Saturday, January 31, 2026
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UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, कुमार विश्वास बोले—देश को अभी किसी भी विभाजन की ज़रूरत नहीं

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए नियमों पर रोक लगाए जाने का कवि और विचारक कुमार विश्वास ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे करोड़ों लोगों की भावना को समझने वाला निर्णय बताते हुए कहा कि भारत इस समय किसी भी प्रकार के सामाजिक या वैचारिक विभाजन को झेलने की स्थिति में नहीं है।

कुमार विश्वास ने कहा कि सरकारों और राजनीति से जुड़े लोगों को भी इस संवेदनशील समय में कोई ऐसी रेखा नहीं खींचनी चाहिए, जो समाज को बांटने का काम करे। उन्होंने स्वीकार किया कि शताब्दियों से दलितों, पिछड़े और वंचित वर्गों के साथ अन्याय होता रहा है और यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है।

उन्होंने आगे कहा कि सुधार आवश्यक हैं और आगे भी किए जाएंगे, लेकिन यह बेहद जरूरी है कि सुधारों की प्रक्रिया सावधानी और संतुलन के साथ आगे बढ़े, ताकि कोई निर्दोष व्यक्ति कठिनाई में न पड़े और समाज में किसी भी जाति, वर्ग या धर्म के व्यक्ति को असहजता महसूस न हो।

कुमार विश्वास ने कहा,
“यह कहना कठिन जरूर है, लेकिन सच है कि पिछले एक हजार वर्षों में भारत में जिन परंपराओं और व्यवस्थाओं का आगमन हुआ, उनसे मुक्ति के उपाय किए जा रहे हैं। पिछले 80 वर्षों में प्रयास हुए हैं और आगे भी होंगे, लेकिन ध्यान रहे कि कोई बेगुनाह न फंसे।”

‘कोर्ट ने करोड़ों लोगों की मनोदशा को समझा’

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अदालत ने करोड़ों लोगों की मानसिक स्थिति को समझा है। साथ ही उम्मीद जताई कि राजनीति भी इस मुद्दे का कोई सकारात्मक और सर्वमान्य समाधान निकालेगी।

याचिकाओं में क्या कहा गया था?

यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि आयोग ने जाति-आधारित भेदभाव की एक गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और कुछ सामाजिक वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जे. बागची की पीठ ने इन याचिकाओं पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है।

नए यूजीसी नियमों में क्या था प्रावधान?

यूजीसी विनियम-2026 के तहत यह अनिवार्य किया गया था कि संबंधित समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी वर्गों के साथ-साथ दिव्यांग और महिला सदस्यों को शामिल किया जाए। यह नया नियम वर्ष 2012 के नियमों की जगह लाने के लिए अधिसूचित किया गया था।
गौरतलब है कि 2012 के नियम मुख्य रूप से परामर्शात्मक प्रकृति के थे, जबकि नए नियमों को अधिक बाध्यकारी माना जा रहा था।

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VIKAS TRIPATHI
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