यूजीसी (UGC) के नए रेगुलेशन ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions’ को लेकर देशभर में बहस तेज़ है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली सहित कई राज्यों में सवर्ण समाज द्वारा विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग इन नियमों का समर्थन भी कर रहा है। विवाद की सबसे बड़ी वजह यही है कि नए नियमों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन शब्दों, व्यवहारों या टिप्पणियों को भेदभाव माना जाएगा।
पहले नियमों में थी स्पष्ट परिभाषा
यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर सुखदेव थोराट का कहना है कि 2012 में जारी रेगुलेशन में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ होने वाले जातीय भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया था। उसमें यह साफ बताया गया था कि कौन-से व्यवहार, टिप्पणी या रवैये भेदभाव की श्रेणी में आएंगे। इससे शिकायतकर्ता और जांच एजेंसियों—दोनों को स्पष्ट दिशा मिलती थी।
अब पूरा अधिकार इक्विटी कमेटी के पास
13 जनवरी को जारी नए रेगुलेशन में भेदभाव की कोई स्पष्ट सूची या परिभाषा नहीं दी गई है। अब यह अधिकार पूरी तरह इक्विटी कमेटी को दे दिया गया है कि वह तय करे कि कोई मामला भेदभाव का है या नहीं। इसी बिंदु को लेकर सबसे ज्यादा आपत्तियां सामने आ रही हैं।
“परिभाषा तय होती तो भ्रम न होता”
प्रोफेसर थोराट का मानना है कि यदि भेदभाव की परिभाषा पहले से तय होती, तो न सिर्फ शिकायत दर्ज कराने में स्पष्टता होती, बल्कि कार्रवाई भी तय मानकों के आधार पर होती। उन्होंने बताया कि 2012 के रेगुलेशन में ओबीसी को इसलिए शामिल नहीं किया गया था क्योंकि 2010 में ही ओबीसी आरक्षण लागू हुआ था। बाद में ओबीसी छात्रों के साथ भेदभाव की शिकायतें सामने आने पर उन्हें दायरे में लाया गया।
“कुछ संशोधन से स्थिति बेहतर हो सकती है”
थोराट के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS), महिलाएं और दिव्यांगजन को इस रेगुलेशन में शामिल करना व्यावहारिक नहीं है। महिलाओं के लिए पहले से ही POSH कानून और इंटरनल कंप्लेंट कमेटी, जबकि दिव्यांगों के लिए अलग कानून मौजूद हैं। EWS के साथ जातीय भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता। उनका कहना है कि रेगुलेशन मूल रूप से जातीय भेदभाव रोकने के लिए बना था, इसलिए कुछ संशोधन किए जाएं तो स्थिति काफी हद तक बेहतर हो सकती है।
JNU के प्रोफेसरों की अलग-अलग राय
जेएनयू के प्रोफेसर प्रवेश कुमार का कहना है कि नए रेगुलेशन में सभी वर्गों को शामिल किया गया है। उनके अनुसार, EWS, महिलाएं और दिव्यांग—इन श्रेणियों में सवर्ण समाज के लोग भी आते हैं, फिर इसे सवर्ण विरोधी क्यों कहा जा रहा है? उनका मानना है कि नियम सबकी सुरक्षा की बात करते हैं और विरोध के पीछे राजनीतिक कारण ज्यादा हैं।
वहीं जेएनयू के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर अमित मिश्रा ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि कोई शिकायत गलत या झूठी पाई जाती है, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी—इसका कोई प्रावधान नए रेगुलेशन में नहीं है। साथ ही, यह भी स्पष्ट नहीं है कि कौन-से शब्द, व्यवहार या टिप्पणियां गलत मानी जाएंगी।
अस्पष्टता से बढ़ रहा डर
प्रोफेसर अमित मिश्रा का कहना है कि इसी अस्पष्टता के कारण सवर्ण समाज में डर है कि कोई भी, कभी भी, किसी के खिलाफ शिकायत कर सकता है। यदि साफ तौर पर यह तय कर दिया जाए कि क्या गलत है और क्या नहीं, तो भ्रम भी कम होगा और विरोध भी।
एक तरफ UGC का कहना है कि नए नियम उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हैं, वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट परिभाषा और संतुलित प्रावधानों के बिना ये नियम विवाद का कारण बनते रहेंगे। अब निगाहें इस पर हैं कि क्या UGC इन नियमों में संशोधन कर एक्सपर्ट्स की सलाह को शामिल करता है या नहीं।














