महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के बाद महापौर पद को लेकर शुरू हुई राजनीतिक खींचतान के बीच शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के मुखपत्र ‘सामना’ ने भाजपा और शिंदे गुट पर बेहद तीखा हमला बोला है। संपादकीय में भाजपा पर सत्ता, धन और पुलिस बल के सहारे महापौर बनाने की रणनीति अपनाने का आरोप लगाया गया है और कहा गया है कि मौजूदा हालात में लोकतांत्रिक मूल्यों, नैतिकता और राजनीतिक संस्कृति का गंभीर पतन हो रहा है।
सामना ने तंज कसते हुए लिखा कि अगर भाजपा के पास सत्ता, पैसा और पुलिस है, तो वह सिर्फ महाराष्ट्र के शहरों में ही नहीं, बल्कि “चांद और मंगल पर भी अपना महापौर बैठा सकती है” और फिर इसका ढिंढोरा पीट सकती है। यह टिप्पणी राज्य में महापौर चुनावों के दौरान कथित दबाव, जोड़-तोड़ और सत्ता के दुरुपयोग के आरोपों की ओर इशारा करती है।
मुंबई में मराठी चेहरा: शिवसेना की जीत का दावा
मुंबई में भाजपा द्वारा रितु तावड़े को महापौर पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर सामना ने दावा किया कि यह फैसला भाजपा ने अपनी इच्छा के विरुद्ध लिया। संपादकीय के अनुसार, शिवसेना द्वारा मराठी अस्मिता का मुद्दा लगातार उठाए जाने के कारण भाजपा को यह स्वीकार करना पड़ा कि मुंबई का चेहरा मराठी हिंदू ही है। सामना ने इसे शिवसेना की राजनीतिक जीत बताया, हालांकि कटाक्ष करते हुए कहा गया कि “कुत्ते की पूंछ टेढ़ी ही रहती है।”
बांग्लादेशी मुद्दे पर सवाल
भावी महापौर के बांग्लादेशियों को मुंबई से बाहर करने संबंधी बयान पर भी सामना ने सवाल खड़े किए। संपादकीय में पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस रुख से सहमत हैं, जब भारत सरकार बांग्लादेश को आर्थिक मदद देती है और दूसरी ओर वहां हिंदुओं पर हमले की खबरें आती हैं। इसे “निंदनीय और रहस्यमय” करार दिया गया।
मीरा-भायंदर और अन्य नगरपालिकाओं पर आरोप
सामना ने आरोप लगाया कि मीरा-भायंदर में मराठी जनता की मांग को नजरअंदाज कर भाजपा ने अमराठी महापौर बनाया। कुल मिलाकर 11 में से 10 महानगरपालिकाओं में महापौर नियुक्त करने के लिए अपनाए गए हथकंडों में “न सोच थी, न नैतिकता” — ऐसा तीखा आरोप संपादकीय में लगाया गया है।
दलबदल पर सीधा हमला
प्रदेश में हो रहे दलबदल को लेकर सामना ने राजनीति को “दलदल” बताया। कल्याण-डोंबिवली में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के शिंदे गुट में शामिल होने और नासिक में भी इसी तरह की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा गया कि चुनाव चिन्ह पर चुने गए प्रतिनिधियों ने जनता के विश्वास के साथ धोखा किया।
संपादकीय में बालासाहेब ठाकरे के पुराने बयान का हवाला देते हुए दलबदल पर कठोर टिप्पणी भी की गई, हालांकि यह भी स्वीकार किया गया कि ऐसे उपाय लोकतंत्र और कानून के दायरे में नहीं आते।
खाली होता खजाना, चुनावों में बेहिसाब खर्च
महाराष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर सवाल उठाते हुए सामना ने कहा कि राज्य का खजाना खाली हो रहा है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अधिकारियों को खर्च कम करने के निर्देश दे रहे हैं। इसके बावजूद भाजपा और उसके सहयोगी दल छोटे-छोटे चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। संपादकीय ने पूछा कि जब सरकार के पास पैसा नहीं है, तो चुनावी खर्च के लिए यह धन कहां से आ रहा है?
विकास निधि में पक्षपात का आरोप
सामना ने आरोप लगाया कि मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य खुलेआम कहते हैं कि वे सिर्फ पार्टी और चुनाव चिन्ह देखकर ही विकास निधि देते हैं। इसे जनता के टैक्स के पैसे का दुरुपयोग और लोकतंत्र के खिलाफ बताया गया।
संपादकीय के अनुसार, हर चुने हुए प्रतिनिधि का सरकारी निधि पर समान अधिकार होता है, लेकिन भाजपा ने राजनीतिक संस्कृति को “गंदा” कर दिया है और मुख्यमंत्री फडणवीस भी इस व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं।
राजनीति की गिरती संस्कृति
अजित पवार से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख करते हुए सामना ने निष्कर्ष निकाला कि पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति की संस्कृति बहुत नीचे गिर चुकी है। भले ही व्यक्तिगत सूतक समाप्त हो जाए, लेकिन राज्य की राजनीति पर लगा “सूतक” जल्द खत्म होता नहीं दिखता।
कुल मिलाकर, सामना का यह संपादकीय महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति पर एक तीखा आरोपपत्र है, जिसमें सत्ता के दुरुपयोग, दलबदल, आर्थिक विरोधाभास और लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।














