली क्षेत्रों में नए खनन पट्टों के आवंटन पर रोक लगा दी थी। यह रोक तब तक लागू रहने की बात कही गई थी, जब तक विशेषज्ञों की रिपोर्ट सामने नहीं आ जाती।

कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से गठित समिति की सिफारिशों को भी स्वीकार किया था।

अरावली की परिभाषा क्या तय की गई थी?

समिति की सिफारिशों के अनुसार,

अरावली पहाड़ी: चिह्नित अरावली जिलों में स्थित कोई भी ऐसी भू-आकृति जिसकी ऊंचाई स्थानीय निचले बिंदु से 100 मीटर या उससे अधिक हो।

अरावली पर्वतमाला: ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों का समूह, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों।

आज की सुनवाई में कोर्ट ने क्या कहा?

सोमवार की सुनवाई में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि
“हम इसे आवश्यक मानते हैं कि समिति की सिफारिशों और इस न्यायालय के निर्देशों को फिलहाल स्थगित रखा जाए। यह स्थगन तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक एक नई समिति का गठन नहीं हो जाता।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 21 जनवरी की सुनवाई के लिए सभी पक्षों को नोटिस जारी किया जाता है।

हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी बनेगी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह रिपोर्ट का व्यापक मूल्यांकन करने और सभी सवालों की गहराई से जांच के लिए एक हाई-पावर्ड एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का प्रस्ताव कर रहा है। यह समिति उन इलाकों की विस्तृत पहचान करेगी जिन्हें अरावली क्षेत्र से बाहर रखने का प्रस्ताव है और यह भी आकलन करेगी कि ऐसे बाहर किए जाने से अरावली पर्वतमाला को पर्यावरणीय नुकसान या खतरा तो नहीं होगा।

स्वतः संज्ञान में लिया था मामला

अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर बढ़ते विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। अवकाशकालीन पीठ ने इस पर सुनवाई की थी, जिसमें जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल थे।

कांग्रेस का सरकार पर हमला

इस मुद्दे पर कांग्रेस लगातार केंद्र और राज्य सरकारों पर हमलावर रही है। कांग्रेस ने राजस्थान की बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया है कि राज्य में भ्रष्टाचार चरम पर है और खनन को आसान बनाने के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा बदलने की कोशिश की जा रही है।

कांग्रेस का कहना है कि अरावली पर्वतमाला को खनन कंपनियों के हवाले करना राज्य के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा। पार्टी ने इसे राजस्थान के इतिहास के सबसे बड़े घोटालों में से एक करार दिया है।

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