नई दिल्ली: लोकसभा में विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के बाद एक असाधारण राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बड़ा और प्रतीकात्मक निर्णय लेते हुए घोषणा की है कि जब तक उनके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में फैसला नहीं हो जाता, तब तक वे अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे। नियमों में ऐसी कोई बाध्यता नहीं होने के बावजूद स्पीकर का यह कदम संसद के इतिहास में अहम माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन यानी 9 मार्च को स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा कराई जा सकती है। इस प्रक्रिया के तहत सदन में पहले कम से कम 50 सांसदों का समर्थन हाथ उठवाकर जांचा जाएगा। इसके बाद सदन की पीठासीन व्यवस्था इस प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दे सकती है।
हाउस सेक्रेटरी-जनरल को दिए निर्देश
जानकारी के मुताबिक, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मंगलवार को हाउस सेक्रेटरी-जनरल को निर्देश दिए कि उनके खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस की जांच की जाए और नियमों के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाए। यह कदम ऐसे समय आया है जब विपक्ष स्पीकर पर पक्षपात और भेदभाव के गंभीर आरोप लगा रहा है।
कांग्रेस ने दिया अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस
कांग्रेस पार्टी ने मंगलवार को लोकसभा स्पीकर के खिलाफ औपचारिक रूप से नो-कॉन्फिडेंस मोशन का नोटिस दिया। कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने बताया कि यह नोटिस लोकसभा के नियम 94C के तहत दोपहर 1:14 बजे सौंपा गया। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस नोटिस पर कुल 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं, जो विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है।
विपक्ष के गंभीर आरोप
विपक्षी दलों ने स्पीकर ओम बिरला पर सदन की कार्यवाही के दौरान पक्षपात का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि विपक्षी नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस में स्पीकर के खिलाफ चार प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया गया है।
The opposition on Tuesday submitted a notice for moving a resolution to remove Lok Sabha Speaker Om Birla from office for disallowing Rahul Gandhi and other opposition leaders from speaking in the House on the Motion of Thanks to the President's address, as well as for the… pic.twitter.com/GqIMJCjhMX
— Press Trust of India (@PTI_News) February 10, 2026
इन आरोपों में यह भी शामिल है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बोलने से रोका गया। राहुल गांधी चीन के साथ 2020 के गतिरोध का जिक्र करते हुए पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की एक बिना प्रकाशित पुस्तक का हवाला दे रहे थे, लेकिन उन्हें आगे बोलने की अनुमति नहीं दी गई।
सांसदों के निलंबन और विवादित बयान भी मुद्दा
विपक्ष ने आठ सांसदों के निलंबन, बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा पूर्व प्रधानमंत्रियों पर किए गए कथित “आपत्तिजनक और व्यक्तिगत हमलों” तथा स्पीकर के एक बयान को भी अविश्वास प्रस्ताव का आधार बनाया है।
स्पीकर ओम बिरला के उस बयान पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सदन में न आने का आग्रह किया था, क्योंकि उन्हें सूचना मिली थी कि कुछ कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक जाकर “ऐसी घटना कर सकते हैं जो पहले कभी नहीं हुई।”
राजनीतिक और संसदीय महत्व
स्पीकर का स्वयं अध्यक्ष की कुर्सी से अलग रहने का फैसला न केवल राजनीतिक रूप से बल्कि संसदीय परंपराओं के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है। अब सभी की नजरें 9 मार्च पर टिकी हैं, जब यह साफ होगा कि अविश्वास प्रस्ताव पर सदन में क्या रुख अपनाया जाता है और इसका भारतीय संसदीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।














