Friday, January 23, 2026
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“खामोश चीखें: तेलंगाना के याचारम में 100 आवारा कुत्तों की दर्दनाक मौत, इंसानियत पर उठे गंभीर सवाल”

तेलंगाना के रंगारेड्डी ज़िले के याचारम गांव से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहां करीब 100 आवारा कुत्तों को कथित तौर पर ज़हरीले इंजेक्शन देकर बेरहमी से मार दिया गया। इस अमानवीय कृत्य से न सिर्फ पशु प्रेमियों में आक्रोश है, बल्कि पूरे गांव में तनाव और भय का माहौल बन गया है।

स्टे एनिमल्स फाउंडेशन ने इस घटना को गंभीर पशु क्रूरता बताते हुए याचारम पुलिस स्टेशन में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है और दोषियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। शिकायत के अनुसार, 19 जनवरी को इन बेजुबान जानवरों को ज़हरीला पदार्थ इंजेक्शन के ज़रिए दिया गया, जिससे उनकी तड़प-तड़प कर मौत हो गई।

इस मामले में बुधवार (21 जनवरी) को ग्राम सरपंच समेत दो अन्य लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। फाउंडेशन के सदस्यों का आरोप है कि पंचायत अधिकारियों की भूमिका इस सामूहिक हत्या में संदिग्ध है और बिना किसी मानवीय या कानूनी प्रक्रिया के यह कदम उठाया गया।

स्टे एनिमल्स फाउंडेशन के प्रतिनिधि—एडुलपुरम गौतम, नुदावत प्रीति, ईलाप्रोल अनीता, ईलाप्रोल भानु प्रकाश राव और मूला रजनी—ने न सिर्फ पुलिस से न्याय की गुहार लगाई, बल्कि दिल्ली स्थित पीपल फॉर एनिमल्स की संस्थापक डॉ. मेनका गांधी को भी इस दर्दनाक घटना की जानकारी दी। इसके बाद डॉ. मेनका गांधी ने कथित तौर पर जिला कलेक्टर नारायण रेड्डी से संपर्क किया, जिन्होंने याचारम सर्कल इंस्पेक्टर नंदीश्वर रेड्डी को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए।

पुलिस जांच में गांव की सीमा के भीतर एक सुनसान वन क्षेत्र में कुत्तों को दफनाए जाने के संकेत भी मिले हैं, जिसने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। गौरतलब है कि 6 जनवरी से अब तक तेलंगाना के विभिन्न ज़िलों में लगभग 500 आवारा कुत्तों की मौत की खबरें सामने आ चुकी हैं, जिससे किसी संगठित साजिश की आशंका भी जताई जा रही है।

हालांकि, दूसरी ओर कुछ ग्रामीणों का कहना है कि गांव में आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ने से बच्चों और पशुओं की सुरक्षा खतरे में थी। उनका तर्क है कि वे लंबे समय से प्रशासन से समाधान की मांग कर रहे थे, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या समस्याओं का समाधान हिंसा और क्रूरता से किया जाना चाहिए, या फिर मानवीय, कानूनी और स्थायी उपायों की ओर बढ़ना ही सही रास्ता है। बेजुबान जानवरों की यह खामोश पीड़ा अब इंसानियत की कसौटी बन चुकी है।

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