महाराष्ट्र में मुंबई समेत कई शहरों में निकाय चुनाव अपने अंतिम चरण में हैं, लेकिन यह चुनाव सिर्फ पार्षद और मेयर चुनने तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब मुंबई किसकी है—इस सवाल पर आकर अटक गया है। देश की सबसे अमीर नगर निगम, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC), पर कब्जे की जंग ने पूरे देश का ध्यान मुंबई की ओर खींच लिया है।
बीएमसी चुनाव में बादशाहत बनाए रखने की लड़ाई में सभी दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। इसी बीच, वर्षों से अलग-अलग रास्तों पर चल रहे ठाकरे बंधु—उद्धव और राज ठाकरे—एक बार फिर साथ आ गए हैं। उनका निशाना साफ है—बीजेपी और उसकी वह राजनीति, जो उनके मुताबिक मुंबई को महाराष्ट्र से अलग पहचान देने की साजिश रच रही है।
अन्नामलाई का बयान: चिंगारी या सोची-समझी आग?
इसी सियासी माहौल में तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई का बयान चुनावी बारूद में चिंगारी बन गया। मुंबई में प्रचार के दौरान उन्होंने कहा—“मुंबई महाराष्ट्र का शहर नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय शहर है।”
इसके साथ ही उन्होंने ‘ट्रिपल इंजन सरकार’ का सपना भी पेश किया—दिल्ली में मोदी, महाराष्ट्र में फडणवीस और मुंबई में बीजेपी का मेयर।
बयान शायद रणनीति का हिस्सा था, लेकिन मराठी अस्मिता की नस पर हाथ रख दिया गया। नतीजा—राजनीतिक भूचाल।
राज ठाकरे का पलटवार: रसमलाई से राष्ट्रवाद तक
राज ठाकरे ने दादर के शिवाजी पार्क से जवाब दिया—और जवाब भी वैसा ही, जैसा उनसे उम्मीद की जाती है।उन्होंने अन्नामलाई को ‘रसमलाई’ कहकर तंज कसा और सवाल दाग दिया—“तुम कौन हो? तमिलनाडु से आए हो, और मुंबई पर फैसला सुनाओगे?”
यह हमला सिर्फ अन्नामलाई पर नहीं था, बल्कि उस राजनीति पर था जो बाहरी नेताओं के ज़रिये मुंबई की पहचान को “रीब्रांड” करना चाहती है।
सामना की भाषा: मर्यादा या मराठी उग्रता?
इसके बाद शिवसेना (उद्धव) के मुखपत्र सामना ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसने विवाद को और तीखा बना दिया।
अन्नामलाई को “तमिलनाडु का भिखारी बीजेपी नेता” कहना और “ऐरा-गैरा, लुंगी-सुंगी” जैसे शब्दों का प्रयोग बताता है कि चुनावी मौसम में संयम सबसे पहले कुर्बान होता है।
सामना ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे पर भी हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि वे अन्नामलाई के बयान पर चुप्पी साधे हुए हैं, जो उनकी “कायरता” को दिखाता है।
बीजेपी का बचाव: भाषा की आड़ या राजनीतिक मजबूरी?
विवाद बढ़ता देख बीजेपी बैकफुट पर आई। मुख्यमंत्री फडणवीस ने अन्नामलाई का बचाव करते हुए कहा—“उन्हें हिंदी अच्छी तरह नहीं आती, दूसरी भाषा में बोलते समय ऐसी गलतियां हो जाती हैं।”
यह तर्क अपने आप में सवाल खड़े करता है—
क्या मुंबई जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बयान देने से पहले भाषा से ज़्यादा समझ की जरूरत नहीं होती?
बीजेपी नेताओं ने इसे “गलत तरीके से पेश किया गया बयान” बताया और कहा कि अन्नामलाई सिर्फ मुंबई के वैश्विक महत्व की बात कर रहे थे।
पुरानी आग, नया ईंधन
महाराष्ट्र में मराठी बनाम गैर-मराठी की राजनीति कोई नई नहीं है।
राज ठाकरे की भाषा ने 60 के दशक के उस नारे की याद दिला दी—
“बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी।”
फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह लड़ाई सड़कों से ज्यादा मीडिया, मंच और माइक्रोफोन पर लड़ी जा रही है।
निष्कर्ष: चुनाव या पहचान की जंग?
यह विवाद सिर्फ अन्नामलाई के बयान तक सीमित नहीं है। यह उस बड़ी राजनीति का हिस्सा है, जिसमें
मुंबई का आर्थिक महत्व,
मराठी अस्मिता,
और चुनावी गणित
आपस में टकरा रहे हैं।
बीएमसी चुनाव अब स्थानीय प्रशासन का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि यह तय करेगा कि मुंबई की पहचान ‘मराठी शहर’ के रूप में मजबूत होगी या ‘इंटरनेशनल सिटी’ के नाम पर नई राजनीतिक परिभाषा गढ़ी जाएगी।
और इस पूरी लड़ाई में, एक बार फिर जनता सिर्फ तमाशबीन बनकर रह गई है।














