संसद के शीतकालीन सत्र में आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना से सांसद चंद्रशेखर ने महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश (Menstrual Leave) को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की जोरदार मांग उठाई। उन्होंने कहा कि भारत में अभी तक मेंस्ट्रुअल लीव को लेकर कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है, जबकि कई देशों में यह सुविधा कानून के रूप में मौजूद है।
लोकसभा में शून्यकाल के दौरान चंद्रशेखर ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि मेंस्ट्रुअल लीव पर एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए, जिसमें अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं को भी शामिल किया जाए।
“हर महिला को मिले मेंस्ट्रुअल लीव का अधिकार”
चंद्रशेखर ने चुनाव सुधारों और सामाजिक मुद्दों पर चल रही बहस के दौरान इस विषय को विस्तार से उठाया। उन्होंने कहा कि मासिक धर्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि महिलाओं के शरीर की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसके बावजूद इससे जुड़ी दर्द और तकलीफ उनकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, इसलिए महिलाओं को यह अधिकार मिलना बेहद आवश्यक है।
उन्होंने कहा —
“कुछ राज्यों में मेंस्ट्रुअल लीव की सुविधा है, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर अनिवार्य किए जाने की जरूरत है। हर महिला को इस अधिकार का लाभ मिलना चाहिए।”
भारत में अभी राष्ट्रीय कानून नहीं, कुछ राज्यों में व्यवस्था लागू
जापान, इंडोनेशिया, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में मेंस्ट्रुअल लीव को लेकर पहले से कानूनी प्रावधान हैं। हालांकि, भारत में राष्ट्रीय स्तर पर इसकी कोई व्यवस्था नहीं है।
कुछ राज्यों ने अपने स्तर पर यह कदम उठाया है:
4 राज्य जहाँ मेंस्ट्रुअल लीव मिलती है
1.बिहार – 1992 से सरकारी महिला कर्मचारियों को हर महीने दो पीरियड लीव मिलती है।
2.ओडिशा – 2024 में राज्य महिलाओं के लिए साल में 12 दिनों की पेड मेंस्ट्रुअल लीव लागू।
3.कर्नाटक – महिला कर्मचारियों के लिए व्यवस्था उपलब्ध।
4.केरल – 2023 में विश्वविद्यालयों और आईटीआई की छात्राओं के लिए पेड पीरियड और मैटरनिटी लीव की घोषणा।
इन राज्यों में पेड मेंस्ट्रुअल लीव की सुविधा है, लेकिन देश की अधिकांश महिलाओं — खासकर निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली — को यह सुविधा नहीं मिलती।
राष्ट्रीय नीति की जरूरत क्यों?
असंगठित क्षेत्र की करोड़ों महिलाओं को लाभ मिलेगा
मासिक धर्म से जुड़ी पीड़ा और स्वास्थ्य समस्याओं को समझने वाला संवेदनशील कदम
कार्यस्थलों को अधिक समावेशी और महिला-हितैषी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास














