नोएडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत अब सिर्फ एक हादसा नहीं रही, बल्कि इसने नोएडा अथॉरिटी, बड़े बिल्डरों और शीर्ष अफसरशाही के कथित गठजोड़ की परतें उधेड़ कर रख दी हैं। यही वजह है कि जिस कार्रवाई को पहले कैलेंडर विवाद के नाम पर हल्के में लिया गया, वही मामला आज सत्ता के गलियारों में निर्णायक प्रशासनिक हस्तक्षेप का आधार बन गया।
सबसे पहले NMRC के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर महेंद्र प्रसाद को कैलेंडर विवाद के बाद ‘वेटिंग’ में डाला गया। 2026 के आधिकारिक कैलेंडर में अफसरों की निजी तस्वीरें, जन्मदिन के महीने में प्रमुखता से छपना—सरकार को यह “अफसरशाही का आत्मप्रचार” लगा। लेकिन यह कार्रवाई सीमित थी, संदेश साफ था: अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं।
मगर असली भूचाल तब आया जब युवराज मेहता की मौत ने सीधे-सीधे नोएडा अथॉरिटी की कार्यशैली, निगरानी तंत्र और सबसे बढ़कर CEO IAS डॉ. लोकेश एम की भूमिका को कठघरे में खड़ा कर दिया।
असली वजह: 3000 करोड़ का सवाल और लोटस ग्रीन की ‘मेहरबानी’
जिस जमीन पर युवराज की मौत हुई, वह जमीन लोटस ग्रीन बिल्डर को स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर दी गई थी। शर्त थी—खेलों का बुनियादी ढांचा बनेगा। हकीकत यह रही कि वहां प्लाटिंग कर जमीन बेची गई, और नोएडा अथॉरिटी सब कुछ देखती रही, चुप रही।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि लोटस ग्रीन पर करीब 3000 करोड़ रुपये का बकाया है, लेकिन CEO रहते हुए लोकेश एम ने इस वसूली के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। शासन के सूत्रों का दावा है कि यही बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाराजगी की सबसे बड़ी वजह बनी।
‘बलि का बकरा’ बना JE, लेकिन CEO तक पहुंचा मामला
युवराज प्रकरण में जब JE नवीन कुमार को सस्पेंड किया गया, तो यह साफ हो गया कि मामला सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रखने की कोशिश हो रही है। लेकिन सवाल यह उठा—
अगर सिस्टम फेल हुआ, तो सिर्फ JE जिम्मेदार कैसे?
बिल्डर को संरक्षण देने वाला तंत्र कौन चला रहा था?
यहीं से मुख्यमंत्री कार्यालय ने पूरे प्रकरण को दोबारा देखा। फाइलें खुलीं, पुराने फैसले टटोले गए और नजर गई सीधे CEO लोकेश एम की भूमिका पर।
अचानक कार्रवाई क्यों?
असल में, कैलेंडर विवाद सिर्फ चेतावनी थी, जबकि युवराज की मौत आखिरी ट्रिगर बन गई। शासन स्तर पर यह संदेश गया कि अगर अब भी सख्त कदम नहीं उठाया गया, तो यह मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक संकट बन जाएगा।
इसीलिए—
JE के सस्पेंशन के बावजूद
बिल्डर–अथॉरिटी सांठगांठ के आरोप
और मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद
IAS डॉ. लोकेश एम को CEO पद से हटाना अनिवार्य हो गया।
संदेश साफ है
यह कार्रवाई सिर्फ एक अफसर को हटाने की नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि
अब नोएडा में हादसों को ‘दुर्घटना’ कहकर फाइल बंद नहीं होगी।
युवराज मेहता की मौत ने यह साबित कर दिया कि जब प्रशासनिक लापरवाही, बिल्डर लॉबी और सत्ता की चुप्पी एक साथ आती है, तो उसकी कीमत आम नागरिक को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।
अब सवाल सिर्फ इतना है—क्या जांच की आंच बिल्डर तक भी पहुंचेगी, या कहानी फिर किसी फाइल में दब जाएगी?














