सन 2025 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को लेकर जिज्ञासा और अटकलों का दौर लगातार जारी है। यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि पार्टी की कमान किसे सौंपी जाएगी। कयास क्यों न हों? जगत प्रकाश नड्डा 2019 से अब तक लगातार अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभालते हुए कई स्थापित परंपराओं को पीछे छोड़ चुके हैं। उनके कार्यकाल और उससे जुड़े विमर्श अपने-अपने दृष्टिकोण से देखे जा सकते हैं, परंतु मुख्य प्रश्न यही है—अगला अध्यक्ष कौन?
क्या नया अध्यक्ष किसी विशेष खेमे का होगा?
क्या भाजपा में सचमुच खेमेबाज़ी की स्थिति बन रही है?
क्या करोड़ों कार्यकर्ताओं वाला देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल अपने ही भीतर से अध्यक्ष चुनने में कठिनाई महसूस कर रहा है?
क्या पार्टी की लोकतांत्रिक प्रक्रिया आज भी उतनी ही निर्बाध है जैसी वह वर्षों से बताई जाती रही है, या खेमों के कारण दल में दलदल जैसा वातावरण बन रहा है?
इन तमाम सवालों के उत्तर तभी मिलेंगे जब पार्टी अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की घोषणा करेगी। सिद्धांततः यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक ही होनी चाहिए, लेकिन व्यावहारिक नियुक्ति को लेकर संशय तो बना ही हुआ है।
अब बात दावेदारों की करें तो धर्मेंद्र प्रधान, सुधांशु त्रिवेदी, भूपेंद्र यादव, संजय जोशी, केशव प्रसाद मौर्य, अन्नामलाई, महिला आरक्षण की दृष्टि से कोई महिला, या फिर शिवराज सिंह चौहान, सुनील बंसल और सुनील देवधर जैसे नाम लगातार चर्चा में हैं। इतनी बड़ी सूची के बीच महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संघ और भाजपा के बीच समन्वय किस दिशा में संकेत करता है।
सरकार चलाना और संगठन चलाना—दोनों अलग-अलग प्रकृतियाँ हैं, और दोनों के बीच सेतु का कार्य राष्ट्रीय अध्यक्ष ही करता है। ऐसे में यह दायित्व किसी ऐसे व्यक्ति को मिलना चाहिए जिसके पास संगठनात्मक अनुभव और समन्वय की क्षमता दोनों हों। भाजपा के इतिहास में संगठन मंत्री जैसे पद इस बात के उदाहरण हैं कि पार्टी में समन्वय का कार्य प्रायः पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं द्वारा ही किया जाता है, जो संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में संजय जोशी एक स्वाभाविक और प्रासंगिक नाम के रूप में उभरते हैं। वे राष्ट्रीय संगठन मंत्री रह चुके हैं, और लंबे समय तक सक्रिय पदों से दूर रहने के बावजूद एक साधारण कार्यकर्ता की तरह संगठन के प्रति समर्पित रहे हैं। यह भी चर्चित है कि उनके पास पहुँचा कोई भी कार्यकर्ता अपनी समस्या का समाधान लेकर ही लौटता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के साथ गुजरात में संगठन को मजबूत करने का उनका अनुभव, दोनों के कार्य-गत्यात्मक तालमेल और ऊर्जा स्तर की समानता—ये सब उन्हें एक सुयोग्य दावेदार बनाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य नामों की क्षमता पर कोई संदेह है, परंतु वरिष्ठता, संगठनात्मक अनुभव और कार्य-कुशलता के आधार पर संजय जोशी स्वाभाविक रूप से प्रमुख दावेदार प्रतीत होते हैं—जिस तथ्य को अन्य दावेदार भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
फिर भी यह सभी केवल कयास हैं। अंतिम निर्णय भाजपा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अधीन होगा—या शायद वही होगा, जिसे कवि ने कहा है: “होइहि सोइ जो राम रचि राखा।”
देखना यह है कि जातीय समीकरण, हिंदुत्व, संगठन, दलगत परिस्थितियाँ और लोकतांत्रिक प्रक्रिया—इन सबके मध्य संतुलन साधते हुए अंततः ऊँट किस करवट बैठता है।
नोट: ये लेखक “एडवोकेट दीपक शंखधर” के निजी विचार हैं !














