पश्चिम बंगाल की राजनीति में शनिवार को दो बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले सियासी सरगर्मी और तेज़ कर दी है। एक ओर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के साथ हाथ मिलाने का ऐलान किया है, तो दूसरी ओर हुगली जिले में दल-बदल की राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है।
टीएमसी से निकाले गए विधायक हुमायूं कबीर ने घोषणा की है कि वह शनिवार को बहरामपुर में AIMIM के साथ औपचारिक गठबंधन करेंगे। हालांकि इस मौके पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की मौजूदगी नहीं रहेगी, लेकिन इसके बावजूद इस गठबंधन को अल्पसंख्यक वोट बैंक के लिहाज़ से बेहद अहम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बंगाल की राजनीति में समीकरण बदल सकता है और खासकर मुर्शिदाबाद व आसपास के इलाकों में इसका असर देखने को मिल सकता है।
इसी बीच हुगली जिले में एक और बड़ा सियासी बदलाव देखने को मिला है। कभी सप्तग्राम, मगरा और बंशबेरिया क्षेत्रों में प्रभावशाली माने जाने वाले युवा नेता देबब्रता बिस्वास (देबू) ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को छोड़कर एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस में वापसी कर ली है। टीएमसी में लौटने के बाद देबब्रता ने साफ कहा कि बीजेपी ने उन्हें कभी दिल से स्वीकार नहीं किया, इसी वजह से उन्होंने अपनी पुरानी पार्टी में लौटने का फैसला लिया।
देबब्रता बिस्वास की इस वापसी पर बीजेपी ने तीखा तंज कसा है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि ऐसे नेता केवल अपने निजी स्वार्थ को देखते हैं और विचारधारा से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। गौरतलब है कि देबब्रता 2021 में बीजेपी में शामिल हुए थे और सप्तग्राम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, जहां उन्हें टीएमसी के दिग्गज नेता तपन दासगुप्ता से करीब 10 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा था।
राजनीतिक करियर की बात करें तो देबब्रता बिस्वास 2013 से 2018 तक चुंचुरा-मगरा पंचायत समिति के अध्यक्ष रहे हैं। 2018 के पंचायत चुनावों में जब टीएमसी ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तब पार्टी नेतृत्व से उनके मतभेद गहरे हो गए। इसके बाद उन्होंने बीजेपी का दामन थामा। बीजेपी में रहते हुए उन्हें हुगली लोकसभा क्षेत्र का सह-संयोजक भी बनाया गया था, लेकिन पार्टी गतिविधियों से उनकी दूरी धीरे-धीरे साफ होने लगी।
सूत्रों के मुताबिक, देबब्रता काफी समय से टीएमसी नेतृत्व के संपर्क में थे। हाल ही में मगरा में शुभेंदु अधिकारी के एक कार्यक्रम के दौरान बीजेपी जिला नेतृत्व से उनकी दूरी खुलकर सामने आई। विधानसभा में विपक्ष के नेता के जुलूस में अपने समर्थकों के साथ शामिल होने की कोशिश पर उन्हें रोके जाने के बाद वे लगभग बीजेपी के कार्यक्रमों से गायब ही हो गए। सिंगूर में तृणमूल की कार्यकारी बैठक के दौरान उन्होंने पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी से मिलने की कोशिश भी की थी, हालांकि उस दिन मुलाकात नहीं हो सकी।
कुल मिलाकर, हुमायूं कबीर-AIMIM गठबंधन और देबब्रता बिस्वास की टीएमसी में वापसी ने यह साफ कर दिया है कि चुनाव से पहले बंगाल की राजनीति में दल-बदल और नए गठबंधन आने वाले दिनों में और तेज़ होने वाले हैं।














