लोकसभा में चुनाव सुधार पर चर्चा के दौरान तृणमूल कांग्रेस सांसद कल्याण बनर्जी ने भावुक और आक्रामक अंदाज़ में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि “यह अनुरोध मेरे लिए नहीं है, मेरा जीवन तो लगभग खत्म होने को है, लेकिन यह देश के भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी है।”
चर्चा के दौरान जब भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने उन्हें टोका, तो बनर्जी ने पलटवार करते हुए कहा, “बंगाल हम ले लेंगे, आप चिंता मत कीजिए। ऐसा फेंकेंगे कि बिहार छोड़कर यूपी में जा गिरेंगे।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी एक सरकार के खिलाफ नहीं बोल रहे, बल्कि देश की समग्र स्थिति पर ध्यान दिलाना चाहते हैं। उनके मुताबिक हालात ऐसे हो गए हैं कि अब लोगों का अंतिम भरोसा सिर्फ न्यायपालिका पर ही बचा है।
न्यायपालिका, महिला सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर सवाल
कल्याण बनर्जी ने महिलाओं पर अत्याचार, पॉक्सो अधिनियम जैसे गंभीर मुद्दों का ज़िक्र करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि यह किसी एक राज्य या सरकार का विषय नहीं, बल्कि पूरे देश से जुड़ा मसला है।
मनरेगा के नाम बदलने को लेकर भी उन्होंने तंज कसा और कहा कि हर बार सत्ता में आने पर नाम बदलने की राजनीति की जाती है। उन्होंने जोड़ा, “हो सकता है मेरी बात आपको अच्छी न लगे, लेकिन जो हम कह रहे हैं, वह सही है।”
मतदाता सूची से नाम हटाने पर कड़ा विरोध
विंटर सेशन के दौरान लोकसभा में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति का नाम 2024 की मतदाता सूची में था, उसे यह कहकर मतदाता कैसे नहीं माना जा सकता कि उसका नाम 2002 की सूची में नहीं था। उनके अनुसार, मतदाताओं के नाम हटाना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है।
उन्होंने सवाल उठाया, “अगर मतदाताओं को ही हटा दिया जाए तो चुनाव का मतलब क्या रह जाएगा?”
साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि क्या अब नरेंद्र मोदी भारतीय चुनाव आयोग के माध्यम से यह तय करेंगे कि कौन मतदाता होगा?
कल्याण बनर्जी ने ज़ोर देकर कहा कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है और चुनाव आयोग की कार्रवाई की वैधता पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट ही करेगा।
बीएलओ की मौतों पर गंभीर चिंता
बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) की मौतों का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में 20 लोगों की मौत हुई, कई गंभीर रूप से बीमार पड़े और कुछ ने आत्महत्या की कोशिश तक की। उन्होंने सवाल किया कि इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है—चुनाव आयोग या व्यवस्था?
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ये घटनाएं केवल बंगाल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य राज्यों से भी ऐसे मामले सामने आए हैं।
निष्कर्षतः, कल्याण बनर्जी का भाषण केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने चुनावी प्रक्रिया, मतदाता अधिकार, न्यायपालिका और लोकतंत्र की बुनियादी मजबूती पर गंभीर सवाल खड़े किए।














