साल 2025 के आखिर में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार हिंदुओं की सुरक्षा को लेकर अपनी पीठ थपथपा रही थी, लेकिन अब ढाका स्थित अल्पसंख्यक संगठन हिंदू-बौद्ध-ईसाई यूनिटी काउंसिल की ताज़ा रिपोर्ट ने सरकार के इन दावों की गंभीरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में हर पांच दिन में एक हिंदू की हत्या हो रही है, जबकि औसतन हर दिन दो हमले सिर्फ हिंदुओं को निशाना बनाकर किए गए।
रिपोर्ट में क्या-क्या खुलासे?
अल्पसंख्यक संगठन की डिटेल रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 में धर्म के आधार पर कुल 522 हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से अधिकांश हमले हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किए गए।
पूरे साल में 61 हत्या की घटनाएं सामने आईं, जिनमें 66 हिंदुओं की मौत हुई
अकेले दिसंबर महीने में 3 हिंदू युवकों की हत्या दर्ज की गई
हिंदू महिलाओं के साथ जबरन यौन उत्पीड़न की 28 घटनाएं सामने आईं
95 बार मंदिरों और शिवालयों पर हमले किए गए
102 घटनाओं में हिंदुओं के घर और दुकानें निशाना बनीं
गोपालगंज और मयमनसिंह मार्ग सबसे अधिक प्रभावित इलाके रहे
सरकारी दावों पर बड़ा सवाल
गौरतलब है कि 2025 के अंत में बांग्लादेश सरकार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया था कि देश में हिंदू पूरी तरह सुरक्षित हैं। सरकार के प्रेस सलाहकार ने धर्म आधारित हिंसा की घटनाओं को “सीमित” बताया था।
लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के महज 10 दिन बाद अल्पसंख्यक संगठनों की यह रिपोर्ट सामने आई, जिसने सरकार के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
चुनाव के बीच आई रिपोर्ट, बहिष्कार की अपील
यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी की गई है जब बांग्लादेश में चुनावी माहौल है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि हिंदू समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है और ऐसे हालात में चुनाव के बहिष्कार पर विचार किया जाना चाहिए।
बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश में लगभग 1.31 करोड़ हिंदू रहते हैं, जो कुल आबादी का करीब 9 प्रतिशत हैं।
सबसे ज्यादा हिंदू खगराचारी जिले में रहते हैं
देश की लगभग 88 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है
1971 में आज़ादी के बाद 1974 की जनगणना में हिंदू आबादी 13 प्रतिशत थी, लेकिन 1990 के दशक से इसमें लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
अंतरिम सरकार की रिपोर्ट पर सवाल
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने इसी महीने जारी अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि पूरे साल में धर्म के आधार पर सिर्फ 71 हमले हुए। अब अल्पसंख्यक संगठनों की इस विस्तृत रिपोर्ट ने सरकार के आंकड़ों को भ्रामक और अधूरा बताते हुए पूरी तस्वीर सामने रख दी है।














