क्या आज की भाजपा को फिर से ऐसे नेताओं की ज़रूरत है जिनकी पहचान पद से नहीं, प्रतिबद्धता से हो?
राजनीति जब छवि, शोर और तात्कालिक लाभ की दौड़ बन जाती है, तब ऐसे नाम दुर्लभ और मूल्यवान हो जाते हैं जो बिना मंच, बिना पद और बिना बड़ी आवाज़ के भी प्रासंगिक बने रहते हैं। संजय जोशी उन्हीं में से एक हैं—वे सत्ता के गलियारों से दूर रहने के बावजूद भाजपा के वैचारिक इतिहास और संगठनात्मक स्मृति में गहरे दर्ज हैं।
संघ से संगठन तक: एक प्रक्रिया का आदमी
संजय जोशी का राजनीतिक निर्माण किसी चुनावी रणनीति से नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी संगठन-कठोर अनुशासन और विनम्र सेवा की पारंपरिक पद्धति से हुआ। उनके लिए राजनीति सत्ता नहीं, सेवा थी; पद नहीं, कर्तव्य। गुजरात की ज़मीन पर बूथ-दर-बूथ पार्टी खड़ी करने में उनकी मेहनत और भूमिका उस दौर के संगठनात्मक इतिहास की रीढ़ हैं। जब संसाधन कम और चुनौतियाँ अधिक थीं, तब ऐसे कार्यकर्ता ही पार्टी के असली वाहक बने।
पद से नहीं, प्रक्रिया से पहचान
आम तौर पर नेता पद से पहचाने जाते हैं; संजय जोशी की पहचान पद नहीं बल्कि प्रक्रिया और निष्ठा से बनी है। वे कभी मंत्री नहीं रहे, न ही मीडिया के केंद्र में आए — पर संगठन के अंदर उनकी स्वीकार्यता और भरोसा सदैव बना रहा। विवाद आए, परिस्थितियाँ बदलीं; उन्होंने न बगावत की, न सार्वजनिक कटुता। यह मौन आज की राजनीति में असामान्य और इसलिए मूल्यवान भी है।
विस्तार बनाम वैचारिक संतुलन
आज भाजपा विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक है—सत्ता, संगठन और संचार तीनों पर मजबूत। पर इस विशालता के साथ एक खामोश सवाल भी है: क्या अब पार्टी अपने वैचारिक मूल से उतनी ही जुड़ी है जितनी अपने चुनावी गणित से?
संजय जोशी जैसे लोग उस दौर का प्रतिनिधित्व करते हैं जब भाजपा आंदोलन था, मैनेजमेंट नहीं; जब कार्यकर्ता सिर्फ जीत का साधन नहीं, विचार का वाहक बनता था।
क्यों ऐसे नेताओं को मौका मिलना चाहिए
यह भावनात्मक नहीं, रणनीतिक ज़रूरत है। वर्तमान राजनीति में—
निर्णय तेज़ हैं,
सोशल मीडिया प्रभाव अनुभव पर भारी पड़ता है,
दृश्यता अक्सर निष्ठा से ऊपर आ जाती है।
ऐसे माहौल में संजय जोशी जैसे नेता स्थायित्व, विश्वसनीयता और वैचारिक संतुलन का आधार बन सकते हैं। उन्हें संगठनीय भूमिका देना केवल सम्मान नहीं, बल्कि संगठन को याद दिलाना है कि भाजपा की ताकत केवल सत्ता नहीं—संस्कार और विचारधारा भी हैं।
सत्ता से दूरी, संगठन से अलगाव नहीं
जोशी की सबसे बड़ी पूँजी यह रही कि उन्होंने सत्ता से दूरी बनाए रखी पर संगठन के साथ कभी दूरी नहीं होने दी। न सार्वजनिक कटुता, न वैचारिक विचलन—यह संयम आज की राजनीति में दुर्लभ है। शायद इसलिए वे बिना किसी प्रचार के भी चर्चा में बने रहते हैं।
नतीजा : निष्ठा ही दिशा तय करती है
हर राजनीतिक युग को दो तरह के लोगों की ज़रूरत होती है—एक जो चुनाव जीतें, दूसरे जो पार्टी को याद दिलाएँ कि वह क्यों बनी थी। संजय जोशी दूसरी श्रेणी के नेता हैं। अगर भाजपा स्वयं को केवल सत्ता की पार्टी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक आंदोलन बनाए रखना चाहती है, तो ऐसे लोगों को किनारे पर रखकर नहीं बल्कि संवाद और निर्णायक प्रक्रियाओं में शामिल करके सम्मानित करना होगा।
क्योंकि—चुनाव जीतना राजनीति है, पर निष्ठा इतिहास बनाती है।














