फरीदाबाद के सेक्टर-12 टाउन पार्क में अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में बनी लाइब्रेरी का उद्घाटन नहीं, बल्कि रिबन-कटिंग का महाकुंभ संपन्न हुआ। एक ही दिन, दो उद्घाटन — ऐसा लगा जैसे नगर निगम ने “बाय-वन-गेट-वन” ऑफर में रिबन भी दे दिया हो।
सबसे पहले राज्यसभा सांसद सुरेन्द्र नागर के साथ मंत्री विपुल गोयल और राजेश नागर ने नेरिबन काट कर लाइब्रेरी खोल दी। शहर के लोग समझे कि अब किताबें पढ़ने का वक्त आ गया — पर बस ढाई घंटे बाद ही केन्द्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर अपने विधायकों के साथ पहुंचे और कहा — “अरे भाई, ये तो मेरी कटाई थी।” और फिर क्या, वही रिबन फिर से लगा, फिर से काटा, और फिर से फोटो। ऐसा लगा मानो लाइब्रेरी नहीं, बल्कि रिबन-रीसाइक्लिंग प्लांट का सेंटर-इनॉग्रेशन चल रहा हो।
प्रोटोकॉल जिसने बनाया, उसीने खो दिया: उद्घाटन बोर्ड पर कृष्णपाल गुर्जर को मुख्य अतिथि लिखा था, पर VIP लॉजिक चला — जो पहले आये, वही पहले कटे। सच पूछिए तो रिबन ने भी शायद अपनी अस्तित्वहीन पहचान बदल ली — “पहले-कौन-काटे-रिबन” बनकर रह गया। और बीच में विपुल जी ने सभ्यतापूर्वक (या निश्चय ही स्पोर्टी अंदाज़ में) बोर्ड से कपड़ा हटाया और फोटोशूट करा लिया — क्लासिक क्लाइमेक्स: “जो था, वो हो गया।”
राजनीति की नई पॉलिसी: प्रतिद्वंद्वी मंत्री अगर पहले रिबन काट लें तो दूसरा मंत्री दो घंटे बाद रिबन काट कर अपना हिस्सा दर्ज करा ले — इसे कहते हैं डबल-इंक्लूज़न पॉलिसी। पार्टी संगठन पर भी सवाल उठ रहे हैं — पर चिंता किसे है? आखिरकार, रिबन-कटने से पार्टी की संगठनात्मक समझ पर तो सवाल उठता है, पर रिबन-कटने वालों के फोटो-कलैक्शन पर छाप नहीं पड़ती।
भारत रत्न, श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृति में निर्मित पुस्तकालय भवन का आज उद्घाटन करना मेरे लिए अत्यंत गौरव और भावनात्मक क्षण है। pic.twitter.com/cOofqLxZ7r
— Krishan Pal Gurjar (@KPGBJP) December 28, 2025
लाइब्रेरी के लोकार्पण पर जो बोर्ड लगा था, उसमें कई नाम थे — पर असली नाम तो मीडिया में छपने वाली तस्वीरों के ऊपर रहेगा: किसने किसके साथ खड़े होकर रिबन काटा, किसने किसके फोटो से कपड़ा हटवाया। किताबों की शान बचाने वाले शायद सोच रहे होंगे — क्या अब शांति से किताबें पढ़ना भी किसी राजनीतिक रेस का हिस्सा बन जाएगा? कल कोई कह सकता है — “आज मैं लाइब्रेरी आ रहा हूँ, पर पहले किसी मंत्री का रिबन-कटिंग सेमिनार देखना होगा।”
कृष्णपाल गुर्जर ने कहा कि विभाग ने उन्हें सूचना दी थी और वे अपने कर-कमलों से उद्घाटन कर रहे थे — पर लगता है विभाग ने सूचना के साथ साथ थोड़ी-सी ड्रामा भी भेज दिया। विभागों का नया टैगलाइन: “सूचना भी दें, सरप्राइज भी।”
निष्कर्ष? फरीदाबाद की इस लाइब्रेरी का असली इतिहास किताबों में नहीं, रिबन-एलबम में दर्ज होगा। आने वाले वर्षों में जब बच्चे पुस्तकालय की शांति के बारे में पढ़ेंगे, तो शायद प्रोजेक्ट के नाम के आगे यह नोट मिलेगा: “इस पुस्तकालय का उद्घाटन — दो बार किया गया; प्रोटोकॉल ने हार मानी।”
और एक सलाह — अगर अगली बार कोई नया कार्यक्षेत्र खोला जाएगा, तो आयोजक जरूर एक अतिरिक्त रिबन, एक ‘ऑफिशियल-रीर-इन्कार’ और एक ‘फोटो-राइट्स’ पॉलिसी साथ रखें। ताकि राजनीति भी उत्सव की तरह दिखे और शहर वाले कम से कम हँसकर घर जा सकें — या फिर किसी को भी दो बार रिबन काटने का शौक रहे, लाइब्रेरी का खुले रहना कम से कम सुनिश्चित कर दें।














