Saturday, January 31, 2026
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मुंबई में बिहार भवन विवाद — 30 मंज़िला या 30 सवाल?

मुंबई/पटना: बिहार सरकार ने मुंबई पोर्ट ट्रस्ट के पास 0.68 एकड़ के छोटे से गोदाम-ज़मीन पर ₹314.20 करोड़ के बजट से 30-मंजिला “बिहार भवन” बनाने का ऐलान किया — सरकारी बयान के मुताबिक़ यह प्रवासी बिहारी, मरीज और राज्य-कार्यकारिणी के लिए सुविधाएँ देगा।

पर जैसे ही नीतीश सरकार ने फ़ाइलों में मोहर लगाई, वैसे ही रंगभूमि पर नया नाटक शुरू हो गया — महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के युवा नेता यशवंत किलेदार ने ऐलान कर दिया कि वे इस भवन को मुंबई में बनने नहीं देंगे। उनके तर्क साधारण हैं: “पहले अपने किसानों, महंगी शिक्षा, महंगाई और बेरोज़गारी का हल करो — फिर बाहर-शहरों में महल बनाओ।”

बिहार के मंत्री अशोक चौधरी ने MNS की इस धमकी पर जो जवाब दिया, वह किसी मसालेदार फ़िल्मी संवाद से कम नहीं था — उन्होंने सार्वजनिक रूप से चुनौती दे दी कि ‘रुकाकर दिखाओ, हम निर्माण शुरू करेंगे’ और कहा कि मुंबई किसी एक पार्टी या व्यक्ति की जागीर नहीं है। राजनीतिक तकरार तेज़ हो गई है और बयानबाज़ी ने मूड को और गरम कर दिया।

RJD और विपक्ष ने कहा कि अगर ₹314 करोड़ हैं तो उसे कैंसर के इलाज के लिए बिहार में खर्च किया जाना चाहिए — एनसीआर के बाहर भवन बनाना ‘प्राथमिकताओं की अदला-बदली’ जैसा है। विशेषकर उन इलाक़ों के लिए जहाँ इलाज की सुविधाएँ कतराती हैं, यह तर्क चुभने वाला है।


व्यंग्यात्मक विश्लेषण — पैसा, राजनीति और परफॉर्मेंस

1.बजट का लॉजिक्स: ₹314 करोड़ — सुनने में शानदार लगे तो लगे। दिल्ली में भव्य बिहार भवन बना, अब मुंबई में भी ‘ब्राँच-ऑफ़-गौरव’। पर असलियत यह है कि यह राशि राज्य के अंदर अगर व्यवस्थित स्वास्थ्य-बुनियादी ढाँचे में लगती, तो कई कैंसर मरीजों की ज़िन्दगियाँ बच सकती थीं — पर राजनीति के थिएटर में ज़रूरतें बटोरने से पहले स्टेज-डिरेक्टर ने रौशनी दे दी। सड़क किनारे की कुत्ते-सीरियलिटी से लेकर अस्पताल-आईसीयू तक का फ़र्क़ शायद वही आदमी समझेगा जो चेकबुक को चश्मे की तरह पहन कर बजट पढ़ता है।

2.स्थानीय राजनीति vs राष्ट्रीय असृष्टि: MNS का विरोध स्थानीयता का राग है — “यह हमारी शहर है”। ठीक है, पर अगर शहर का नागरिक कल सुबह भूख से मर रहा हो और किसी राज्य का नेता वहाँ सोफे पर चाय पीकर ‘भाई-भाई’ का फोटो सेशन करा रहा हो, तो सवाल उठता है — क्या शहर-हवा भी अब ज़्यादा राष्ट्रीयकृत हो गई है? यानी ‘लोकल-प्राथमिकता’ का पोस्टर और ‘मेक-इट-ग्रैंड’ की फ़ाइल्स दोनों साथ चल सकते हैं — बस वोट बैंक का GPS सही होना चाहिए।

3.चुनौती-ख़िताब का नाटक: मंत्री का ‘आओ रोक कर दिखाओ’ वाला बयान किसी व्यावहारिक विवाद का हल नहीं है; यह केवल टोन-सेटिंग है। हंसी की बात: दोनों तरफ़ के दावों में वोट की गंध है — एक तरफ़ ‘हमारी ज़मीन’, दूसरी तरफ़ ‘हमारे लोग’। बीच में खड़ा आम आदमी पूछता है: क्या मैं भी अपनी आरक्षण लाइन में ₹314 करोड़ का हिस्सा ले सकता हूँ? नहीं? अच्छा। फिर शोर घटाइए।

4.हर बड़े ऐलान के पीछे स्टोरी-बोर्ड: कोई बताये कि 0.68 एकड़ पर 30 मंज़िला कैसे — इमारतें ऊँची बनती हैं पर प्राथमिकताएँ पतली पड़ जाती हैं। यह वो वही राजनीति है जहाँ प्रोजेक्ट का माप इमारत की ऊँचाई से होता है, न कि उसे बचाई गई ज़िंदगियों से। अगर आप ‘ऊँचाई’ माप रहे हैं तो कृपया ‘मानवता’ की लंबाई भी जोड़ दें।


चुटकी में सलाह (राजनीतिक-निर्देशिका)

अगर बिहार सरकार को वाकई मुंबई में प्रवासियों के लिए व्यवस्था करनी है — तो पहले वह मुफ्त चिकित्सा सहायता-हॉटलाइन, डायरेक्ट अस्पताल-लिंक्स, और ट्रांसपोर्ट-राहत दे — ज़मीन और गगन दोनों बाद में।

MNS को चाहिए कि वे पहले अपने ‘लोकल-इशू’ सुलझाएँ — किसानों की हक़ीक़त को छू कर देखें, न कि स्टैण्ड-अप कॉमेडी की तरह लाल क़ाफिला चलाएँ।

विपक्ष को चाहिए कि ठोकरें खाने के बावजूद तर्क दें — “हम पैसा किसलिए चाहते हैं” का तर्क देना आसान है; पर उसके साथ वैकल्पिक बजट-प्लान भी पेश करें — सिर्फ़ कड़ी नसीहत नहीं।

राजनीति अब इस काबिल हो गई है कि किसी भी बिल्डिंग की ऊंचाई से उसका नैतिक-नीव तय कर दिया जाता है — पर असल बात यह है: ऊँचाई जितनी भी बढ़ाओ, अगर नींव में सहानुभूति नहीं तो इमारत कभी टिकेगी नहीं। और हाँ, अगली बार जब कोई पांच-सवा सौ करोड़ का ऐलान हो, तो किसी डॉक्टर को भी बुला लो — वितरण-रचना चिकित्सा से कम नहीं होती; दवा सही जगह पर लगानी चाहिए, वरना दवा ही ज़हर बन जाती है।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
VIKAS TRIPATHI भारत देश की सभी छोटी और बड़ी खबरों को सामने दिखाने के लिए "पर्दाफास न्यूज" चैनल को लेके आए हैं। जिसके लोगो के बीच में करप्शन को कम कर सके। हम देश में समान व्यवहार के साथ काम करेंगे। देश की प्रगति को बढ़ाएंगे।
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