कांग्रेस सांसद राहुल गांधी आज मध्य प्रदेश के इंदौर दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे शहर के भागीरथपुरा इलाके में दूषित पेयजल पीने से जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों से मुलाकात करेंगे। इसके अलावा राहुल गांधी बॉम्बे हॉस्पिटल भी जाएंगे, जहां उल्टी-दस्त के प्रकोप से भर्ती मरीजों से मिलकर उनका हालचाल जानेंगे।
भागीरथपुरा में दिसंबर महीने के अंत से दूषित पानी के कारण गंभीर बीमारी फैलने और मौतों का सिलसिला शुरू हुआ था। इस घटना को लेकर प्रदेश की राजनीति में भी तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। कांग्रेस अब सीधे पीड़ितों के बीच जाकर सरकार से जवाब मांगने की रणनीति अपना रही है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने मीडिया से बातचीत में दावा किया कि दूषित पेयजल के कारण अब तक 24 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 8 से 10 मरीजों की हालत अभी भी बेहद गंभीर बनी हुई है। उन्होंने बताया कि राहुल गांधी बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती मरीजों से मुलाकात कर उनकी स्थिति की जानकारी लेंगे।
पटवारी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी की योजना थी कि राहुल गांधी की मौजूदगी में दूषित पेयजल की समस्या के समाधान को लेकर बुद्धिजीवियों, पर्यावरणविदों और प्रदेशभर के नगर निगम पार्षदों का एक सम्मेलन आयोजित किया जाए, लेकिन प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी।
प्रदेश सरकार पर हमला बोलते हुए जीतू पटवारी ने दावा किया कि मध्य प्रदेश में करीब 70 प्रतिशत पानी पीने योग्य नहीं है। उन्होंने दूषित पेयजल को “धीमा जहर” बताते हुए कहा कि इससे लोगों की किडनी और अन्य अंगों को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा,
“इतनी मौतों के बावजूद राज्य के मंत्री भव्य आयोजनों में व्यस्त हैं और जब हम सवाल उठाते हैं तो हमें गालियां दी जाती हैं।”
भागीरथपुरा में बीमारी फैलने का सिलसिला दिसंबर के आखिरी दिनों में शुरू हुआ था। स्थानीय लोगों का दावा है कि इस प्रकोप से अब तक 24 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं, मध्य प्रदेश सरकार ने इंदौर हाईकोर्ट बेंच में गुरुवार को पेश अपनी स्थिति रिपोर्ट में उल्टी-दस्त प्रकोप के दौरान पांच महीने के एक शिशु समेत सात लोगों की मौत की पुष्टि की है।
इसके अलावा, शासकीय महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय की ओर से की गई ‘डेथ ऑडिट’ रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि भागीरथपुरा में हुई 15 मौतें किसी न किसी रूप में इस प्रकोप से जुड़ी हो सकती हैं।
इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों का मामला अब केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल के रूप में सामने आ गया है।














