कांग्रेस ने तय किया है कि वह इस साल होने वाले पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरेगी और सभी 294 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करेगी। यह निर्णय कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर हुई शीर्ष नेतृत्व की बैठक में लिया गया — इसे पार्टी के पदाधिकारियों ने पुष्टि की है।
क्या कहा गया, किसने बताया
कांग्रेस के प्रभारी महासचिव गुलाम अहमद मीर ने बैठक के बाद मीडिया को जानकारी दी कि पार्टी राज्य में किसी गठबंधन में नहीं जाएगी और अकेले चुनाव लड़ेगी। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने यह भी कहा कि पिछले कुछ चुनावी समझौतों ने स्थानीय संगठन (काडर) की ऊर्जा और उत्साह पर असर डाला था।
वहीं, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी पहले ही स्पष्ट कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी भी बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेगी और उन्होंने कहा है कि तृणमूल अपने दम पर ही चुनाव मैदान में है।
अधीर रंजन चौधरी ने—जैसा कि आपने बताया—कहा है कि वे आलाकमान के फैसले के साथ हैं, यानी पार्टी के संगे निर्णय का समर्थन करेंगे। (यह पार्टी के भीतर की प्रतिक्रिया और एकता को दर्शाता है।)
ऐतिहासिक संदर्भ और प्रदर्शन का संक्षेप
2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने संयुक्त रूप से मुकाबला किया था; उस चुनाव में कांग्रेस ने 44 सीटें जीतीं।
2021 में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों की स्थिति बदली — कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली। (राज्य में राजनीतिक परिदृश्य में तेज़ बदलाव हुआ है — TMC की ताकत बरकरार रही और BJP भी उभरा)।
इन परिणामों और पिछले गठबंधन अनुभवों के आधार पर कांग्रेस ने इस बार संगठन-गठबन्धन के बजाय स्वयं को मज़बूत करने की प्राथमिकता चुनी है — खासकर बूथ-स्तर के कार्यकर्ताओं और कार्यप्रणाली को पुनर्जीवित करने के इरादे से।
क्या मायने रखता है यह फैसला?
काँग्रेस का जोखिम-लाभ: अकेले लड़ने पर कांग्रेस को दूरगामी संगठनात्मक नुकसान से उबरने का मौका मिलेगा — परन्तु समान रूप से वोट-बंटवारे के चलते भाजपा और तृणमूल दोनों के खिलाफ प्रभावी ‘संयुक्त’ विकल्प का अभाव रहेगा।
वोट-बैंक और रणनीति: पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोट, दक्खिने-पश्चिम बंगाल के क्षेत्रीय समीकरण व स्थानीय गठजोड़ चुनावी नतीजे निर्धारित कर सकते हैं। टीएमसी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह भी अकेले ही लड़ेगी; इसका अर्थ यह हुआ कि कई क्षेत्रों में तिकड़ी मुकाबला (TMC–BJP–CONG) बनने की संभावना बढ़ गई है।
संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं को: पार्टी शीर्ष ने जो संदेश दिया है, उसका उद्देश्य स्थानीय कार्यकर्ताओं में “स्वावलंबन और जिम्मेदारी” की भावना पैदा करना भी हो सकता है — खासकर उन जिलों/बूथों में जहाँ कांग्रेस का असर कम हुआ है।
आगे क्या होने की उम्मीद है
अब अगला चरण होगा निर्वाचन रणनीति और प्रत्याशी चयन — कांग्रेस को हर सीट पर अपना संगठनात्मक ढांचा और अभियान योजना तैयार करनी होगी।
साथ ही, सीट-वार सामाजिक-राजनीतिक समीकरण (काँग्रेस, लेफ्ट, TMC, BJP के वोट शेयर) को देखते हुए स्थानीय गठबंधन/समझौते भी कुछ स्थानों पर उभर सकते हैं — पर अभी आधिकारिक तौर पर कोई बड़ा सीट-समझौता घोषित नहीं हुआ है














