नोएडा। सेक्टर-150 में युवराज की दर्दनाक मौत ने शायद प्राधिकरण की नींद तोड़ा — कम से कम सार्वजनिक रूप से तो ऐसा दिखा। CEO कृष्ण करुणेश ने समीक्षा बैठक कर तुरन्त कई निर्देश जारी किए: शहर के 65 वल्नरेबल प्वाइंट्स को एक सप्ताह में दुरुस्त करने, ब्लैकटॉप सड़क मरम्मत मार्च के पहले सप्ताह से शुरू करने, गाँवों में नालियों में जा रहे गोबर को रोकने के लिए 10 दिन में EOI आमंत्रित करने, कम्युनिटी टॉयलेट्स के संचालन-रखरखाव के लिए टेंडर प्रक्रिया जल्द चलाने, 20 नए सैनेटरी इंस्पेक्टरों की नियुक्ति, अवैध रेहड़ी-पटरी हटाने व वेंडिंग जोन व्यवस्थित करने तथा कार्य में लापरवाही पर संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की चेतावनी — जैसे ठोस दिखने वाले आदेश दिए गए हैं।
इसी बीच प्रशासन ने बड़े स्तर पर वर्क-डिस्ट्रिब्यूशन भी कर दी। RTI, मीडिया, लैंड, बिल्डर-हाउसिंग, ट्रैफिक, पब्लिक शिकायत और प्रवर्तन से जुड़ी जिम्मेदारियाँ फेर-बदल कर के लागू कर दी गईं — और दलील दी गई कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी, काम में तेजी आएगी और जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
लेकिन यही वह नजारा है जहाँ कागज़ात भिड़ जाते हैं और जमीन चुप रहती है। सवाल सीधे और तीखे हैं — और इन्हें दबी जुबान से नहीं, साफ-साफ उठाना जरूरी है:
क्या सरकारी आदेश सिस्टम बदलेंगे — या सिर्फ चेहरों की अदला-बदली?
प्रशासनिक रोटेशन और निर्देश जरूरी हैं, पर जब तक जवाबदेही, समय-सीमित ऑडिट, और पब्लिक रिपोर्टिंग का तंत्र नहीं बनेगा, तब तक ये सिर्फ दिखावे की हरकतें रह जाएँगी।
सेक्टर-150 की जान पर जो सवाल खड़े हुए, उन पर खुले तौर पर जांच, दोषियों की पब्लिक लिस्टिंग और सख्त कार्रवाई की माँग है — निगोशिएबल PR-स्टेटमेंट नहीं।
16% कमीशन: अफ़वा या संस्थागत सच?
यहाँ सबसे ज्वलंत आशंका यही है — जब अधिकारी और सिस्टम के भीतर के लोग कमीशनखोरी को खुलेआम “सिस्टम का हिस्सा” बताने लगें, तो यह कोई व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, संस्थागत रोग बन चुका है। अगर सचमुच कोई समूह या अभ्यास 16% कमीशन जैसा चलन बना चुका है, तो
उसे छुपाने के लिए विभाग बदलना, नियुक्तियाँ घुमाना, या PR-ब्रीफ देना कोई समाधान नहीं।
असल समाधान: फॉरेंसिक लेखा-जाँच, बेनामी संपत्ति की पड़ताल, शिकायतों के निष्पक्ष ट्रैकिंग नंबर और तीसरे पक्ष की निगरानी — वरना कमीशन फिर किसी नए फार्मूले में लौट आएगा।
फर्ज़ी सुधार बनाम वास्तविक सज़ा — फर्क साफ होना चाहिए
जो कदम CEO ने बुलंद किए — वल्नरेबल प्वाइंट्स, ब्लैकटॉप, टॉयलेट टेंडर, नए इंस्पेक्टर — वे स्वागतयोग्य हैं। पर इन्हें व्यवहार में तब तक मानेगा कौन जब तक:
1.हर निर्देश के साथ सार्वजनिक टाइमलाइन और माइलेजस्टोन रिपोर्ट न दी जाए।
2.सेक्टर-150 मामले जैसी बड़ी घटनाओं की प्रार्थमिक रिपोर्ट और जांच का सार्वजनिक संस्करण उपलब्ध न कराया जाए।
3.कमिशन से जुड़ी शिकायतों के लिए वक्तबद्ध, पारदर्शी इन्वेस्टिगेशन टीम (तीसरे पक्ष या सतर्क सदन का प्रतिनिधि) न नियुक्त किया जाए।
4.दोष सिद्ध होने पर निलंबन, रिकवरी और करवाई का स्पष्ट रोडमैप न रखा जाए।
नागरिकों के लिए क्या माँग करनी चाहिए
प्राधिकरण की वेबसाइट पर रियल-टाइम टास्क ट्रैकर: कौन-सी कार्रवाई कब पूरी हुई, किसने साइन किया।
हर शिकायत का ट्रैक-नंबर और समाप्ति रिपोर्ट पब्लिक।
कमीशन/रोज़गार/नियुक्ति से जुड़ी शिकायतों के लिए विशेष जाँच मोड्यूल और व्हिसलब्लोअर सुरक्षा।
सेक्टर-150 जैसी घटनाओं की जॉइंट इनक्वायरी में नागरिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति।
कुर्सियाँ बदलीं, निर्देश आए — पर शासन का असली इम्तिहान यह नहीं कि किसने किस दफ्तर का विभाग संभाला, बल्कि यह है कि क्या अब से प्रमाणिक, तेज और सार्वजनिक जवाबदेही की संस्कृति आएगी। वरना यह फेहरिस्त भी वही पुरानी कहानी दोहराएगी: चेहरे बदलेंगे, फाइलें घूमेंगी, और जनता के सवाल हाथ में रहेग — जवाब नहीं। यदि 16% का सिस्टम जड़ से नहीं उखाड़ा गया, तो ये सारे “तुरंत लागू” के नारे सिर्फ कागज़ पर चमकते बैनर रहेंगे — और नोएडा की सड़कों पर, पेट्रोलियम-दाम की तरह, जनता की भरोसे की कीमत बढ़ती रहेगी।














