मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के बीच बना तथाकथित “मराठी यूनाइटेड फ्रंट” अब दरार के दौर से गुजरता दिख रहा है। हालिया बीएमसी चुनावों के बाद मनोनीत पार्षदों की सीटों के बंटवारे को लेकर शुरू हुआ विवाद अब खुलकर सामने आ गया है, जिससे गठबंधन के भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं।
मनोनीत पार्षदों की सीट पर बढ़ा विवाद
सूत्रों के मुताबिक, बीएमसी में मनोनीत पार्षदों की तीन सीटों में से एक सीट मनसे को देने की मांग की गई थी। हालांकि शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख Uddhav Thackeray ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद दोनों दलों के बीच तल्खी बढ़ती गई।
बीएमसी चुनाव में शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटों पर जीत मिली, जबकि मनसे को केवल 6 सीटों पर सफलता मिली। ऐसे में शिवसेना (यूबीटी) अपने संगठनात्मक हितों से समझौता करने के मूड में नहीं दिख रही है।
राज ठाकरे-शिंदे मुलाकात से बढ़ी अटकलें
इसी बीच मनसे प्रमुख Raj Thackeray की मुख्यमंत्री Eknath Shinde से हुई मुलाकात ने राजनीतिक हलचल को और तेज कर दिया है। बैठक के अगले ही दिन शिंदे गुट की प्रवक्ता साइना एनसी भी राज ठाकरे के दादर स्थित निवास पर पहुंचीं।
इन घटनाओं के बाद नए राजनीतिक समीकरण बनने की अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह नाराजगी गहराती है तो मुंबई की राजनीति में बड़ा फेरबदल संभव है।
मनसे नेताओं के तीखे बयान
मनसे के कई नेताओं ने सोशल मीडिया के जरिए इशारों में नाराजगी जाहिर की। “जब दिल में प्यार ही नहीं, तो रिश्ता निभाने का क्या मतलब?” जैसे संदेशों को शिवसेना (यूबीटी) पर तंज माना जा रहा है।
एमएनएस के मुंबई अध्यक्ष संदीप देशपांडे के तीखे बयानों ने भी माहौल को गरमा दिया है। वहीं, पार्टी नेता अविनाश अभ्यंकर ने कहा कि संगठन पुनर्गठन पर चर्चा हुई है और जिलों से रिपोर्ट मंगाई जा रही है। अंतिम निर्णय राज ठाकरे लेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि “हर चीज की एक एक्सपायरी डेट होती है,” जिसे राजनीतिक गलियारों में गठबंधन पर कटाक्ष के रूप में देखा जा रहा है।
‘दो भाइयों और दो पार्टियों का गठबंधन’
मनसे नेताओं का कहना है कि यह गठबंधन “दो भाइयों और दो पार्टियों” के बीच था। सीटों के मुद्दे पर अंतिम फैसला राज ठाकरे ही करेंगे। अभी तक कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है, लेकिन संकेत साफ हैं कि रिश्तों में खटास है।
वहीं शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने बयान दिया कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे दोनों परिपक्व नेता हैं और छोटी बातों पर मनमुटाव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि “मराठी अस्मिता” के मुद्दे पर दोनों भाई साथ हैं और आगे भी साथ रहेंगे।
क्या टूटेगा ‘मराठी यूनाइटेड फ्रंट’?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह टकराव केवल सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य और प्रभाव क्षेत्र का भी है। यदि मनसे और शिवसेना (यूबीटी) के बीच बातचीत से समाधान नहीं निकलता, तो मुंबई की राजनीति में नए गठबंधन बनते और पुराने समीकरण टूटते नजर आ सकते हैं।
फिलहाल, सबकी नजर राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के अगले कदम पर टिकी है, जो तय करेगा कि “मराठी यूनाइटेड फ्रंट” मजबूती से आगे बढ़ेगा या इतिहास बन जाएगा।














