Friday, January 16, 2026
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वंदे मातरम् पर लोकसभा में बहस: DMK सांसद ए. राजा बोले—गीत का इस्तेमाल मुसलमानों को अलग करने के लिए भी हुआ

लोकसभा में सोमवार को वंदे मातरम् को लेकर हुई बहस के दौरान DMK सांसद ए. राजा ने ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए कहा कि यह गीत सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक नहीं था, बल्कि इतिहास में कई बार इसे मुसलमानों को अलग-थलग दिखाने के लिए भी इस्तेमाल किया गया।

राजा ने प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए बयानों का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री अक्सर ‘तुष्टिकरण’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन वंदे मातरम् के संदर्भ में भी इस शब्द की पड़ताल आवश्यक है। उन्होंने कहा, “वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा मिला, लेकिन इसके कुछ अंशों को लेकर मूर्तिपूजा और धार्मिक विभाजन पर लंबे समय तक बहस चली। प्रधानमंत्री कहते हैं कि गीत को काटा गया और इससे विभाजन के बीज बोए गए—तो सवाल है कि यह विभाजन किसने किया?”

सांसद राजा ने दावा किया कि इतिहास में कई दर्ज घटनाएं बताती हैं कि 20वीं सदी की शुरुआत में वंदे मातरम् को ऐसे प्रस्तुत किया गया जिससे मुसलमान समुदाय अपने आपको इससे दूर महसूस करे।

उन्होंने महात्मा गांधी के रुख में आए बदलाव का भी हवाला दिया। “गांधीजी ने 1915 में इसकी प्रशंसा की, लेकिन 1940 तक उन्होंने कहा कि इसे कभी भी मुसलमानों को आहत करने के उद्देश्य से नहीं गाया जाना चाहिए। आखिर बीच के 25 वर्षों में ऐसा क्या हुआ?”, राजा ने पूछा।


ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला

राजा ने कहा कि 1905–1908 के बीच ब्रिटिश भारत के गृह विभाग ने रिपोर्ट किया था कि बंगाल में मस्जिदों के पास नमाज़ के समय हिंदू जुलूस वंदे मातरम् का जाप करते गुजरते थे, जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता था।

उन्होंने कहा कि 1907 में ऐसे पर्चे भी बांटे गए थे जिनमें मुसलमानों को चेताया गया था कि वे वंदे मातरम् न गाएं और स्वदेशी आंदोलन से दूर रहें।

राजा के अनुसार ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स में भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि क्यों वंदे मातरम् सांप्रदायिक संघर्ष की वजह बन रहा है। उन्होंने इतिहासकार तानिका सरकार और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंद मठ’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके कुछ अंश मुसलमानों के प्रति संदेह या शत्रुता की भावना दर्शाते हैं।


“वंदे मातरम् की आलोचना नई नहीं”

राजा ने कहा कि वंदे मातरम् को लेकर आलोचना और विचार–विमर्श 20वीं सदी की शुरुआत से चलता आ रहा है। उनका कहना था कि ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो गीत के कुछ हिस्सों की धार्मिक व्याख्या ने समाज में दूरी बढ़ाने का काम किया।

उन्होंने इतिहासकार आर.सी. मजूमदार का हवाला देते हुए कहा कि “बंकिम चंद्र ने देशभक्ति और धर्म को एक-दूसरे में इस तरह मिला दिया कि दोनों की सीमाएं धुंधली पड़ गईं।”

राजा ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि इन सभी उदाहरणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि वंदे मातरम् के कुछ छंद न सिर्फ औपनिवेशिक सत्ता का विरोध करते थे, बल्कि समय के साथ–साथ मुसलमानों के प्रति विवाद का कारण भी बने।

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