भ्रष्टाचार के मामलों में जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति को अनिवार्य बनाने वाली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-A की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने विभाजित फैसला सुनाया है। दो जजों की पीठ इस अहम सवाल पर एकमत नहीं हो सकी, जिसके चलते अब यह मामला प्रधान न्यायाधीश (CJI) के समक्ष बड़ी पीठ के गठन के लिए भेजा गया है।
यह फैसला एक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया है, जिसमें तर्क दिया गया था कि धारा 17-A भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी जांच में बाधा बनती है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचने का रास्ता देती है।
क्या कहती है धारा 17-A?
धारा 17-A के तहत किसी भी लोक सेवक के खिलाफ जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है, यदि आरोप उसके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े हों। इस प्रावधान को लेकर लंबे समय से यह बहस चल रही है कि
क्या यह ईमानदार अधिकारियों की रक्षा करता है,
या फिर भ्रष्ट अधिकारियों के लिए ढाल बन जाता है?
जस्टिस विश्वनाथन का मत: सशर्त वैध
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा विश्वनाथन (Justice Viswanathan) ने अपने फैसले में धारा 17-A को संवैधानिक रूप से वैध माना, लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ दी।
उन्होंने कहा कि पूर्व स्वीकृति देने का अधिकार कार्यपालिका (सरकार) के पास न होकर
केंद्र सरकार के कर्मचारियों के मामले में लोकपाल,
और राज्य सरकार के कर्मचारियों के मामले में लोकायुक्त
जैसी स्वायत्त और स्वतंत्र संस्थाओं के पास होना चाहिए।
उनका तर्क था कि इससे
ईमानदार अधिकारियों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों से सुरक्षा मिलेगी,
और साथ ही यह भी सुनिश्चित होगा कि वास्तविक भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों को सजा मिले।
जस्टिस नागरत्ना का असहमति मत: पूरी तरह असंवैधानिक
इसके विपरीत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने धारा 17-A को पूरी तरह असंवैधानिक करार देते हुए इसे रद्द किए जाने योग्य बताया।
उन्होंने अपने फैसले में कहा कि
पूर्व स्वीकृति की शर्त भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मूल उद्देश्य के खिलाफ है,
इससे जांच में देरी होती है और
भ्रष्ट अधिकारियों को सबूत मिटाने और बच निकलने का अवसर मिलता है।
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि यह प्रावधान सुप्रीम कोर्ट के विनीत नारायण बनाम भारत संघ और सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक फैसलों में पहले ही खारिज किए जा चुके प्रावधानों को पिछले दरवाजे से फिर लागू करने की कोशिश है।
उनके अनुसार,
“भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने से पहले किसी प्रकार की पूर्व अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।”
अब आगे क्या?
दोनों जजों के भिन्न मत होने के कारण पीठ ने सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि यह मामला प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखा जाए। अब
एक बड़ी संविधान पीठ का गठन किया जाएगा,
जो धारा 17-A की संवैधानिक वैधता पर अंतिम और बाध्यकारी फैसला सुनाएगी।
क्यों है यह मामला अहम?
यह मामला सिर्फ एक कानूनी प्रावधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि
भ्रष्टाचार से लड़ाई में जांच एजेंसियां कितनी स्वतंत्र होंगी,
और क्या सरकारी मंजूरी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में बाधा बनेगी या सुरक्षा कवच।
एक ओर ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त और निर्बाध कार्रवाई की जरूरत।
अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि धारा 17-A भ्रष्टाचार से लड़ने का हथियार है या ढाल।














