अरे वाह — कानून ने नया फैशन निकाल लिया है: अब जेल की सलाखें नहीं, “परोल-पास” बांटे जाते हैं, और कुछ विशेष लोग उन्हें बार-बार रिइश्यू करवा लेते हैं। जन्मदिन? सत्संग? वीडियो-सॉन्ग लॉन्च? बस एक क्लिक और जनता का अपराध-बोध हो गया आउट ऑफ़ सेल।
कहते हैं कानून सबके लिए बराबर है — पर लगता है बराबरी का फॉर्मूला दो तरह का बन गया: जनरल कट और वीआईपी कट। जनरल कट वाले को 91 दिन का “मानक” मिलता है, वीआईपी कट वाले को 111, 200, या मनमर्जी के अनुसार—जैसे किसी ने कूपन को ज्यादा बार रिडीम कर लिया हो। क्या पता, शायद जेल के रजिस्ट्रेशन में एक नया कॉलम जोड़ दिया गया होगा: “Special: Handle with care (and PR).”
कभी नियमों की चाबी टेबल पर रख दीजिए — एक तरफ़ ‘कठोर सजा’, दूसरी तरफ़ ‘छुट्टी का कैलेंडर’। और बीच में बैठे हैं अधिकारी, जिन्होंने नियमों को फुटबॉल बना दिया है: जिस पर चाहें फ्री-किक मारिए, गोलपोस्ट को “थोड़ा-सा” सरकाइए। कोर्ट की चेतावनियाँ? अरे वो तो सिर्फ़ हवा में बाउंस करने वाली गेंद हैं — ज़मीन पर पड़ते-पड़ते वापस उठ जाती हैं।
ऑफिशियल भाषा में कहते हैं — “नियमों के तहत।” अनऑफिशियली इसका अर्थ है: “अगर आपके पास अनुयायी हैं, क्लाइंट हैं, वोट बैंक है, या अच्छा मीडिया-मैनेजमेंट है, तो परोल की राह खुद-ब-खुद सफ़ेद-कालीन बन जाती है।” और अगर आप आम बंदी हैं? बेल, फरलो, पैरोल — हर चीज़ पे ‘रुक-जाच’ का आनन्द लीजिए।
सबसे दिलचस्प पार्ट यह है कि परोल पर बाहर आकर जो शख्स कार्यक्रम करता है, वही तो पैरोल की शर्तों के खिलाफ सार्वजनिक प्रदर्शन कर देता है। नियम कहता है: “सरलता बरतना।” व्यवहार में यह निकला: “स्टेज, शूट और सक्सेस।“ कानून कहता है “समाज में अशांति न फैलाई जाए।” पर पब्लिक रैली और वीडियो सॉन्ग का नया म्यूज़िक वीडियो क्या कभी शांतिदूत बनता है?
और फिर आता है राजनीति-कनेक्शन का गोल्डन-रूल: चुनाव का मौसम आया — पैरोल का मौसम आ गया। तारीखें देखकर लगता है कि कैलेंडर पर छुट्टियाँ और चुनावी रणनीति हाथ से हाथ मिलाकर चलती हैं। संयोग? हां, बिल्कुल — उसी तरह जैसे मीठा-मीठा पीकर कहा जाए कि यह तो बस पानी था।
सबक? अगर कानून सचमुच बराबरी चाहता है, तो उसे पहले दो बातें करनी होंगी: पारदर्शिता और जवाबदेही। वरना हर बार जब कोई “कृपा-पैकेज” बंटेगा, जनता का विश्वास और पीड़ितों का शोषण दोनों बढ़ते रहेंगे। और हमें बताने की ज़रूरत नहीं — पीड़ितों की पीड़ा, उनकी आवाज़, कोई कूपन-डिस्काउंट से कम नहीं होती।
तो लो जनाब, सिस्टम ने हमें नया व्याकरण सिखाया: ‘कानून’ और ‘कृपा’ अब साथ-साथ चलते हैं — एक ही वाक्य में, पर अलग-अलग मतलबी भाषाओं में। हम बस उम्मीद कर सकते हैं कि अगली बार जब कानून बोलेगा “सबके लिए बराबर”, तो वह शब्द सिर्फ़ प्रचार की लाइना न बनकर सच में बराबरी कर दे। वरना यह ‘मौज-कैलेंडर’ फिर से किसी और नाम पर छपवाया जाएगा — और हम उसी पुराने चक्कर में रहकर चौंकते रहेंगे।














