देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में लंबित मुकदमों की संख्या लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है। वर्ष 2025 के अंत तक यह आंकड़ा 92,251 तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। मौजूदा रफ्तार को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2026 में लंबित मामलों की संख्या एक लाख का आंकड़ा पार कर सकती है।
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2025 तक सुप्रीम कोर्ट में 88,417 मामले लंबित थे, जिनमें 69,553 दीवानी और 18,864 आपराधिक मामले शामिल थे। 31 दिसंबर तक यह संख्या 92 हजार के पार पहुंच गई, जो यह दर्शाती है कि नए मामलों के दाखिल होने की दर, निपटारे की दर से कहीं अधिक है।
बढ़ती संख्या, बढ़ती चुनौती
पिछले एक दशक के आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हैं।
2014 में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले: लगभग 63,000
2023 के अंत तक: करीब 80,000
2025 के अंत तक: 92,251
चुनौती यह है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के बावजूद लंबित मामलों का बोझ कम नहीं हो पा रहा है। अदालत में आने वाले नए मामलों की संख्या, निपटाए जा रहे मामलों से अधिक है, जिसके चलते पेंडेंसी लगातार बढ़ रही है।
2025 में 75 हजार से अधिक मामलों का निपटारा
इन आंकड़ों के बावजूद यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा किया। कार्यभार और दक्षता की तुलना करें तो भारतीय सुप्रीम कोर्ट का प्रदर्शन वैश्विक स्तर पर अभूतपूर्व माना जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर:
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हर साल हजारों याचिकाएं दाखिल होती हैं, लेकिन बहस के लिए केवल 70–80 मामलों को ही चुना जाता है।
यूके सुप्रीम कोर्ट के सामने 2024 में 200 से कुछ अधिक मामले आए, जिनमें से लगभग 50 मामलों में ही अंतिम फैसला सुनाया गया।
इसके विपरीत, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने एक ही वर्ष में करीब 1,400 महत्वपूर्ण फैसले सुनाए और हजारों अंतरिम व अंतिम आदेश पारित किए।
लंबित मुकदमों का समाधान: मध्यस्थता पर जोर
मुकदमों की बढ़ती संख्या को लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने हाल ही में मध्यस्थता (Mediation) को प्रभावी समाधान बताया। उन्होंने कहा कि जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, सभी स्तरों पर बड़ी संख्या में प्रशिक्षित मध्यस्थों की जरूरत है।
CJI के अनुसार,
“मध्यस्थता कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था के परिपक्व और उच्चतम विकास का संकेत है। यह लंबित मामलों को कम करने का सबसे कारगर तरीका हो सकता है।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का समर्थन
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी मध्यस्थता को बढ़ावा देने की वकालत की है। उनका कहना है कि मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुए नए, व्यावहारिक और वैकल्पिक समाधान अपनाने की जरूरत है।
उनके अनुसार, मध्यस्थता पक्षकारों को आपसी सहमति से समाधान खोजने का अवसर देती है, जिससे लंबी और खर्चीली अदालती लड़ाई से बचा जा सकता है। देश के कई वरिष्ठ कानूनविद भी इस विचार का समर्थन करते हैं, ताकि न्यायपालिका पर बढ़ता बोझ कम किया जा सके।
10 लाख की आबादी पर सिर्फ 21 जज
भारतीय न्यायपालिका की एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती जजों की कमी भी है।
भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर सिर्फ 21 न्यायाधीश हैं
जबकि अमेरिका में इतनी ही आबादी पर लगभग 150 न्यायाधीश कार्यरत हैं
विधि आयोग की 1987 की रिपोर्ट में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर 50 जजों की सिफारिश की गई थी, जो आज भी पूरी नहीं हो सकी है।
इसके बावजूद, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने जितने मामलों का निपटारा एक ही वर्ष में किया है, वैसी कार्यक्षमता की कल्पना अमेरिका और ब्रिटेन की न्यायपालिकाओं के लिए भी आसान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में बढ़ती पेंडेंसी एक गंभीर चेतावनी है, लेकिन साथ ही यह भारतीय न्यायपालिका की असाधारण कार्यक्षमता को भी दर्शाती है। दीर्घकालिक समाधान के लिए जजों की संख्या बढ़ाना, मध्यस्थता को संस्थागत बनाना और प्रक्रियागत सुधार अब समय की मांग बन चुके हैं।














