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सत्ता का रौब या प्रशासनिक मर्यादा का पतन? महिला अधिकारी से बदसलूकी के आरोपों में घिरे IAS कुमार राजीव रंजन

“वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक में महिला अधिकारी को कथित तौर पर ‘ब्लडी शिट’ कहने का आरोप; ‘चुप रहो’ और निलंबन की चेतावनी के दावों से बढ़ा विवाद। पुराने हथियार लाइसेंस मामले ने भी खींचा ध्यान, अब निगाहें सरकार की कार्रवाई और प्रशासनिक जवाबदेही पर।”

श्रीनगर। सरकारी पद की ताकत क्या किसी अधिकारी को अपनी अधीनस्थ महिला अधिकारी की गरिमा कुचलने का अधिकार दे देती है? क्या प्रशासनिक समीक्षा बैठक में कामकाज पर सवाल पूछने की आड़ में अपमानजनक भाषा, ऊंची आवाज और निलंबन की धमकी को जायज ठहराया जा सकता है? जम्मू-कश्मीर में श्रम एवं रोजगार विभाग के प्रशासनिक सचिव और वरिष्ठ IAS अधिकारी कुमार राजीव रंजन से जुड़ा ताजा विवाद इन्हीं बुनियादी सवालों को केंद्र में ले आया है।

एक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग बैठक का कथित वीडियो सामने आने के बाद रंजन पर महिला अधिकारी बीनीश वानी के साथ अपमानजनक व्यवहार करने के आरोप लगे हैं। बताया जा रहा है कि बैठक के दौरान कामकाज और लक्ष्य हासिल करने को लेकर हुई बहस ने देखते ही देखते तीखा रूप ले लिया। वीडियो में कथित तौर पर रंजन को महिला अधिकारी को चुप रहने के लिए कहते, उनकी बात पर आपत्ति जताने के बाद बाहर निकल जाने को कहते और निलंबन का आदेश जारी करने की बात करते सुना जा सकता है।

मामले ने राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है। सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक के नेताओं की ओर से कार्रवाई की मांग किए जाने की खबरें हैं। हालांकि, इस पूरे प्रकरण में आरोपों, वीडियो में दिखाई-सुनाई देने वाली बातों, संबंधित पक्षों के आधिकारिक स्पष्टीकरण और सरकार के अंतिम निष्कर्ष के बीच अंतर करना जरूरी है। किसी वायरल वीडियो के आधार पर सभी प्रशासनिक या कानूनी निष्कर्ष पहले से तय नहीं किए जा सकते। लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस विवाद ने वरिष्ठ नौकरशाही के आचरण और अधीनस्थ कर्मचारियों के सम्मान को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

बैठक में क्या हुआ, जिसने खड़ा कर दिया विवाद?

उपलब्ध विवरणों के अनुसार, विवाद उस समय शुरू हुआ जब रंजन ने गांदरबल में तैनात रोजगार विभाग की सहायक निदेशक बीनीश वानी से उनके कामकाज और निर्धारित लक्ष्यों को लेकर सवाल किए। वानी ने कथित तौर पर बताया कि उन्होंने डिप्टी कमिश्नर और अतिरिक्त जिला विकास आयुक्त (ADC) को पत्र लिखा था। उनकी शिकायत थी कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के जिला अधिकारी ने लक्ष्य हासिल करने में असमर्थता जताई और सहयोग नहीं करने की बात कही।

बताया जाता है कि रंजन ने वानी से इस स्थिति को लिखित रूप में दर्ज कराने और सीधे उन्हें इसकी जानकारी देने को कहा। इसके बाद चर्चा का स्वर तीखा हो गया। रंजन ने कथित तौर पर सवाल उठाया कि यदि दूसरे लोग काम कर रहे हैं, तो वानी को NRLM की क्या जरूरत है। उन्होंने उनके काम को पत्र लिखने और मेडल पाने तक सीमित बताने वाली टिप्पणी भी की।

वानी ने अपनी ओर से NRLM के सहयोग की जरूरत बताई। इसके बाद कथित तौर पर रंजन ने उन्हें ‘चुप रहो’ कहा। जब वानी ने उनके ऊंची आवाज में बात करने पर आपत्ति जताई और अपनी बात रखने का आग्रह किया, तो रंजन की ओर से अपमानजनक शब्द कहे जाने का आरोप है।

विवाद का सबसे गंभीर पहलू यही है कि क्या बैठक में असहमति जताने और जवाब मांगने के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी ने पेशेवर संवाद की सीमाएं पार कीं। किसी अधीनस्थ अधिकारी के कामकाज में कमी हो, लक्ष्य पूरे न हुए हों या रिपोर्टिंग में चूक हुई हो, तो उसका मूल्यांकन करना वरिष्ठ अधिकारी की जिम्मेदारी है। लेकिन मूल्यांकन और व्यक्तिगत अपमान दो अलग-अलग बातें हैं। प्रशासनिक अनुशासन का उद्देश्य कामकाज सुधारना है, न कि किसी कर्मचारी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाना।

‘ब्लडी शिट’ टिप्पणी पर आपत्ति, फिर निलंबन की बात

विवाद के दौरान कथित अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर वानी ने आपत्ति जताई। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, इसके बाद रंजन ने उन्हें बैठक से बाहर निकल जाने को कहा और उन्हें निलंबित करने का आदेश जारी करने की बात कही। वानी की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया दिए जाने का दावा किया गया है।

वानी ने पत्रकारों को बताया कि घटना बुधवार को हुई समीक्षा बैठक के दौरान हुई थी और उन्होंने इस मामले को उच्च अधिकारियों के समक्ष उठाया है। हालांकि, घटना की तारीख, बैठक का पूरा संदर्भ, वीडियो की संपूर्ण रिकॉर्डिंग और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

इस प्रकरण में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि क्या निलंबन की बात किसी वास्तविक प्रशासनिक कार्रवाई की घोषणा थी या बहस के दौरान कही गई धमकी जैसी टिप्पणी। दोनों स्थितियों का मूल्यांकन अलग-अलग आधार पर होना चाहिए। यदि कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रस्तावित की गई थी, तो उसका आधार, प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।

किसी अधिकारी के व्यवहार की जांच का अर्थ यह नहीं कि उसके खिलाफ आरोप पहले ही सिद्ध मान लिए जाएं। लेकिन इसी सिद्धांत का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है: वरिष्ठ पद पर बैठे व्यक्ति को केवल अपने पद या अधिकार के कारण जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती।

पुराना हथियार लाइसेंस मामला भी चर्चा में

रंजन का नाम इससे पहले जम्मू-कश्मीर में कथित अवैध हथियार लाइसेंस जारी किए जाने के मामले में भी सामने आ चुका है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने वर्ष 2018 में इस मामले में कार्रवाई शुरू की थी। आरोप था कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बड़ी संख्या में हथियार लाइसेंस जारी किए गए। इसी प्रकरण में रंजन की गिरफ्तारी की बात भी सामने आई थी।

इस मामले के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें निलंबित कर दिया था। बताया जाता है कि फरवरी 2021 में एक समीक्षा समिति की सिफारिशों के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया।

यहां एक जरूरी कानूनी अंतर समझना चाहिए। गिरफ्तारी अपने आप में दोषसिद्धि नहीं होती और बहाली का अर्थ भी अपने आप में किसी आपराधिक मामले में अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। हथियार लाइसेंस प्रकरण में रंजन की वर्तमान कानूनी स्थिति, आरोपपत्र, न्यायिक आदेश और मामले के अंतिम परिणाम की प्रमाणित जानकारी के बिना उन्हें दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। फिर भी, पुराने मामले का उल्लेख इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इससे उनके प्रशासनिक रिकॉर्ड और जवाबदेही को लेकर सार्वजनिक सवाल उठ सकते हैं। इन सवालों के उत्तर दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही मिलने चाहिए, अटकलों से नहीं।

बिहार से IAS तक का सफर

कुमार राजीव रंजन का जन्म 20 दिसंबर 1977 को हुआ बताया जाता है। वह 2010 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और उनका कैडर AGMUT है। उन्होंने विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह एक जनवरी 2024 से श्रीनगर में श्रम एवं रोजगार विभाग के प्रशासनिक सचिव के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले भी वह सरकार में विभिन्न प्रशासनिक पदों पर जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।

भारतीय प्रशासनिक सेवा में वरिष्ठ पद तक पहुंचना व्यापक प्रशासनिक जिम्मेदारी का परिचायक है। ऐसे पद पर बैठे अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह कठिन परिस्थितियों में भी निष्पक्षता, संयम और संस्थागत मर्यादा बनाए रखे। पद की वरिष्ठता जितनी अधिक होती है, व्यवहार और निर्णयों की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

हालांकि, किसी अधिकारी के करियर, गृह राज्य या पुराने विवादों को वर्तमान आरोप का प्रमाण नहीं माना जा सकता। ताजा घटना की जांच उसी के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए।

राजनीतिक दबाव के बीच सरकार की परीक्षा

विवाद पर विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से कार्रवाई की मांग किए जाने से सरकार पर निष्पक्ष और पारदर्शी कदम उठाने का दबाव बढ़ा है। लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक प्रशासन में कार्रवाई का आधार राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि प्रमाण और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए।

सरकार के सामने अब कई सवाल हैं। क्या वायरल वीडियो की पूरी रिकॉर्डिंग सुरक्षित की गई है? क्या बैठक में मौजूद अन्य अधिकारियों के बयान लिए जाएंगे? क्या बीनीश वानी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा? क्या कुमार राजीव रंजन से औपचारिक स्पष्टीकरण मांगा गया है? और क्या जांच पूरी होने तक किसी निष्पक्ष अधिकारी या समिति को मामले की समीक्षा सौंपी जाएगी?

इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है। यदि वीडियो और अन्य साक्ष्यों से अनुचित आचरण की पुष्टि होती है, तो लागू सेवा नियमों के तहत उचित कार्रवाई की जानी चाहिए। यदि आरोपों के कुछ हिस्से गलत या अधूरे साबित होते हैं, तो जांच में यह भी स्पष्ट होना चाहिए। पारदर्शिता का अर्थ केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि कार्रवाई के कारणों और निष्कर्षों को उचित सीमा तक सार्वजनिक करना भी है।

असली सवाल: क्या प्रशासन में असहमति की जगह बची है?

इस पूरे विवाद का दायरा किसी एक बैठक या दो अधिकारियों के बीच हुई बहस तक सीमित नहीं है। सरकारी तंत्र में वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के बीच अधिकारों का अंतर स्वाभाविक है, लेकिन उस अंतर का इस्तेमाल संवाद बंद करने या अपमान को सामान्य बनाने के लिए नहीं होना चाहिए।

यदि किसी अधिकारी ने काम में लापरवाही की है, तो उसके खिलाफ लिखित निर्देश, प्रदर्शन की समीक्षा, स्पष्टीकरण और नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई के रास्ते मौजूद हैं। उसी तरह यदि कोई वरिष्ठ अधिकारी अपनी भाषा या आचरण से सेवा मर्यादा का उल्लंघन करता है, तो उसके मामले में भी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की व्यवस्था होनी चाहिए। नियमों का पालन केवल कनिष्ठ कर्मचारियों से अपेक्षित नहीं किया जा सकता।

महिला अधिकारियों की गरिमा का प्रश्न भी इस बहस का अहम हिस्सा है। किसी महिला अधिकारी के साथ कथित दुर्व्यवहार को केवल इसलिए हल्का नहीं माना जा सकता कि घटना कार्यालयी बैठक में हुई या विवाद कामकाज से जुड़ा था। साथ ही, केवल महिला होने के आधार पर किसी भी आरोप को स्वतः सिद्ध मानना भी न्यायसंगत नहीं होगा। कसौटी एक ही होनी चाहिए—साक्ष्य, निष्पक्ष जांच और नियमों का समान अनुपालन।

अब जवाबदेही से नहीं चलेगा काम

कुमार राजीव रंजन से जुड़ा यह विवाद प्रशासनिक व्यवस्था के सामने एक सीधा सवाल रखता है: क्या सरकारी पद अधिकारों का प्रतीक भर है, या वह जिम्मेदारियों और मर्यादाओं का भी बंधन है?

यदि बैठक में अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ है, तो उसे सामान्य कार्यस्थलीय बहस बताकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। और यदि निलंबन की धमकी दी गई है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उसका कोई वैधानिक आधार था या नहीं। दूसरी ओर, आरोपों की पुष्टि से पहले किसी अधिकारी के खिलाफ अंतिम फैसला सुनाना भी न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।

अब जरूरत बयानबाजी से आगे बढ़कर तथ्य सामने लाने की है। पूरी रिकॉर्डिंग, संबंधित अधिकारियों के बयान, लिखित शिकायत और विभागीय प्रतिक्रिया के आधार पर समयबद्ध जांच होनी चाहिए। निष्कर्ष चाहे जो निकले, उसे नियमों और उपलब्ध साक्ष्यों से समर्थित होना चाहिए।

प्रशासन की असली ताकत ऊंची आवाज में नहीं, बल्कि निष्पक्ष निर्णय लेने की क्षमता में होती है। वरिष्ठता किसी अधिकारी को अधिक अधिकार दे सकती है, लेकिन वह उसे जवाबदेही से ऊपर नहीं रख सकती। जम्मू-कश्मीर सरकार के सामने अब चुनौती यही है कि वह इस विवाद को न राजनीतिक शोर में दबने दे और न बिना जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचे—बल्कि ऐसा कदम उठाए, जिससे सरकारी कार्यालयों में गरिमा, अनुशासन और न्याय, तीनों पर जनता का भरोसा कायम रहे।

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VIKAS TRIPATHI
VIKAS TRIPATHIhttp://www.pardaphaas.com
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