दिल्ली स्थित सरकारी आवास में लगी आग के बाद बर्न्ट/आधा जले नोटों के बंडल मिलने की घटना का मामला 14–15 मार्च 2025 से सार्वजनिक हुआ। शुरुआती रिपोर्टों में घर से सैकड़ों/सैकड़ों के नोट और कई बैग मिलने की बात सामने आई।
तत्कालीन CJI संजिव खन्ना ने घटना के बाद एक तीन न्यायाधीशों की इन-हाउस कमेटी गठित कराई, जिसने जांच कर रिपोर्ट दी और उन्हें कदाचार (misconduct) का दोषी पाया।
28 मार्च 2025 को उनका दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरण किया गया था (सरकारी आदेश दर्ज है)।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बाद में (अगस्त 2025) महाभियोग जांच के लिए 3-सदस्यीय संसदीय समिति का गठन किया; जस्टिस वर्मा ने समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
ताज़ा खबर — जस्टिस वर्मा ने संसदीय समिति के समक्ष अपना लिखित जवाब दाखिल किया और कहा कि वे आग लगने के समय घर पर मौजूद नहीं थे; साथ ही उन्होंने पुलिस और फायर ब्रिगेड की जांच-प्रक्रिया पर शिकायतें उठाईं कि क्राइम-साइट को ठीक से सील/सुरक्षित नहीं किया गया।
विस्तार — क्या कहा जस्टिस वर्मा ने (संसदीय जवाब के प्रमुख बिंदु)
1.मौके पर मौजूद नहीं थे — वर्मा का तर्क: जब आग लगी तब मैं घर पर नहीं था; इसलिए फर्स्ट-रिस्पॉन्डर या साइट-इंचार्ज होने का आरोप मुझ पर अनुचित है।
2.सिक्योरिटी/प्रोसीजर की विफलता — उनका कहना है कि घटना के दौरान पुलिस और फायर ब्रिगेड मौजूद थे, पर करेंसी/साइट को वैधानिक तरीके से सील नहीं किया गया; इसलिए साक्ष्य संरक्षण में खामियाँ थीं।
3.बरामदगी-विवाद — प्रारंभिक बयानों और बाद की रिपोर्टों में अंतर की ओर इशारा करते हुए वर्मा ने कथित कैश बरामदगी के प्रोसेस और रिकार्ड को चुनौती दी। (यह दलील सार्वजनिक जवाब में प्रमुख रूप से दर्ज है)।
जांच-प्रक्रिया अब तक — टाइमलाइन (मुख्य पड़ाव)
14–15 मार्च 2025: तु��्घलक रोड स्थित सरकारी आवास में आग; उससे जुड़ी घटनाएँ सार्वजनिक हुईं — फर्श पर आधे जले ₹500 नोट आदि पाए जाने की रिपोर्ट्स आईं।
28 मार्च 2025: सरकार ने स्थानांतरण का आदेश जारी किया; उनके ट्रांसफर का सरकारी आदेश उपलब्ध है।
मई 2025: CJI की ओर से गठित तीन-सदस्यी इन-हाउस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सौंपी और कदाचार के निष्कर्ष दिए।
जुलाई–अगस्त 2025: लोकसभा में महाभियोग के प्रयास—सदस्यों द्वारा नोटिस और स्पीकर द्वारा संसदीय समिति का गठन।
जनवरी 2026 (ताज़ा): जस्टिस वर्मा ने संसदीय समिति के समक्ष जवाब दाखिल किया; साथ ही उनकी चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की और कुछ अंतिम आदेश सुरक्षित रख लिये/निर्णय आरक्षित किया गया।
कानूनी मायने और राजनीति — क्या अहम है
न्यायपालिका-जवाबदेही बनाम प्रक्रिया-सुरक्षा: मामला यह दर्शाता है कि एक उच्चाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में किस स्तर तक इन-हाउस रिपोर्ट, पुलिस प्रक्रिया, और संसदीय जांच का तालमेल ज़रूरी है। इन प्रक्रियाओं में किसी भी तरह की लापरवाही पूरे मामले की वैधता को प्रभावित कर सकती है।
साक्ष्य संरक्षण का प्रश्न: वर्मा के दावों के मुताबिक अगर साइट को वैधानिक रूप से सील नहीं किया गया तो साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं — जो मुक़दमों व संसदीय कार्रवाई दोनों में निर्णायक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका: न्यायपालिका-संबंधी प्रक्रियाओं पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और अंतिम आदेश इस पूरे संघर्ष का निर्णायक मोड़ बन सकता है।
“क्या देखना है आगे?” — नेक्स्ट-स्टेप्स (What to watch)
संसदीय समिति की निष्पक्ष रिपोर्ट — क्या समिति वर्मा के तर्कों को स्वीकार करेगी या इन-हाउस रिपोर्ट/साक्ष्यों के आधार पर महाभियोग की सिफारिश करेगी?
सुप्रीम कोर्ट का रिजर्व्ड आर्डर — यदि सुप्रीम कोर्ट संसदीय समिति के गठन या प्रक्रिया पर बड़ा निर्देश दे दे तो मामले की दिशा बदल सकती है।
पुलिस/फायर ब्रिगेड के रिकॉर्ड-रिपोर्ट्स का सार्वजनिक होना — घटनास्थल पर क्या प्रक्रियाएँ अपनाई गईं, यह तय करेगा कि वर्मा के दावे कितने मजबूत होंगे।
यह मामला केवल एक पहलू पर नहीं टिकता — इसमें न्यायपालिका-मर्यादा, जांच-प्रक्रिया की पारदर्शिता, और संवैधानिक मार्गों सब कुछ परस्पर जुड़े हैं। जस्टिस वर्मा के ताज़ा जवाब ने सवालों की नई कतारें खड़ी कर दी हैं; अब निर्णायक मोड़ संसदीय रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निर्भर करेगा।














